रेडियो पर नंबर-1 रही Asha Bhosle की ये गजल, गुलाम अली ने दिया था संगीत; 43 साल बाद भी देती है सुकून
आशा भोसले की गजलों की दुनिया में ‘सलोना सा सजन है और मैं हूं’ आज भी खास मुकाम रखती है। साल 1983 में आए एल्बम ‘Meraj-e-Ghazal’ की इस गजल को आशा भोसले ने अपनी आवाज दी थी, जबकि इसकी धुन गुलाम अली ने तैयार की थी और बोल शबीह अब्बास ने लिखे थे। चार दशक से ज्यादा समय बीतने के बाद भी इसकी मिठास और ठहराव श्रोताओं को अपनी ओर खींचता है। गुलाम अली ने बाद में भी आशा भोसले के साथ काम करने को बेहद खास अनुभव बताया और कहा कि आशा जी ने गजल गायकी के लिए बहुत मेहनत और लगन से काम किया था।
लेखक
Vinay Mishra
आशा भोसले की आवाज और गुलाम अली की धुन का ऐसा संगम, जिसे सुनकर आज भी दिल ठहर जाता है। 1983 में रिलीज हुए गजल एल्बम ‘Meraj-e-Ghazal’ ने आशा भोसले के गायन के एक अलग रंग से श्रोताओं को रूबरू कराया। इसी एल्बम की चर्चित गजल ‘सलोना सा सजन है और मैं हूं’ आज भी पुरानी गजलों के चाहने वालों के बीच सुनी जाती है।
आशा भोसले और गुलाम अली की खास जुगलबंदी
आशा भोसले को हिंदी सिनेमा में अपनी बहुरंगी आवाज के लिए जाना जाता है, लेकिन गजल के क्षेत्र में उनका अंदाज कुछ अलग ही नजर आया। ‘Meraj-e-Ghazal’ में उन्होंने कई गजलों को अपनी आवाज दी। इस प्रोजेक्ट में गुलाम अली ने संगीत तैयार किया और कुछ रचनाओं में खुद भी आशा भोसले के साथ आवाज मिलाई। रिकॉर्ड्स के मुताबिक यह डबल-एलपी 1983 में HMV के बैनर पर रिलीज हुई थी।
‘सलोना सा सजन है और मैं हूं’ के बोल शबीह अब्बास ने लिखे थे। गजल में प्रेम, इंतजार और मन की बेचैनी को बेहद नर्म अंदाज में पिरोया गया है। आशा भोसले की आवाज इसे एक ऐसी संवेदनशीलता देती है, जिसमें दर्द भी है और मोहब्बत की मिठास भी।
गुलाम अली ने तैयार की थी धुन
इस गजल की सबसे बड़ी खासियतों में से एक इसकी धुन है। गुलाम अली ने इसे कंपोज किया था। ‘Meraj-e-Ghazal’ के रिकॉर्ड विवरण में भी गुलाम अली को संगीतकार और आशा भोसले को प्रमुख गायिका के तौर पर दर्ज किया गया है।
गुलाम अली ने बाद के एक इंटरव्यू में आशा भोसले के साथ काम करने के अनुभव को याद करते हुए उनकी प्रतिभा और शास्त्रीय संगीत की मजबूत समझ की तारीफ की थी। उनके मुताबिक आशा भोसले गजल रिकॉर्ड करने को लेकर बेहद उत्साहित थीं और उन्होंने इस प्रोजेक्ट के लिए काफी मेहनत की थी।
43 साल बाद भी क्यों खास है ये गजल?
गजल की खूबसूरती सिर्फ उसके शब्दों में नहीं, बल्कि ठहराव, आवाज की नजाकत और धुन की सादगी में भी होती है। ‘सलोना सा सजन’ में यही तीनों खूबियां एक साथ दिखाई देती हैं।
1983 में रिकॉर्ड हुई यह गजल आज की तेज रफ्तार संगीत की दुनिया में भी अपनी अलग जगह बनाए हुए है। अलग-अलग रेडियो स्टेशनों और डिजिटल म्यूजिक प्लेटफॉर्म पर इसके पुराने रिकॉर्ड आज भी दिखाई देते हैं। हाल के वर्षों में भी यह गजल रेडियो प्लेलिस्ट और पुराने गजलों के कलेक्शन में सुनाई देती रही है।
‘Meraj-e-Ghazal’ बना था यादगार एल्बम
‘Meraj-e-Ghazal’ में सिर्फ एक नहीं, बल्कि कई यादगार गजलें शामिल थीं। इनमें ‘Roodad-e-Mohabbat’, ‘Dayar-e-Dil Ki Raat Mein’, ‘Yun Saja Chand’, ‘Gaye Dinon Ka Suragh’, ‘Hairaton Ke Silsile’, ‘Karoon Na Yaad Magar’ और ‘Salona Sa Sajan’ जैसे गीत शामिल थे।
यही वजह है कि यह एल्बम आशा भोसले के गजल सफर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। चार दशक से ज्यादा समय बाद भी जब ‘सलोना सा सजन है और मैं हूं’ बजती है, तो इसकी आवाज और धुन बीते दौर की वही सुकून भरी दुनिया सामने ला देती है।
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