मेहदी हसन की वो गजल, टूटे दिल की खामोश टीस को करता है बयां; सीधा रूह में बसती है आवाज
कुछ गजलें सिर्फ सुनी नहीं जातीं, उन्हें महसूस किया जाता है। मेहदी हसन की “रंजिश ही सही” ऐसी ही गजल है, जिसमें जुदाई, अधूरी मोहब्बत और वापस लौटने की एक आखिरी उम्मीद बेहद खूबसूरती से सामने आती है। इस गजल के बोल मशहूर उर्दू शायर अहमद फ़राज़ ने लिखे थे और मेहदी हसन की गायकी ने इसे खास पहचान दी।
लेखक
Vinay Mishra
जब जुदाई में भी वापसी की उम्मीद बाकी हो
मेहदी हसन की आवाज में एक ऐसी गहराई थी, जो शब्दों के पीछे छिपे दर्द को भी सुनने वाले तक पहुंचा देती थी। उनकी मशहूर गजलों में “रंजिश ही सही” का नाम खास तौर पर लिया जाता है। अहमद फ़राज़ की लिखी यह गजल उस प्रेम की कहानी कहती है, जहां रिश्ता टूट चुका है, लेकिन दिल अब भी सामने वाले के लौट आने का इंतजार कर रहा है।
इस गजल का केंद्रीय भाव शिकायत से ज्यादा विरह और उम्मीद का है। शायर अपने महबूब से कहता है कि अगर प्रेम के पुराने रिश्ते पहले जैसे नहीं रहे, तब भी लौट आओ। मुलाकात चाहे पुराने प्यार को वापस लाने के लिए न हो, लेकिन कम से कम उस दूरी को महसूस करने के लिए ही सही।
अहमद फ़राज़ के शब्द और मेहदी हसन की आवाज
“रंजिश ही सही” को अहमद फ़राज़ की लोकप्रिय गजलों में गिना जाता है। इसे शुरुआत में इक़बाल बानो ने भी गाया था, लेकिन मेहदी हसन की प्रस्तुति ने इसे अलग पहचान दिलाई।
मेहदी हसन की गायकी की खासियत थी कि वे किसी शब्द को सिर्फ गाते नहीं थे, बल्कि उसके भाव को आवाज में उतार देते थे। यही वजह है कि इस गजल में मौजूद जुदाई, शिकायत, उम्मीद और अकेलेपन का भाव सुनने वाले को बहुत करीब महसूस होता है।
टूटे रिश्ते की सबसे शांत पुकार
इस गजल की खूबसूरती यह है कि इसमें प्रेम को पाने की जिद से ज्यादा उसे खो देने का दर्द है। सामने वाला नाराज है, रिश्ता बदल चुका है, लेकिन दिल की उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
यही भाव इसे उन लोगों से जोड़ता है जिन्होंने कभी किसी अपने को खोया हो, किसी रिश्ते में दूरी महसूस की हो या किसी पुराने रिश्ते की याद अपने भीतर संभालकर रखी हो।
गजल की शुरुआत ही श्रोता को इसी भावभूमि में ले जाती है—शिकायत के बावजूद वापसी की गुंजाइश। इसके बाद पूरी रचना उसी भाव को अलग-अलग परतों में खोलती है।
मेहदी हसन के बाद भी कायम है जादू
मेहदी हसन की “रंजिश ही सही” आज भी संगीत प्रेमियों के बीच सुनी जाती है। Spotify पर यह गाना उनके लोकप्रिय रिकॉर्डिंग्स में शामिल है, जबकि Rekhta ने भी इसे मेहदी हसन की प्रसिद्ध गजलों की सूची में रखा है।
बाद के वर्षों में इस गजल को कई कलाकारों ने अपनी शैली में पेश किया। नई पीढ़ी तक इसे पहुंचाने वाली प्रस्तुतियों में अली सेठी की व्याख्या भी शामिल है। इससे पता चलता है कि दशकों पुरानी उर्दू शायरी और गजल की संवेदना आज भी नए श्रोताओं के बीच जगह बना सकती है।
आवाज खत्म होती है, एहसास नहीं
मेहदी हसन का निधन 2012 में हुआ, लेकिन उनकी आवाज में दर्ज गजलें आज भी सुनने वालों के बीच मौजूद हैं। “रंजिश ही सही” की खासियत यही है कि यह सिर्फ एक प्रेम गीत नहीं लगती—यह उस खामोश दर्द की आवाज बन जाती है जिसे इंसान अक्सर शब्दों में कह नहीं पाता।
शायद इसी वजह से जब मेहदी हसन की आवाज में यह गजल बजती है, तो कई श्रोताओं को ऐसा लगता है जैसे कोई पुराना दर्द अचानक फिर सामने आकर बैठ गया हो।
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