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बांग्लादेश की स्वतंत्रता में मददगार रहा भारत, फिर भी ढाका का नकारात्मक रुख; कांग्रेस नेता ने जताई चिंता

भारत ने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर अहम भूमिका निभाई थी। हालांकि, हाल के वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में तनाव बढ़ा है। बांग्लादेश की ओर से भारत के खिलाफ उठते सवालों और बदलते कूटनीतिक रुख को लेकर कांग्रेस नेता ने चिंता जताई है। मौजूदा समय में शेख हसीना के प्रत्यर्पण, सीमा और द्विपक्षीय संबंधों को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं।

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बांग्लादेश की स्वतंत्रता में मददगार रहा भारत, फिर भी ढाका का नकारात्मक रुख; कांग्रेस नेता ने जताई चिंता

नई दिल्ली: भारत और बांग्लादेश के रिश्ते इतिहास, भूगोल और साझा संस्कृति से गहराई से जुड़े हैं। 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश के स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आने में भारत की भूमिका निर्णायक रही थी। भारत ने मुक्ति वाहिनी को समर्थन देने के साथ-साथ लाखों शरणार्थियों को जगह दी और दिसंबर 1971 में पाकिस्तानी सेना के खिलाफ युद्ध में सीधे हस्तक्षेप किया।

इसके बावजूद पिछले कुछ वर्षों में ढाका और नई दिल्ली के रिश्तों में तल्खी बढ़ी है। खासकर 2024 में शेख हसीना के सत्ता से हटने और भारत में उनके रहने के बाद दोनों देशों के बीच राजनीतिक तथा कूटनीतिक मतभेद गहरे हुए हैं। हालिया रिपोर्टों में भारत-बांग्लादेश संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिशों के बावजूद कई मुद्दों पर गतिरोध कायम रहने की बात सामने आई है।

1971 में भारत ने कैसे की थी बांग्लादेश की मदद?

बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान भारत ने बड़ी संख्या में आए शरणार्थियों को आश्रय दिया। इसके अलावा भारत ने मुक्ति वाहिनी को समर्थन दिया और पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की।

16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के साथ बांग्लादेश एक स्वतंत्र देश के रूप में उभरा। भारत ने युद्ध के दौरान राजनीतिक और कूटनीतिक मोर्चे पर भी बांग्लादेश के पक्ष में सक्रिय भूमिका निभाई थी।

युद्ध के बाद दोनों देशों के संबंध बेहद करीबी रहे। 1972 में भारत और बांग्लादेश के बीच मैत्री, सहयोग और शांति की संधि भी हुई।

फिर रिश्तों में खटास क्यों आई?

दोनों देशों के संबंध हमेशा एक जैसे नहीं रहे। 1975 में शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के बाद बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया और आगे चलकर भारत के साथ कई मुद्दों पर मतभेद उभरे।

सीमा विवाद, नदी जल बंटवारा, फरक्का बैराज, व्यापार, अवैध आवाजाही और सुरक्षा जैसे मुद्दे समय-समय पर दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित करते रहे हैं।

हाल के वर्षों में बांग्लादेश में भारत के प्रति आलोचनात्मक राजनीतिक और सामाजिक आवाजें भी मजबूत हुई हैं। वहीं भारत में भी ढाका के बदलते रुख को लेकर चिंता जताई जाती रही है।

2024 के बाद बदला राजनीतिक समीकरण

अगस्त 2024 में बड़े छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद छोड़कर भारत आना पड़ा। इसके बाद बांग्लादेश में नई राजनीतिक व्यवस्था बनी और नई सरकार ने भारत से शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग उठाई।

मौजूदा समय में यह मुद्दा दोनों देशों के बीच संबंधों में प्रमुख विवाद बना हुआ है। बांग्लादेश की ओर से हसीना के प्रत्यर्पण की मांग और भारत में उनके रहने को लेकर ढाका की नाराजगी ने द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित किया है।

कांग्रेस नेता ने किस बात पर जताई चिंता?

कांग्रेस की ओर से उठाई गई चिंता का केंद्र यही है कि जिस भारत ने 1971 में बांग्लादेश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उसके प्रति आज ढाका में नकारात्मक राजनीतिक भावनाएं क्यों बढ़ रही हैं।

कांग्रेस नेता ने इस पूरे घटनाक्रम को भारत-बांग्लादेश के ऐतिहासिक संबंधों के संदर्भ में देखने की जरूरत बताई है। उनका तर्क है कि दोनों देशों के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उन्हें इस स्तर तक नहीं जाना चाहिए कि ऐतिहासिक सहयोग और आपसी हित पीछे छूट जाएं।

भारत-बांग्लादेश के बीच सिर्फ इतिहास नहीं, साझा हित भी

भारत और बांग्लादेश के रिश्ते सिर्फ 1971 के इतिहास तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच करीब 4,000 किलोमीटर लंबी सीमा, व्यापक व्यापार, नदी जल बंटवारे और सुरक्षा से जुड़े हित हैं।

पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, असम और मेघालय जैसे भारतीय राज्यों के बांग्लादेश के साथ सीधे भौगोलिक और सामाजिक संबंध हैं। बंगाली भाषा और संस्कृति भी दोनों देशों को जोड़ती है।

इसीलिए दोनों देशों के बीच तनाव का असर केवल दिल्ली और ढाका तक सीमित नहीं रहता।

मौजूदा तनाव के पीछे कौन-कौन से मुद्दे?

भारत-बांग्लादेश संबंधों में इस समय कई मुद्दे एक साथ महत्वपूर्ण हैं:

1. शेख हसीना का प्रत्यर्पण:
ढाका लगातार भारत से शेख हसीना को वापस भेजने की मांग कर रहा है। भारत ने इस अनुरोध को मिलने की पुष्टि की है और मामले पर विचार किया जा रहा है।

2. सीमा और सुरक्षा:
सीमा पर घुसपैठ, तस्करी और सीमा प्रबंधन को लेकर दोनों देशों की चिंताएं हैं।

3. नदी जल बंटवारा:
तीस्ता समेत साझा नदियों के पानी का बंटवारा लंबे समय से संवेदनशील मुद्दा रहा है।

4. व्यापार और कनेक्टिविटी:
दोनों देशों के आर्थिक संबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन राजनीतिक तनाव इन रिश्तों को प्रभावित कर सकता है।

5. बांग्लादेश का बदलता विदेश नीति संतुलन:
ढाका भारत के अलावा चीन, पाकिस्तान, अमेरिका और पश्चिम एशिया के देशों के साथ अपने संबंधों को भी महत्व दे रहा है।

हाल में बांग्लादेश के Mecca Pact में शामिल होने की संभावना की खबरों ने भी क्षेत्रीय रणनीतिक समीकरणों पर चर्चा तेज की है। विश्लेषकों के मुताबिक ऐसा कदम भारत के साथ उसके संबंधों को प्रभावित कर सकता है।

क्या बांग्लादेश पूरी तरह भारत से दूरी बना रहा है?

ऐसा कहना अभी सही नहीं होगा।

बांग्लादेश की मौजूदा सरकार ने भारत के साथ संबंध बनाए रखने की इच्छा जताई है, लेकिन साथ ही वह अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने पर जोर दे रही है। हाल में ढाका ने कहा कि भारत के साथ सकारात्मक संबंध जरूरी हैं, लेकिन प्रधानमंत्री तारिक रहमान की प्रस्तावित भारत यात्रा के लिए अनुकूल कूटनीतिक माहौल भी जरूरी है।

यानी तस्वीर पूरी तरह टकराव की नहीं है। दोनों देशों के बीच बातचीत और संबंध सुधारने की कोशिशें भी चल रही हैं।

भारत के लिए बांग्लादेश क्यों महत्वपूर्ण है?

बांग्लादेश भारत की 'Neighbourhood First' नीति और पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।

बांग्लादेश के रास्ते भारत के पूर्वोत्तर राज्यों तक सड़क, रेल और जलमार्ग कनेक्टिविटी मजबूत करने की बड़ी संभावनाएं हैं। इसके अलावा सीमा सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी सहयोग, व्यापार और ऊर्जा के क्षेत्र में भी दोनों देशों के साझा हित हैं।

इसलिए दोनों देशों के बीच लंबे समय तक तनाव किसी के हित में नहीं होगा।

क्या 1971 की विरासत रिश्तों को फिर मजबूत कर सकती है?

भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में 1971 की विरासत एक मजबूत आधार हो सकती है। हालांकि, मौजूदा दौर की कूटनीति केवल इतिहास पर नहीं चल सकती।

आज दोनों देशों को सीमा, पानी, व्यापार, सुरक्षा और राजनीतिक मतभेदों पर व्यावहारिक समाधान तलाशने होंगे।

अंतरराष्ट्रीय संकट समूह के विश्लेषण के मुताबिक शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद नई दिल्ली और ढाका के बीच अविश्वास बढ़ा है, लेकिन संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की गुंजाइश बनी हुई है।

एक नजर में

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निष्कर्ष

भारत और बांग्लादेश का रिश्ता सिर्फ पड़ोसी देशों का रिश्ता नहीं है, बल्कि इसके पीछे 1971 की एक साझा ऐतिहासिक विरासत भी है। भारत ने बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में निर्णायक भूमिका निभाई थी, लेकिन आज दोनों देशों के बीच राजनीतिक अविश्वास और कई द्विपक्षीय मुद्दों को लेकर तनाव बना हुआ है।

कांग्रेस नेता की चिंता ऐसे समय में सामने आई है जब दोनों देश रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं। मौजूदा परिस्थितियों में इतिहास को याद रखने के साथ-साथ व्यावहारिक कूटनीति और आपसी हितों पर ध्यान देना ही आगे का रास्ता हो सकता है।

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