जर्जर स्कूल में पढ़ने को मजबूर छात्र, धरने पर बैठकर अधिकारियों से पूछा- अगर आपके बच्चे होते तो क्या ऐसी सुविधा देते?
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में सरकारी स्कूल की मूलभूत सुविधाओं को लेकर छात्रों का आक्रोश सामने आया। किशनपुर के सर्वोदय इंटर कॉलेज में कक्षा 6 से 12वीं तक के विद्यार्थियों ने पेयजल, जर्जर भवन, टपकती छत, पंखे, फर्नीचर और खेल सुविधाओं की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। रिपोर्ट के मुताबिक स्कूल में करीब 1,850 विद्यार्थियों के लिए सिर्फ 17 कमरे हैं और कई कमरे जर्जर हालत में हैं। प्रशासनिक अधिकारियों के आश्वासन के बाद प्रदर्शन समाप्त हुआ।
लेखक
Vinay Mishra

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर से सरकारी स्कूलों की बदहाल व्यवस्था को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। यहां पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को जब लंबे समय तक बुनियादी सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़ा तो उनका सब्र टूट गया। विद्यार्थी स्कूल के गेट पर ही प्रदर्शन करने पहुंच गए और प्रशासन के सामने अपनी समस्याएं रखीं।
मामला किशनपुर कस्बे के सर्वोदय इंटर कॉलेज से जुड़ा है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, यहां कक्षा 6 से 12वीं तक के विद्यार्थियों ने पेयजल, पंखे, जर्जर भवन, टपकती छत, फर्नीचर और खेल सुविधाओं को लेकर विरोध जताया। छात्रों ने बैनर और पोस्टर के जरिए प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की मांग की।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन बच्चों से देश का भविष्य बनने की उम्मीद की जाती है, क्या उन्हें पढ़ने के लिए सुरक्षित और बुनियादी सुविधाओं वाला वातावरण भी नहीं मिलना चाहिए?
1,850 बच्चों के लिए सिर्फ 17 कमरे, कई कमरे जर्जर
इस पूरे मामले की सबसे चिंताजनक तस्वीर स्कूल की क्षमता से सामने आती है। रिपोर्ट के मुताबिक विद्यालय में करीब 1,850 विद्यार्थियों का नामांकन है, जबकि स्कूल में केवल 17 कमरे हैं।
स्थिति इतनी गंभीर बताई गई कि करीब 40 विद्यार्थियों की क्षमता वाले कमरों में 70 से अधिक बच्चों को बैठना पड़ता है। इनमें से चार कमरे बेहद जर्जर स्थिति में बताए गए हैं। कुछ कक्षाएं टिनशेड के नीचे भी संचालित की जा रही हैं।
ऐसे माहौल में विद्यार्थियों के सामने सिर्फ पढ़ाई की समस्या नहीं है, बल्कि उनकी सुरक्षा भी बड़ा सवाल बन जाती है।
टपकती छत और खराब पंखों के बीच पढ़ाई
प्रदर्शन कर रहे छात्रों की शिकायत केवल भवन तक सीमित नहीं थी। विद्यार्थियों ने स्कूल में पर्याप्त पंखे नहीं होने की समस्या भी उठाई।
रिपोर्ट के अनुसार, कई कमरों में पंखे खराब हैं और गर्मी के कारण बच्चों के बेहोश होने की घटनाओं का भी उल्लेख किया गया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब एक कक्षा में क्षमता से कहीं अधिक बच्चे बैठ रहे हों और हवा की पर्याप्त व्यवस्था भी न हो, तो पढ़ाई का माहौल कैसा होगा?
बारिश के मौसम में टपकती छत और जर्जर कमरों की समस्या इस चिंता को और गंभीर बना देती है।
पानी की व्यवस्था पर भी छात्रों का सवाल
प्रदर्शन के दौरान विद्यार्थियों ने पेयजल की समस्या को भी प्रमुखता से उठाया। रिपोर्ट में छात्रों की ओर से यह आरोप सामने आया कि स्कूल में वाटर कूलर मौजूद है, लेकिन उसका इस्तेमाल मुख्य रूप से शिक्षक और कर्मचारी करते हैं और विद्यार्थियों को उससे पानी लेने की सुविधा नहीं मिलती।
स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के लिए स्वच्छ और पर्याप्त पेयजल कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि बुनियादी आवश्यकता है। खासकर गर्मी के मौसम में इसकी कमी सीधे विद्यार्थियों के स्वास्थ्य और पढ़ाई दोनों को प्रभावित कर सकती है।
जमीन पर बैठकर पढ़ने को मजबूर बच्चे
स्कूल में फर्नीचर की कमी भी विद्यार्थियों की परेशानी का एक बड़ा कारण बताई गई है। छात्रों के अनुसार, कक्षा 8 तक के कई बच्चों के लिए पर्याप्त फर्नीचर उपलब्ध नहीं है और उन्हें जमीन पर बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती है।
यह स्थिति उस समय और गंभीर हो जाती है जब एक ही स्कूल में बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ रहे हों। पढ़ाई के लिए किताब, शिक्षक और पाठ्यक्रम जितने जरूरी हैं, उतना ही जरूरी सुरक्षित कमरा, बैठने की जगह, रोशनी, हवा और पीने का पानी भी है।
खेल सुविधाओं को लेकर भी नाराजगी
विद्यार्थियों ने स्कूल की खेल व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। रिपोर्ट के अनुसार, छात्रों का आरोप है कि खेल शिक्षक होने के बावजूद नियमित खेल गतिविधियां नहीं होतीं और खेल मैदान की साफ-सफाई तथा देखरेख भी पर्याप्त नहीं है।
स्कूल शिक्षा केवल किताबों और परीक्षा तक सीमित नहीं होती। खेल, शारीरिक गतिविधियां और स्वस्थ वातावरण भी बच्चों के संपूर्ण विकास का हिस्सा हैं।
छात्रों ने लगाए बैनर, कहा- डीएम को आना होगा
अपनी मांगों को प्रशासन तक पहुंचाने के लिए विद्यार्थियों ने स्कूल के बाहर बैनर और पोस्टर लगाए। प्रदर्शन के दौरान छात्रों की मांग थी कि प्रशासन मौके पर पहुंचे और उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुने।
सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची। नायब तहसीलदार नितिन कुमार ने भी विद्यालय पहुंचकर छात्रों की समस्याएं सुनीं। इसके बाद जिला विद्यालय निरीक्षक राकेश कुमार के आश्वासन पर करीब चार घंटे चला प्रदर्शन समाप्त हुआ। प्रदर्शन सुबह लगभग 8 बजे शुरू हुआ था और दोपहर करीब 12 बजे खत्म हुआ।
प्रधानाचार्य लाल बहादुर सिंह के अनुसार, विद्यार्थियों की मांगों को शासन तक भेजा जा चुका है।
सिर्फ फतेहपुर नहीं, कई राज्यों में सामने आ रही ऐसी तस्वीर
जर्जर स्कूल भवन और बुनियादी सुविधाओं की कमी का मुद्दा केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं दिखाई देता। जुलाई 2026 में मध्य प्रदेश के मंडला जिले को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट में 700 से अधिक सरकारी स्कूल भवनों के जर्जर होने की बात कही गई थी। इसी रिपोर्ट में सोढाटोला प्राथमिक स्कूल के 39 बच्चों के करीब दो वर्षों से अस्थायी टीन शेड में पढ़ने का उल्लेख किया गया।
वहीं मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में ब्रिटिशकालीन शासकीय सुभाष उत्कृष्ट विद्यालय की जर्जर इमारत को लेकर भी छात्रों और अभिभावकों की चिंता सामने आई। रिपोर्ट के मुताबिक स्कूल में 500 से अधिक विद्यार्थी हैं और क्षतिग्रस्त कमरों में पढ़ाई को लेकर प्रशासन ने वैकल्पिक व्यवस्था की।
झारखंड के पटमदा में भी जुलाई 2026 में जर्जर भवन के कारण 426 विद्यार्थियों के एक ही कमरे में पढ़ने की खबर सामने आई थी।
यानी मामला केवल एक स्कूल की शिकायत नहीं है। मानसून के दौरान जर्जर सरकारी स्कूलों की स्थिति बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा बड़ा सार्वजनिक मुद्दा बन जाती है।
हालिया घटनाओं ने बढ़ाई चिंता
स्कूल भवनों की सुरक्षा को लेकर चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि हाल के दिनों में अलग-अलग राज्यों से स्कूल भवनों से जुड़ी दुर्घटनाओं की खबरें सामने आती रही हैं।
महाराष्ट्र के सोलापुर में 12 अगस्त 2026 को जिला परिषद स्कूल में स्लैब गिरने से 13 छात्रों के घायल होने की खबर सामने आई। यह घटना बताती है कि स्कूल भवन की सुरक्षा केवल प्रशासनिक कागजी कार्रवाई का विषय नहीं, बल्कि सीधे बच्चों की जिंदगी से जुड़ा मुद्दा है।
ऐसे मामलों के बाद जर्जर स्कूलों की पहचान, तकनीकी जांच, मरम्मत और आवश्यकता पड़ने पर वैकल्पिक भवन की व्यवस्था को प्राथमिकता देना बेहद जरूरी हो जाता है।
बच्चों का सवाल सिर्फ सुविधा का नहीं, सुरक्षा का है
छात्रों का विरोध केवल पंखे, पानी या फर्नीचर के लिए नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा सवाल है—क्या सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को भी सुरक्षित और सम्मानजनक शिक्षा का समान अधिकार मिलना चाहिए?
जब कोई बच्चा जर्जर कमरे में बैठता है, टपकती छत के नीचे पढ़ता है या गर्मी में खराब पंखे के बीच घंटों बैठने को मजबूर होता है, तो इसका असर उसकी पढ़ाई पर भी पड़ता है।
शिक्षा व्यवस्था का मूल्यांकन केवल परीक्षा परिणाम और नामांकन संख्या से नहीं किया जा सकता। स्कूल की इमारत, सुरक्षा, स्वच्छता, पेयजल, फर्नीचर और सीखने का वातावरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
अब प्रशासन के सामने क्या चुनौती है?
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आश्वासन को जमीन पर उतारा जाए। प्रदर्शन समाप्त होने के बाद यदि केवल तत्काल पानी या अन्य छोटी सुविधाओं की व्यवस्था होती है, लेकिन जर्जर कमरों, टपकती छत और क्षमता से अधिक विद्यार्थियों की समस्या बनी रहती है, तो मूल समस्या का समाधान नहीं होगा।
प्रशासन के लिए जरूरी है कि:
जर्जर कमरों का तकनीकी निरीक्षण कराया जाए।
असुरक्षित कमरों में विद्यार्थियों को बैठाने से रोका जाए।
जरूरत के अनुसार वैकल्पिक कक्षाओं की व्यवस्था हो।
पेयजल की समान सुविधा विद्यार्थियों को भी मिले।
खराब पंखों और बिजली व्यवस्था की तत्काल मरम्मत हो।
पर्याप्त फर्नीचर उपलब्ध कराया जाए।
खेल मैदान और खेल गतिविधियों को व्यवस्थित किया जाए।
लंबे समय के लिए नए भवन या व्यापक मरम्मत की योजना तैयार की जाए।
सवाल वही है जो छात्रों ने उठाया
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश छात्रों का विरोध नहीं, बल्कि उनका सवाल है। अगर किसी अधिकारी, जनप्रतिनिधि या जिम्मेदार व्यक्ति का अपना बच्चा इसी स्कूल में पढ़ रहा होता, तो क्या वह उसे उसी जर्जर कमरे में बैठने देता?
यह सवाल भावनात्मक जरूर है, लेकिन इसके पीछे एक गंभीर प्रशासनिक और सामाजिक मुद्दा छिपा है।
सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे किसी भी मायने में कम अधिकार वाले नागरिक नहीं हैं। उन्हें भी सुरक्षित भवन, साफ पानी, पर्याप्त रोशनी, हवा, फर्नीचर और बेहतर शिक्षा का अधिकार है।
निष्कर्ष
फतेहपुर के विद्यार्थियों का प्रदर्शन एक स्थानीय स्कूल की समस्या को सामने लाता है, लेकिन इसका संदेश कहीं बड़ा है। जब बच्चे खुद अपने स्कूल की बुनियादी सुविधाओं के लिए सड़क या स्कूल गेट पर उतरने को मजबूर हों, तो यह शिक्षा व्यवस्था के लिए बड़ा संकेत है।
अब निगाह प्रशासन पर है कि दिए गए आश्वासन कितनी जल्दी जमीन पर दिखाई देते हैं। जर्जर भवन की समस्या का स्थायी समाधान, सुरक्षित कक्षाओं की व्यवस्था और विद्यार्थियों को जरूरी सुविधाएं मिलना ही इस पूरे विवाद का वास्तविक समाधान होगा।
क्योंकि स्कूल केवल चार दीवारों का नाम नहीं है। यह बच्चों के भविष्य की नींव है। और उस नींव को मजबूत रखना सरकार, प्रशासन और समाज—तीनों की जिम्मेदारी है।
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