Myth vs Facts: FCRA बिल पर भारत ने वैश्विक समुदाय को किया आश्वस्त, जानिए सरकार ने सवालों पर क्या कहा
FCRA Amendment Bill 2026 को लेकर उठ रहे सवालों के बीच केंद्र सरकार ने इसके प्रावधानों को लेकर कई दावों और आशंकाओं पर स्पष्टीकरण दिया है। सरकार का कहना है कि FCRA विदेशी फंडिंग पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाता, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए नियमन करता है। सरकार ने यह भी कहा कि भारत इस तरह का नियामक ढांचा अपनाने वाला अकेला देश नहीं है।
Written by
Vinay Mishra
FCRA बिल को लेकर सरकार ने जारी किए 'Myth vs Facts'
नई दिल्ली: विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाले Foreign Contribution (Regulation) Act (FCRA) में प्रस्तावित बदलावों को लेकर देश और विदेश में उठ रहे सवालों के बीच केंद्र सरकार ने अपना पक्ष स्पष्ट किया है। सरकार ने 'Myth vs Facts' के जरिए FCRA से जुड़े कई दावों का जवाब देते हुए कहा है कि इसका उद्देश्य विदेशी योगदान पर रोक लगाना नहीं, बल्कि उसके इस्तेमाल में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
FCRA Amendment Bill, 2026 को लोकसभा में 25 मार्च 2026 को पेश किया गया था। प्रस्तावित कानून में उन संगठनों के विदेशी योगदान और संपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक Designated Authority बनाने का प्रावधान है, जिनका FCRA प्रमाणपत्र रद्द हो जाता है, समाप्त हो जाता है या जिनका नवीनीकरण नहीं होता।
Myth: FCRA विदेशी चंदे पर पूरी तरह रोक लगाता है
सरकार ने इस दावे को खारिज किया है। उसके मुताबिक FCRA विदेशी योगदान को प्रतिबंधित नहीं करता, बल्कि उसके लिए पंजीकरण और खुलासे जैसी शर्तें तय करता है।
सरकार ने बताया कि 2024-25 में करीब 16,200 संगठन FCRA के तहत सक्रिय रूप से पंजीकृत थे और उन्हें लगभग 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान मिला। सरकार का तर्क है कि ये आंकड़े किसी पूर्ण प्रतिबंध की धारणा का समर्थन नहीं करते।
Myth: भारत विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाला अकेला देश है
केंद्र का कहना है कि भारत इस मामले में कोई अपवाद नहीं है। सरकार ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और कनाडा सहित कई देशों में विदेशी फंडिंग से जुड़े नियामक कानूनों का उदाहरण दिया है। यूरोपीय संघ में भी इस दिशा में कानून बनाने की प्रक्रिया चल रही है।
सरकार का कहना है कि विदेशी स्रोतों से मिलने वाले धन की निगरानी दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में की जाती है और भारत का FCRA ढांचा इसी व्यापक नियामक दृष्टिकोण का हिस्सा है।
Myth: FCRA केवल NGOs और धार्मिक संस्थाओं को निशाना बनाता है
सरकार ने इस दावे को भी गलत बताया है। उसके अनुसार FCRA का ढांचा किसी एक समुदाय या धर्म के लिए अलग नियम नहीं बनाता। विभिन्न धार्मिक और धर्मार्थ संस्थाएं निर्धारित कानूनी शर्तों को पूरा करने पर विदेशी योगदान प्राप्त कर सकती हैं।
केंद्र ने यह भी कहा कि दुनिया के कई देशों में विदेशी प्रभाव से जुड़े नियम केवल NGOs तक सीमित नहीं हैं, बल्कि लॉबिस्ट, थिंक टैंक, विश्वविद्यालय और कंपनियों सहित अलग-अलग क्षेत्रों पर लागू हो सकते हैं।
2026 के बिल में क्या बदलने का प्रस्ताव है?
प्रस्तावित संशोधन में FCRA प्रमाणपत्र समाप्त होने की स्थिति में विदेशी योगदान और उससे बनाई गई संपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक नई व्यवस्था प्रस्तावित है। सरकार के अनुसार, कुछ परिस्थितियों में पहले provisional vesting और बाद में निर्धारित अवधि में पंजीकरण बहाल न होने पर permanent vesting का प्रावधान होगा। साथ ही संबंधित आदेश के खिलाफ न्यायिक अपील का रास्ता भी प्रस्तावित किया गया है।
बिल में FCRA उल्लंघनों के लिए अधिकतम जेल की सजा को पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करने और जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी से जुड़ा प्रावधान भी प्रस्तावित है।
विदेशों से उठे सवालों पर भारत का जवाब
FCRA में प्रस्तावित बदलावों को लेकर विदेशों में भी सवाल उठे हैं। भारत ने स्पष्ट किया है कि विदेशी योगदान का नियमन देश की संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और जवाबदेही से जुड़ा घरेलू विधायी विषय है।
सरकार का कहना है कि वैध और पारदर्शी विदेशी फंडिंग के लिए रास्ता बंद नहीं किया जा रहा, बल्कि यह सुनिश्चित करने की कोशिश है कि विदेशी धन का इस्तेमाल कानून और घोषित उद्देश्यों के अनुरूप हो।
विपक्ष और सिविल सोसायटी की आपत्तियां भी बरकरार
हालांकि सरकार के स्पष्टीकरण के बावजूद FCRA बिल को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस खत्म नहीं हुई है। विपक्षी दलों और कुछ नागरिक संगठनों ने प्रस्तावित Designated Authority की शक्तियों तथा विदेशी फंड से बनाई गई संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण को लेकर सवाल उठाए हैं।
यानी सरकार जहां इसे पारदर्शिता और राष्ट्रीय हित की दिशा में सुधार बता रही है, वहीं आलोचक इसके संभावित प्रभाव और सरकारी शक्तियों के विस्तार को लेकर चिंता जता रहे हैं। ऐसे में संसद में बिल पर होने वाली आगे की चर्चा महत्वपूर्ण होगी।
