गोवा नाइटक्लब अग्निकांड में लूथरा ब्रदर्स को सुप्रीम कोर्ट से झटका, बॉम्बे HC का जमानत रद्द करने का आदेश बरकरार
गोवा के चर्चित Birch by Romeo Lane नाइटक्लब अग्निकांड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सौरभ लूथरा, गौरव लूथरा और उनके कारोबारी सहयोगी अजय गुप्ता को बड़ा झटका दिया है। शीर्ष अदालत ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया, जिसमें तीनों की जमानत रद्द कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने तीनों आरोपियों को दो सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया है और ट्रायल कोर्ट से मामले में आरोप तय करने की प्रक्रिया तेज करने को कहा है।
लेखक
Vinay Mishra
नई दिल्ली: गोवा के बहुचर्चित नाइटक्लब अग्निकांड मामले में लूथरा ब्रदर्स को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने Birch by Romeo Lane नाइटक्लब के सह-मालिक सौरभ लूथरा और गौरव लूथरा के साथ कारोबारी साझेदार अजय गुप्ता की जमानत बहाल करने से इनकार कर दिया है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने सोमवार को तीनों की याचिकाएं खारिज करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट के जमानत रद्द करने के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने तीनों आरोपियों को दो सप्ताह के भीतर संबंधित अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। साथ ही ट्रायल कोर्ट को मामले की कार्यवाही में तेजी लाने को कहा गया।
25 लोगों की मौत से जुड़ा है मामला
यह मामला उत्तरी गोवा के अर्पोरा इलाके में स्थित Birch by Romeo Lane नाइटक्लब में 6 दिसंबर 2025 की रात लगी भीषण आग से जुड़ा है। हादसे में 25 लोगों की मौत हुई थी और करीब 50 लोग घायल हुए थे।
आग के बाद क्लब की सुरक्षा व्यवस्था और संचालन को लेकर कई गंभीर सवाल उठे थे। जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया था कि प्रतिष्ठान के पास जरूरी मंजूरियां और पर्याप्त अग्नि सुरक्षा इंतजाम नहीं थे। जांच में अंदर फायर शो और सुरक्षा मानकों के उल्लंघन से जुड़े आरोप भी सामने आए।
पहले ट्रायल कोर्ट ने दी थी जमानत
मामले में उत्तरी गोवा के मापुसा की अतिरिक्त सत्र अदालत ने तीनों आरोपियों को अलग-अलग समय पर जमानत दी थी। इसके बाद गोवा सरकार ने इस फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी।
अगस्त में बॉम्बे हाई कोर्ट ने राज्य की अपील स्वीकार करते हुए तीनों आरोपियों की जमानत रद्द कर दी थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि ट्रायल कोर्ट ने जांच के दौरान सामने आए महत्वपूर्ण तथ्यों और सामग्री का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं किया।
हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी थी चुनौती
जमानत रद्द होने के बाद सौरभ लूथरा, गौरव लूथरा और अजय गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। आरोपियों की ओर से वरिष्ठ वकीलों ने शीर्ष अदालत के सामने अपनी दलीलें रखीं, जबकि गोवा सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू पेश हुए।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इसका सीधा मतलब है कि फिलहाल तीनों आरोपियों को जेल लौटना होगा और उन्हें दो सप्ताह के भीतर सरेंडर करना होगा।
लूथरा ब्रदर्स आग के बाद थाईलैंड चले गए थे
हादसे के बाद सौरभ और गौरव लूथरा कथित तौर पर भारत से बाहर चले गए थे। दोनों को बाद में थाईलैंड में हिरासत में लिया गया और भारत लाया गया। इसके बाद गोवा पुलिस ने मामले में उनकी गिरफ्तारी की थी।
मामले में अजय गुप्ता समेत अन्य आरोपियों के खिलाफ भी कार्रवाई हुई। पुलिस जांच में कथित तौर पर क्लब के संचालन, लाइसेंस, अग्नि सुरक्षा और आयोजन से जुड़े कई पहलुओं की जांच की गई।
अब ट्रायल में तेजी लाने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ जमानत के मुद्दे पर फैसला नहीं दिया, बल्कि ट्रायल कोर्ट को आरोप तय करने की प्रक्रिया में तेजी लाने का निर्देश भी दिया है।
इससे संकेत मिलता है कि शीर्ष अदालत मामले की न्यायिक प्रक्रिया को लंबे समय तक खिंचने देने के पक्ष में नहीं है। अब निचली अदालत में आगे की कार्रवाई और आरोप तय करने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
क्या था आग के पीछे का आरोप?
जांच के दौरान अधिकारियों ने नाइटक्लब में सुरक्षा मानकों और जरूरी अनुमतियों को लेकर सवाल उठाए थे। रिपोर्टों के मुताबिक, प्रतिष्ठान में कथित तौर पर पर्याप्त फायर सेफ्टी इंतजाम नहीं थे और वहां फायर शो भी आयोजित किया गया था।
हाई कोर्ट के सामने रखी गई सामग्री में क्लब के संचालन से जुड़े कथित लाइसेंस और संरचना की वैधता को लेकर भी सवाल उठाए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या मतलब?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद तीनों आरोपियों को फिलहाल जमानत का लाभ नहीं मिलेगा। उन्हें दो सप्ताह के भीतर सरेंडर करना होगा।
हालांकि, यह फैसला मामले में उनकी दोषसिद्धि नहीं है। अग्निकांड से जुड़े आरोपों पर अंतिम फैसला ट्रायल के दौरान सबूतों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होगा।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है—जमानत रद्द करने के बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा और मामले की सुनवाई आगे बढ़ेगी।
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