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नेपाल के सैलाब ने बढ़ाई भारत की टेंशन, हिमालय क्षेत्र की 200 ग्लेशियल झीलों पर मंडराया खतरा; 25 अतिसंवेदनशील

नेपाल में 26 अगस्त को ग्लेशियर ढहने के बाद आई विनाशकारी बाढ़ ने पूरे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों और अचानक आने वाली बाढ़ के खतरे को लेकर चिंता बढ़ा दी है। भारत के हिमालयी क्षेत्र में करीब 200 हाई-रिस्क ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है। इनमें करीब 25 झीलों को बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के बीच इन झीलों की निगरानी और शुरुआती चेतावनी व्यवस्था बेहद जरूरी हो गई है।

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नेपाल के सैलाब ने बढ़ाई भारत की टेंशन, हिमालय क्षेत्र की 200 ग्लेशियल झीलों पर मंडराया खतरा; 25 अतिसंवेदनशील

नेपाल में हालिया भयानक बाढ़ और ग्लेशियर ढहने की घटना ने भारत के सामने भी हिमालयी आपदा का खतरा फिर से खड़ा कर दिया है। 26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ग्लेशियर के बड़े हिस्से के ढहने से अचानक भारी मात्रा में मलबा और पानी निचले इलाकों की ओर आया। इस घटना ने हिमालय क्षेत्र में मौजूद ग्लेशियल झीलों की सुरक्षा को लेकर विशेषज्ञों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है।

भारत की करीब 200 ग्लेशियल झीलें हाई रिस्क पर

नेपाल की घटना के बाद भारत में मौजूद ग्लेशियल झीलों पर खास नजर रखी जा रही है। रिपोर्टों के मुताबिक, भारतीय हिमालयी क्षेत्र में करीब 200 हाई-रिस्क ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है। इनमें लगभग 25 झीलों को बेहद संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। इन झीलों के आसपास अचानक पानी का दबाव बढ़ने, प्राकृतिक बांध टूटने या ग्लेशियर के हिस्से के झील में गिरने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF का खतरा पैदा हो सकता है।

हालांकि नेपाल में 26 अगस्त की घटना को सीधे तौर पर सामान्य GLOF कहना अभी सही नहीं होगा। वैज्ञानिक आकलनों के मुताबिक वहां ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा ढहने के बाद मलबे ने नदी का रास्ता बाधित किया और अस्थायी झील बनी, जिसके बाद अचानक बाढ़ आई। USGS ने भी घटना को ग्लेशियल कोलैप्स से शुरू हुए मलबे और बाढ़ से जोड़ते हुए बताया है कि इसका असर करीब 100 किलोमीटर तक नीचे की ओर पड़ा।

क्यों बढ़ रहा है ग्लेशियल झीलों का खतरा?

ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं। ग्लेशियरों के पिघलने से कई जगह उनके सामने और आसपास पानी जमा होकर नई झीलें बन रही हैं या पुरानी झीलों का आकार बढ़ रहा है।

इन झीलों को अक्सर प्राकृतिक बर्फ या मलबे के बांध रोककर रखते हैं। अगर यह बांध टूट जाए तो कुछ ही समय में लाखों-करोड़ों क्यूबिक मीटर पानी नीचे की घाटियों में पहुंच सकता है। तेज बहाव अपने साथ चट्टान, बर्फ और मलबा भी लेकर आता है, जिससे नुकसान कई गुना बढ़ जाता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालय-कराकोरम क्षेत्र GLOF के लिहाज से दुनिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल है।

भारत पहले भी देख चुका है ऐसी तबाही

भारत के लिए यह खतरा नया नहीं है। 2021 में उत्तराखंड की ऋषिगंगा घाटी में ग्लेशियर से जुड़ी आपदा ने भारी तबाही मचाई थी। इसके बाद अक्टूबर 2023 में सिक्किम की साउथ ल्होनक झील से जुड़ी GLOF घटना ने भी बड़े पैमाने पर जान-माल और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया।

सिक्किम की घटना में तीस्ता नदी प्रणाली में अचानक आई बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई और हाइड्रोपावर इंफ्रास्ट्रक्चर को भी नुकसान पहुंचा। इन घटनाओं ने साफ कर दिया कि हिमालयी इलाकों में ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी कितनी महत्वपूर्ण है।

सिर्फ झील नहीं, पूरा हिमालयी सिस्टम चुनौती

नेपाल की ताजा घटना ने एक और अहम बात सामने रखी है—हिमालय में खतरा केवल ग्लेशियल झीलों के फटने तक सीमित नहीं है। ग्लेशियर टूटना, चट्टानों का खिसकना, भूस्खलन, अस्थायी झील बनना और फिर उसका टूटना, ये सभी घटनाएं एक-दूसरे से जुड़कर कुछ ही घंटों में बड़ी आपदा का रूप ले सकती हैं।

26 अगस्त की घटना में भी बर्फ और चट्टानों के बड़े पैमाने पर गिरने के बाद नदी का रास्ता बाधित हुआ और बाद में अचानक बाढ़ की स्थिति बनी।

भारत के लिए क्या है चुनौती?

विशेषज्ञों के मुताबिक सिर्फ ग्लेशियल झीलों की पहचान करना पर्याप्त नहीं है। जरूरत है कि संवेदनशील झीलों पर रियल-टाइम मॉनिटरिंग, सैटेलाइट निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और स्थानीय स्तर पर आपदा प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत किया जाए।

हिमालयी राज्यों में नदी घाटियों के निचले हिस्सों में बड़ी संख्या में आबादी, सड़कें, पुल और हाइड्रोपावर परियोजनाएं मौजूद हैं। ऐसे में किसी झील या प्राकृतिक बांध के अचानक टूटने पर पानी का असर बेहद कम समय में नीचे तक पहुंच सकता है।

नेपाल की मौजूदा आपदा के बाद यह सवाल और गंभीर हो गया है कि क्या भारत की 200 हाई-रिस्क ग्लेशियल झीलों के लिए मौजूदा निगरानी और चेतावनी व्यवस्था संभावित बड़े खतरे से निपटने के लिए पर्याप्त है?

यही वजह है कि नेपाल की त्रासदी अब सिर्फ नेपाल की चिंता नहीं रह गई है। हिमालय की ऊंचाइयों पर बदलता पर्यावरण भारत के लिए भी आने वाले वर्षों की बड़ी आपदा चुनौती का संकेत दे रहा है।

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