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चंद्रशेखरन के Tata Sons के दोबारा चेयरमैन बनने का नोएल ने क्यों किया विरोध? पढ़ें पूरी इनसाइड स्टोरी

Tata Sons के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन को बोर्ड ने एक और पांच साल के कार्यकाल के लिए फिर नियुक्त कर दिया है, लेकिन Tata Trusts के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस फैसले का विरोध किया है। 17 सितंबर की बोर्ड बैठक में नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के खिलाफ वोट किया और प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाए। नोएल टाटा की आपत्ति का मुख्य आधार यह है कि चंद्रशेखरन ने 12 अगस्त को खुद अगला कार्यकाल नहीं लेने का फैसला किया था, जिसे Tata Trusts ने स्वीकार कर लिया था। इसके बाद उत्तराधिकारी चुनने की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही गई थी। नोएल का तर्क है कि सार्वजनिक रूप से घोषित और स्वीकार किए जा चुके फैसले को बाद में बोर्ड पलट नहीं सकता। विवाद में Tata Sons की संभावित IPO लिस्टिंग और Trusts के विशेष अधिकार भी महत्वपूर्ण मुद्दे बन गए हैं।

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चंद्रशेखरन के Tata Sons के दोबारा चेयरमैन बनने का नोएल ने क्यों किया विरोध? पढ़ें पूरी इनसाइड स्टोरी

Tata Sons में अचानक बदला पूरा घटनाक्रम

नई दिल्ली: देश के सबसे बड़े कारोबारी समूहों में शामिल Tata Group में एक बार फिर बोर्डरूम विवाद सामने आया है। Tata Sons के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने अगस्त में घोषणा की थी कि वह फरवरी 2027 में अपना मौजूदा कार्यकाल पूरा होने के बाद दोबारा चेयरमैन पद के लिए खुद को पेश नहीं करेंगे।

लेकिन करीब एक महीने बाद घटनाक्रम बदल गया। Tata Sons के बोर्ड ने चंद्रशेखरन से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया। 17 सितंबर को चंद्रशेखरन ने बोर्ड के अनुरोध को स्वीकार कर लिया और बोर्ड ने बहुमत से उन्हें अगले पांच साल के लिए फिर चेयरमैन नियुक्त करने का फैसला किया।

यहीं से नोएल टाटा और Tata Sons बोर्ड के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गया।

नोएल टाटा ने क्यों किया विरोध?

नोएल टाटा का सबसे बड़ा तर्क चंद्रशेखरन के 12 अगस्त के फैसले को लेकर है। उनके मुताबिक चंद्रशेखरन ने खुद, बिना बोर्ड के कहने पर, अगला कार्यकाल नहीं लेने का फैसला किया था।

Tata Trusts ने उस फैसले को स्वीकार कर लिया था और उत्तराधिकारी की तलाश के लिए प्रक्रिया शुरू करने को कहा था। नोएल के मुताबिक जब यह फैसला सार्वजनिक हो गया, तो कंपनी के कर्मचारी, कारोबारी साझेदार, कर्जदाता, बाजार और सबसे बड़े शेयरधारक ने उसी आधार पर आगे की तैयारी की।

नोएल ने बोर्ड बैठक में कहा कि सार्वजनिक किए जा चुके ऐसे फैसले को बाद में बोर्ड एकतरफा तरीके से पलट नहीं सकता और अब “move on” करने का समय था।

Tata Trusts के पास Tata Sons की करीब 66% हिस्सेदारी

इस विवाद को समझने के लिए Tata Trusts की भूमिका महत्वपूर्ण है। Tata Trusts के पास Tata Sons में लगभग 66 फीसदी हिस्सेदारी है। Tata Sons, Tata Group की प्रमुख होल्डिंग कंपनी है।

हालांकि Trusts रोजाना Tata कंपनियों के संचालन में सीधे हस्तक्षेप नहीं करता, लेकिन उसकी बड़ी हिस्सेदारी और Tata Sons के Articles of Association में मौजूद विशेष अधिकार उसे चेयरमैन की नियुक्ति सहित कुछ महत्वपूर्ण मामलों में प्रभाव देता है।

यही वजह है कि चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को लेकर बोर्ड और Tata Trusts की राय में अंतर को कॉरपोरेट गवर्नेंस के बड़े विवाद के तौर पर देखा जा रहा है।

असली पेच फंसा वोटिंग प्रक्रिया में

17 सितंबर की बैठक में Tata Trusts के दो नॉमिनी डायरेक्टर—नोएल टाटा और वेंु श्रीनिवासन—की राय अलग-अलग रही।

रिपोर्टों के मुताबिक नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन के खिलाफ वोट किया, जबकि वेंु श्रीनिवासन ने उनके पक्ष में मतदान किया। इससे Trusts के दोनों नॉमिनी डायरेक्टरों के बीच आवश्यक समर्थन को लेकर विवाद खड़ा हुआ।

बोर्ड की बैठक में वोटिंग बराबरी पर पहुंची, जिसके बाद स्वतंत्र निदेशक और Nomination and Remuneration Committee के चेयरमैन हरीश मनवानी ने अपने casting vote का इस्तेमाल किया। इसके बाद चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव पारित हुआ। रिपोर्टों के मुताबिक अंतिम बोर्ड वोट 4-1 रहा।

पूर्व CJI चंद्रचूड़ की कानूनी राय का भी हवाला

विवाद अब केवल कारोबारी असहमति तक सीमित नहीं है। Tata Trusts की ओर से पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ से प्राप्त एक कानूनी राय का भी हवाला दिया गया है।

LiveMint की रिपोर्ट के अनुसार, इस राय में कहा गया कि Tata Sons के Articles के तहत यदि Trusts के दोनों नॉमिनी डायरेक्टरों में से बहुमत चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के पक्ष में नहीं है, तो केवल बोर्ड चेयरमैन का casting vote उस विशेष आवश्यकता की जगह नहीं ले सकता।

हालांकि, यह कानूनी राय अदालत का फैसला नहीं है। Tata Sons बोर्ड ने इसे स्वीकार किया या नहीं, इस पर भी विवाद सामने आया है। इसलिए अंतिम कानूनी स्थिति अभी स्पष्ट नहीं मानी जा सकती।

IPO की योजना भी बनी विवाद का दूसरा बड़ा मुद्दा

चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के साथ Tata Sons की संभावित स्टॉक मार्केट लिस्टिंग यानी IPO का मुद्दा भी जुड़ गया है।

RBI के नियमों के तहत Tata Sons पर लिस्टिंग से जुड़ी नियामकीय स्थिति महत्वपूर्ण हो गई है। Tata Sons बोर्ड ने 17 सितंबर की बैठक में लागू RBI दिशानिर्देशों के अनुपालन की दिशा में कदम उठाने और RBI, Tata Trusts तथा अन्य हितधारकों से मार्गदर्शन लेने का फैसला किया।

वहीं Tata Trusts ने Tata Sons की संभावित लिस्टिंग का विरोध किया है। Trusts का तर्क है कि Tata Sons की संरचना अन्य कंपनियों से अलग है क्योंकि इसमें बहुमत हिस्सेदारी परोपकारी संस्थाओं के पास है। Reuters के अनुसार, Trusts का मानना है कि लिस्टिंग से Tata Group की मौजूदा परोपकारी संरचना प्रभावित हो सकती है।

क्या चंद्रशेखरन की नियुक्ति पर कानूनी चुनौती हो सकती है?

फिलहाल बोर्ड ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को मंजूरी दे दी है, लेकिन Tata Trusts ने इसे चुनौती देने का संकेत दिया है।

Reuters के मुताबिक Trusts अदालत का रुख कर सकता है और आने वाली Tata Sons की वार्षिक आम बैठक में भी इस मुद्दे को उठाया जा सकता है। हालांकि आगे की स्थिति इस बात पर भी निर्भर करेगी कि Trusts अपने आंतरिक मतभेदों और आवश्यक प्रक्रियाओं को किस तरह सुलझाता है।

आखिर क्यों महत्वपूर्ण है यह पूरा विवाद?

Tata Group की कंपनियां नमक से लेकर सॉफ्टवेयर, ऑटोमोबाइल, स्टील और एविएशन तक कई क्षेत्रों में काम करती हैं। इसलिए Tata Sons के चेयरमैन की नियुक्ति और होल्डिंग कंपनी की भविष्य की संरचना का असर केवल एक बोर्डरूम फैसले तक सीमित नहीं है।

फिलहाल तस्वीर यह है कि Tata Sons का बोर्ड चंद्रशेखरन को पांच साल और चाहता है, जबकि Tata Trusts के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस प्रक्रिया और इसकी वैधता पर सवाल उठाया है। आने वाले महीनों में बोर्ड, शेयरधारकों, Trusts और नियामकीय प्रक्रियाओं के बीच यह विवाद किस दिशा में जाता है, इस पर कारोबारी जगत की नजर रहेगी।

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