CPM से TMC और अब BJP तक: बंगाल में सत्ता बदली, लेकिन सियासी हिंसा का इतिहास नहीं बदला
पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता का बड़ा परिवर्तन हुआ और BJP ने TMC के 15 साल लंबे शासन का अंत कर सरकार बनाई। लेकिन सत्ता बदलने के बावजूद राजनीतिक हिंसा का सवाल खत्म नहीं हुआ। मई के चुनाव बाद हिंसा से लेकर अगस्त में बांकुड़ा की ताजा घटना तक आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। बंगाल की राजनीति में हिंसा कोई नई कहानी नहीं है; इसका इतिहास कांग्रेस और वाम राजनीति के दौर से लेकर TMC और अब BJP के दौर तक फैला हुआ है।
लेखक
Vinay Mishra

बंगाल में फिर वही सवाल: सत्ता बदली, क्या सियासत बदली?
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक शब्द पिछले कई दशकों से बार-बार सुनाई देता रहा है—‘पोरिबर्तन’, यानी बदलाव।
2011 में यही नारा 34 साल लंबे वाम मोर्चा शासन के खिलाफ TMC की राजनीति का सबसे बड़ा हथियार बना था। 2026 में फिर सत्ता बदली और BJP ने TMC के 15 साल लंबे शासन को समाप्त कर दिया। लेकिन इस बार भी एक सवाल बंगाल की सड़कों पर खड़ा है—क्या सत्ता परिवर्तन के साथ राजनीतिक हिंसा का दौर भी खत्म होगा?
ताजा घटनाक्रम इस सवाल को और गंभीर बनाता है।
बांकुड़ा के इंदास इलाके में एक CJP कार्यकर्ता के पिता की मौत के मामले में BJP समर्थकों पर हमला करने के आरोप लगे हैं। पुलिस ने मामले में आठ लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें एक BJP नेता भी शामिल बताया गया है। हालांकि BJP की ओर से आरोपों से इनकार किया गया है और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने पार्टी के किसी संबंध से इनकार करते हुए दोषियों पर कार्रवाई की बात कही है। मामले की जांच जारी है।
यानी अभी इस घटना में राजनीतिक जिम्मेदारी को अंतिम रूप से तय करना जल्दबाजी होगी। लेकिन घटना ने बंगाल की पुरानी राजनीतिक बहस को फिर सामने ला दिया है।
CPM से TMC और अब BJP: तीन दौर, एक बड़ा सवाल
पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का इतिहास केवल TMC और BJP की लड़ाई तक सीमित नहीं है।
राजनीतिक इतिहासकारों और विशेषज्ञों के अनुसार, राज्य में राजनीतिक हिंसा की जड़ें कई दशक पुरानी हैं। 1960 और 1970 के दशक में कांग्रेस और वाम दलों के बीच संघर्ष, नक्सल आंदोलन और उसके बाद चुनावी राजनीति में हिंसा ने राज्य के राजनीतिक माहौल को गहराई से प्रभावित किया।
1977 में Left Front सत्ता में आया और अगले 34 वर्षों तक राज्य की राजनीति पर उसका दबदबा रहा। इस दौर में भी राजनीतिक संघर्ष और हिंसा के आरोप सामने आते रहे।
इसके बाद 2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में TMC ने सत्ता हासिल की। ‘पोरिबर्तन’ का वादा करते हुए TMC ने वाम शासन का अंत किया।
लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद भी राजनीतिक हिंसा का आरोप खत्म नहीं हुआ।
इतिहास पर नजर डालें तो तस्वीर साफ दिखाई देती है—दल बदले, सरकारें बदलीं, लेकिन राजनीतिक वर्चस्व के लिए संघर्ष की संस्कृति कई इलाकों में बनी रही।
2018 पंचायत चुनाव से 2021 तक: हिंसा ने बढ़ाई चिंता
बंगाल की राजनीति में पंचायत चुनाव लंबे समय से बेहद संवेदनशील रहे हैं।
2018 के पंचायत चुनाव के दौरान हिंसा, विपक्षी उम्मीदवारों को नामांकन से रोकने और चुनावी प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप लगे थे। इसी दौर में BJP बंगाल में तेजी से प्रमुख विपक्षी शक्ति के रूप में उभरने लगी।
2021 के विधानसभा चुनाव ने भी हिंसा की बहस को और तेज किया। एक विश्लेषण के मुताबिक, ACLED के आंकड़ों में 2021 का बंगाल विधानसभा चुनाव 300 हिंसक घटनाओं और 58 मौतों के साथ सबसे गंभीर चुनावी हिंसा वाले चुनावों में दर्ज हुआ।
2021 के चुनाव के बाद भी राजनीतिक हिंसा की खबरें सामने आईं। मानवाधिकार से जुड़े मामलों में जांच और अदालतों की भूमिका भी चर्चा में रही।
2026 में आया सबसे बड़ा ‘पोरिबर्तन’
2026 का विधानसभा चुनाव बंगाल की राजनीति के लिए ऐतिहासिक रहा।
BJP ने चुनाव में बड़ी जीत हासिल की और TMC के 15 साल लंबे शासन का अंत कर दिया। सत्ता परिवर्तन के बाद राज्य में पहली बार BJP सरकार बनी।
लेकिन सरकार बदलने के तुरंत बाद ही कई इलाकों से BJP और TMC समर्थकों के बीच हिंसा, हमले और पार्टी कार्यालयों में तोड़फोड़ के आरोप सामने आए।
चुनाव परिणाम के बाद कम से कम चार मौतों की रिपोर्ट सामने आई थी, जिसमें BJP और TMC दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए। चुनाव आयोग ने भी स्थानीय प्रशासन से रिपोर्ट मांगी और हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी।
ACLED के जून 2026 के विश्लेषण के मुताबिक, मई में सरकार बदलने के बाद राजनीतिक हिंसा में बढ़ोतरी दर्ज की गई। संगठन ने चुनाव परिणाम के बाद राजनीतिक दलों से जुड़े कम से कम 12 लोगों की मौत का उल्लेख किया, जिनमें चार BJP और आठ TMC समर्थक बताए गए।
यह आंकड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है—क्या बंगाल में ‘पोरिबर्तन’ केवल सत्ता का परिवर्तन बनकर रह गया है?
अब BJP सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती
BJP ने जिस राजनीतिक मुद्दे को लेकर TMC पर सबसे ज्यादा हमला किया था, उनमें कानून-व्यवस्था और राजनीतिक हिंसा प्रमुख थे।
अब वही जिम्मेदारी BJP सरकार के सामने है।
नई सरकार से जनता की अपेक्षा स्वाभाविक रूप से बड़ी है। यदि विपक्षी कार्यकर्ता सुरक्षित नहीं हैं, राजनीतिक मतभेद हिंसा में बदलते हैं या स्थानीय स्तर पर पार्टी समर्थकों के बीच टकराव बढ़ता है, तो इसका सीधा असर प्रशासन और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर पड़ेगा।
यही कारण है कि मौजूदा सरकार के लिए केवल राजनीतिक जीत पर्याप्त नहीं होगी। उसे यह साबित करना होगा कि सत्ता परिवर्तन के बाद शासन की कार्यसंस्कृति भी बदली है।
बांकुड़ा की ताजा घटना क्यों महत्वपूर्ण है?
अगस्त में बांकुड़ा की घटना ने इस बहस को फिर तेज कर दिया है।
रिपोर्टों के अनुसार, CJP से जुड़े एक व्यक्ति के पिता पर उनके घर में हमला हुआ और बाद में उनकी मौत हो गई। आरोप BJP समर्थकों पर लगाए गए हैं। इस मामले में आठ लोगों की गिरफ्तारी की खबर है। दूसरी ओर BJP ने पार्टी की संलिप्तता से इनकार किया है। पुलिस और प्रशासन की जांच इस मामले में निर्णायक होगी।
CJP की ओर से राज्य सरकार को आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए 10 दिन का अल्टीमेटम दिए जाने की भी रिपोर्ट है।
इस घटना को पूरे राज्य में राजनीतिक हिंसा का प्रमाण बताना अभी उचित नहीं होगा। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि स्थानीय स्तर पर राजनीतिक पहचान और विरोध आज भी कई जगह तनाव का कारण बन सकते हैं।
आम लोगों पर क्या असर पड़ता है?
राजनीतिक हिंसा का सबसे बड़ा नुकसान राजनीतिक दलों को नहीं, बल्कि आम नागरिकों को उठाना पड़ता है।
जब किसी इलाके में राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो सबसे पहले सामान्य जनजीवन प्रभावित होता है। दुकानें बंद होती हैं, सड़कें बाधित होती हैं, स्थानीय कारोबार पर असर पड़ता है और परिवारों में असुरक्षा की भावना पैदा होती है।
ग्रामीण बंगाल में इसका असर और गहरा हो सकता है। पंचायत, स्थानीय ठेके, जमीन, रोजगार और सरकारी योजनाओं तक पहुंच जैसे मुद्दे कई बार स्थानीय राजनीतिक नेटवर्क से जुड़ जाते हैं।
इसी वजह से राजनीतिक हिंसा केवल चुनावी मौसम की समस्या नहीं है। यह प्रशासन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक भरोसे को प्रभावित करने वाली समस्या बन सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार हिंसा क्यों टिकती है?
बंगाल में राजनीतिक हिंसा को समझने के लिए केवल ‘कौन सी पार्टी सत्ता में है’ यह देखना पर्याप्त नहीं है।
विशेषज्ञों के अनुसार राज्य में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लंबे समय से स्थानीय संसाधनों, पंचायत व्यवस्था, संगठनात्मक नियंत्रण और राजनीतिक संरक्षण से जुड़ी रही है। समय के साथ हिंसा का स्वरूप भी बदला है—पहले वैचारिक संघर्ष प्रमुख था, जबकि बाद के दौर में स्थानीय सत्ता और आर्थिक हित भी महत्वपूर्ण कारक बन गए।
यही वजह है कि सरकार बदलने के बावजूद राजनीतिक हिंसा अपने पुराने ढांचे में वापस दिखाई दे सकती है।
क्या इस बार सचमुच बदलाव संभव है?
बंगाल की जनता ने 2026 में एक बार फिर बड़ा राजनीतिक बदलाव किया है।
लेकिन असली ‘पोरिबर्तन’ केवल मुख्यमंत्री या सत्ताधारी पार्टी बदलने से नहीं होगा।
असली बदलाव तब माना जाएगा जब—
विपक्षी कार्यकर्ता बिना डर के राजनीति कर सकें।
चुनाव में उम्मीदवारों और मतदाताओं को सुरक्षा मिले।
राजनीतिक हिंसा के मामलों में निष्पक्ष जांच हो।
दोषियों की पहचान पार्टी देखकर नहीं, सबूत देखकर हो।
पुलिस प्रशासन पर राजनीतिक दबाव की शिकायतें कम हों।
स्थानीय स्तर पर राजनीतिक संरक्षण और हिंसा का गठजोड़ टूटे।
निष्कर्ष: बंगाल को एक और ‘पोरिबर्तन’ नहीं, स्थायी बदलाव चाहिए
पश्चिम बंगाल ने पिछले छह दशकों में कई राजनीतिक दौर देखे हैं। कांग्रेस से वाम मोर्चा, वाम मोर्चे से TMC और अब TMC से BJP—हर सत्ता परिवर्तन को ‘नए बंगाल’ की शुरुआत बताया गया।
लेकिन राजनीतिक हिंसा की घटनाएं बार-बार यह सवाल पूछती रही हैं कि क्या सिर्फ सत्ता बदलना पर्याप्त है?
2026 का बदलाव BJP के लिए जितनी बड़ी राजनीतिक उपलब्धि है, उतनी ही बड़ी प्रशासनिक परीक्षा भी।
बांकुड़ा की ताजा घटना में आरोपों की सच्चाई जांच से सामने आएगी, लेकिन इस घटना ने एक पुराना सवाल जरूर जिंदा कर दिया है—क्या बंगाल इस बार वास्तव में राजनीतिक हिंसा के पुराने चक्र से बाहर निकल पाएगा?
क्योंकि बंगाल को अब केवल एक और ‘पोरिबर्तन’ नहीं चाहिए। जरूरत ऐसे बदलाव की है जिसमें सत्ता किसी की भी हो, कानून का डर सभी के लिए समान हो और राजनीतिक असहमति की कीमत किसी नागरिक को अपनी जान, घर या रोजमर्रा की जिंदगी से न चुकानी पड़े।
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