रूस पर 14 सैटेलाइट से अमेरिका की जासूसी का आरोप, ईरान को हमले में कर रहा था मदद; रिपोर्ट में खुलासा
ईरान के एक बड़े हमले को लेकर CNN की जांच में रूसी उपग्रहों की गतिविधियों पर सवाल उठे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के सऊदी अरब स्थित अमेरिकी प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर हमले से दो दिन पहले 14 रूसी टोही उपग्रह उस इलाके के ऊपर से गुजरे थे। रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि रूसी उपग्रहों से मिली जानकारी ने ईरान को सटीक निशाना साधने में मदद की हो सकती है। हालांकि CNN के पास रूसी सैटेलाइट तस्वीरें या ऐसा प्रत्यक्ष सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो कि जानकारी ईरान को हस्तांतरित की गई थी। रूस ने पहले ऐसे आरोपों से इनकार किया है।
लेखक
Jyoti Mukherjee
नई दिल्ली: रूस और ईरान के बीच सैन्य सहयोग को लेकर एक नया दावा सामने आया है। CNN की एक जांच के मुताबिक, मार्च 2026 में ईरान के अमेरिकी सैन्य ठिकाने पर हमले से ठीक पहले 14 रूसी खुफिया उपग्रहों ने उस इलाके के ऊपर से उड़ान भरी थी। रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि इन उपग्रहों से जुटाई गई जानकारी का इस्तेमाल ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकाने को निशाना बनाने के लिए किया हो सकता है।
हालांकि इस पूरे मामले में एक अहम बात यह है कि CNN को रूसी उपग्रहों से मिली तस्वीरों तक पहुंच नहीं मिली और न ही ऐसा प्रत्यक्ष सबूत मिला कि उपग्रहों से जुटाई गई जानकारी ईरान को दी गई थी। इसलिए यह मामला अभी रिपोर्ट और सूत्रों के दावों के स्तर पर है।
हमले से पहले क्या हुआ था?
रिपोर्ट के अनुसार, 27 मार्च 2026 को ईरान ने सऊदी अरब में स्थित प्रिंस सुल्तान एयर बेस को निशाना बनाया था। हमले में मिसाइल और ड्रोन का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई।
हमले में एक अमेरिकी Boeing E-3 Sentry AWACS विमान नष्ट हुआ। यह विमान लंबी दूरी से विमान और मिसाइलों की निगरानी करने तथा सैन्य अभियानों के लिए कमांड और कंट्रोल उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हमले में 12 अमेरिकी सैन्यकर्मियों के घायल होने की भी रिपोर्ट सामने आई थी।
14 रूसी उपग्रहों की गतिविधि क्यों बनी सवाल?
CNN की जांच में ऑर्बिटल डेटा का विश्लेषण किया गया। इसके लिए यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के Aurora Program और अमेरिकी कंपनी Kayhan Space की मदद से उपग्रहों की गतिविधियों को ट्रैक किया गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, इन 14 रूसी उपग्रहों में अलग-अलग तरह की निगरानी क्षमता वाले स्पेसक्राफ्ट शामिल थे। इनमें Kosmos-2573 भी था, जो Synthetic Aperture Radar यानी SAR तकनीक के जरिए दिन-रात और बादलों के बीच भी विस्तृत तस्वीरें लेने में सक्षम बताया जाता है।
अन्य उपग्रह इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस, इंफ्रारेड और रडार आधारित जानकारी जुटाने की क्षमता वाले बताए गए हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, अलग-अलग सेंसर वाली इन क्षमताओं का संयोजन किसी सैन्य ठिकाने की गतिविधियों की निगरानी में उपयोगी हो सकता है।
क्या रूसी सैटेलाइट डेटा ईरान तक पहुंचा?
यही इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण और अभी अनिश्चित हिस्सा है।
CNN के अनुसार, उसके पास रूसी उपग्रहों से जुटाई गई वास्तविक तस्वीरें नहीं हैं। नेटवर्क को ऐसा प्रत्यक्ष सबूत भी नहीं मिला कि इन उपग्रहों द्वारा जुटाई गई जानकारी ईरान को भेजी गई थी। रिपोर्ट में अमेरिकी सूत्रों ने हालांकि दावा किया कि रूसी उपग्रहों से मिली जानकारी ने ईरान के हमले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो सकती है।
इसलिए यह कहना कि “रूस ने निश्चित रूप से ईरान को सैटेलाइट डेटा दिया” अभी उपलब्ध सार्वजनिक प्रमाणों से साबित नहीं होता।
अमेरिकी विमान का ठिकाना कैसे पता चला?
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जिस E-3 Sentry विमान को ईरानी हमले में निशाना बनाया गया, वह युद्ध से पहले अपनी सामान्य जगह पर खड़ा नहीं था।
इसके बावजूद ईरान ने उसे ढूंढकर निशाना बनाया। इसी वजह से अमेरिकी अधिकारियों और विशेषज्ञों के बीच यह सवाल उठा कि क्या अंतरिक्ष से मिली खुफिया जानकारी ने लक्ष्य की पहचान में भूमिका निभाई थी।
यूक्रेन के बाद रूस का 'बदला'?
रिपोर्ट में कुछ विशेषज्ञों ने रूस की कथित भूमिका को अमेरिका की यूक्रेन नीति से भी जोड़कर देखा है।
किंग्स कॉलेज लंदन के वरिष्ठ फेलो नवाफ ओबैद ने CNN से बातचीत में रूस की संभावित मदद को यूक्रेन में अमेरिका की ओर से रूस के खिलाफ उपलब्ध कराई गई खुफिया सहायता के संदर्भ में देखा। यह उनका विश्लेषण है, रूस की ओर से स्वीकार किया गया तथ्य नहीं।
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने भी पहले अमेरिकी मीडिया से कहा था कि यूक्रेनी खुफिया एजेंसियों की जानकारी के अनुसार रूसी उपग्रहों ने सऊदी अरब स्थित अमेरिकी बेस की तस्वीरें ली थीं। उन्होंने दावा किया था कि यह गतिविधि हमले से पहले के दिनों में हुई थी।
रूस ने क्या कहा?
रूस ने पहले ईरान को अमेरिकी ठिकानों पर हमले के लिए सैटेलाइट इमेजरी उपलब्ध कराने में अपनी भूमिका से इनकार किया है। इसलिए CNN की रिपोर्ट में सामने आए आरोप और रूस का आधिकारिक रुख फिलहाल एक-दूसरे के विपरीत हैं।
अंतरिक्ष अब युद्ध का अहम हिस्सा
इस घटनाक्रम ने एक बड़े बदलाव की ओर भी ध्यान खींचा है। आधुनिक युद्ध में उपग्रह सिर्फ संचार या GPS के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि खुफिया जानकारी, सैन्य निगरानी, लक्ष्य की पहचान और युद्धक्षेत्र की गतिविधियों पर नजर रखने में भी उनकी भूमिका बढ़ती जा रही है।
CSIS के हालिया विश्लेषण के मुताबिक, यूक्रेन से लेकर मध्य पूर्व तक सैन्य अभियानों में उपग्रहों और काउंटर-स्पेस क्षमताओं का महत्व लगातार बढ़ रहा है।
इसी बीच अमेरिका ने भी सितंबर 2026 में पहली बार सार्वजनिक रूप से अंतरिक्ष में मौजूद अपने ऑर्बिटल स्पेस-कंट्रोल हथियारों की पुष्टि की है। अमेरिकी अधिकारियों ने इनकी सटीक क्षमता और प्रकृति का खुलासा नहीं किया है।
निष्कर्ष
14 रूसी उपग्रहों की अमेरिकी सैन्य ठिकाने के ऊपर गतिविधि और ईरान के सटीक हमले के बीच समय का संबंध सामने आया है। लेकिन उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों के आधार पर यह अभी साबित नहीं है कि रूसी उपग्रहों से जुटाई गई जानकारी सीधे ईरान को दी गई थी।
अगर भविष्य में ऐसी जानकारी की स्वतंत्र पुष्टि होती है, तो यह रूस-ईरान सैन्य सहयोग और आधुनिक युद्ध में अंतरिक्ष आधारित खुफिया जानकारी की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण घटनाक्रम हो सकता है। फिलहाल इस मामले में रिपोर्टों, खुफिया दावों और रूस के इनकार—तीनों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
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