मुर्शिदाबाद में सेब की खेती ने मचाया तहलका, 45 डिग्री गर्मी में तैयार हो रहे विदेशी किस्म के सेब
मुर्शिदाबाद, जो अपने मशहूर आमों के लिए दुनिया भर में जाना जाता है, अब सेब की खेती को लेकर चर्चा में है। बेलडांगा के किसान रुपेश दास ने गर्म जलवायु में विदेशी किस्म के सेब उगाकर नया रिकॉर्ड बना दिया है। इस साल उत्पादन पिछले वर्ष की तुलना में चार गुना बढ़ा है। उनकी सफलता अब पूरे जिले के किसानों के लिए प्रेरणा बनती जा रही है।
लेखक
Vinay Mishra

मुर्शिदाबाद में सेब की खेती ने मचाया तहलका, 45 डिग्री गर्मी में तैयार हो रहे विदेशी किस्म के सेब
पश्चिम बंगाल का मुर्शिदाबाद जिला अब तक अपने स्वादिष्ट आमों के लिए देश-दुनिया में मशहूर रहा है। यहां के आमों की खुशबू और मिठास की चर्चा विदेशों तक होती है। लेकिन अब इसी जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने कृषि विशेषज्ञों से लेकर आम लोगों तक सभी को हैरान कर दिया है।
मुर्शिदाबाद के बेलडांगा इलाके में रहने वाले किसान रुपेश दास ने ऐसा काम कर दिखाया है जिसे लोग असंभव मानते थे। उन्होंने गर्म जलवायु वाले इलाके में सेब की खेती कर न केवल सफलता हासिल की, बल्कि इस साल रिकॉर्ड उत्पादन भी किया है।
सबसे बड़ी बात यह है कि उनके बागान में उग रहे सेब स्वाद, रंग और गुणवत्ता के मामले में हिमाचल और विदेशों के सेबों को भी चुनौती दे रहे हैं।
चार गुना बढ़ा उत्पादन, लोगों की भीड़ उमड़ रही
रुपेश दास का कहना है कि पिछले साल की तुलना में इस वर्ष उनके बागान में सेब का उत्पादन लगभग चार गुना अधिक हुआ है। यह खबर फैलते ही आसपास के इलाकों के लोग उनके बागान को देखने पहुंच रहे हैं।
मुर्शिदाबाद जैसे गर्म इलाके में सेब की खेती लोगों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं मानी जा रही। किसान, कृषि छात्र और स्थानीय लोग इस खेती को करीब से देखने के लिए कछारीपाड़ा स्थित बागान पहुंच रहे हैं।
प्रमुख बातें
मुर्शिदाबाद में सफल सेब की खेती
45 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी फल रहे पेड़
पिछले वर्ष की तुलना में चार गुना अधिक उत्पादन
विदेशी तकनीक वाली तीन किस्मों की खेती
स्थानीय किसानों के लिए नई उम्मीद
कौन-कौन सी किस्मों के सेब उगाए जा रहे हैं?
रुपेश दास ने अपने बागान में तीन विशेष किस्मों के सेब लगाए हैं:
हरिमन 99
यह भारतीय तकनीक से विकसित की गई किस्म है, जो कम ठंड वाले क्षेत्रों में भी अच्छी पैदावार देने के लिए जानी जाती है।
एना
यह इजरायली तकनीक आधारित सेब की किस्म है। गर्म इलाकों में इसकी खेती को सफल माना जाता है।
डोरसेट गोल्डन
यह बहामियन तकनीक पर आधारित किस्म है, जिसे उष्णकटिबंधीय जलवायु के अनुकूल विकसित किया गया है।
रुपेश दास के अनुसार इन तीनों किस्मों ने मुर्शिदाबाद की जलवायु के साथ खुद को ढाल लिया है। यही वजह है कि भीषण गर्मी के बावजूद पेड़ों की ताजगी बनी रहती है।
ऑनलाइन मंगवाए पौधे, पांच साल की मेहनत लाई रंग
रुपेश दास बताते हैं कि उन्होंने करीब पांच वर्ष पहले हिमाचल प्रदेश से ऑनलाइन इन पौधों को मंगवाया था। शुरुआत में लोगों ने उनका मजाक भी उड़ाया क्योंकि मुर्शिदाबाद में सेब उगाने की कल्पना तक नहीं की जाती थी।
लेकिन उन्होंने इसे चुनौती के रूप में लिया और लगातार पौधों की देखभाल करते रहे। करीब दो साल बाद पेड़ों में फल आने शुरू हुए। अब उनका बागान जिले में चर्चा का केंद्र बन चुका है।
उन्होंने बताया कि शुरुआत में पौधों की सुरक्षा और सही देखभाल सबसे बड़ी चुनौती थी। खासकर जड़ों में पानी जमा न हो, इसका विशेष ध्यान रखना पड़ता है।
गर्म इलाके में सेब की खेती कैसे संभव हुई?
यह सवाल अब हर किसी के मन में है कि आखिर 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले इलाके में सेब की खेती कैसे हो रही है।
रुपेश दास के मुताबिक इसके पीछे दो सबसे महत्वपूर्ण तकनीकें हैं:
1. प्रूनिंग
प्रूनिंग यानी पेड़ों की नियमित कटाई-छंटाई। इससे पौधों की ऊर्जा सही दिशा में जाती है और फल की गुणवत्ता बेहतर होती है।
2. चिलिंग पीरियड
सेब के पौधों में फूल आने के लिए ठंडे वातावरण की जरूरत होती है। इसे “चिलिंग पीरियड” कहा जाता है।
इसके लिए:
50 से 100 घंटे तक तापमान
7 से 10 डिग्री सेल्सियस के बीच रहना चाहिए
मुर्शिदाबाद में दिसंबर और जनवरी के दौरान यह स्थिति कुछ समय के लिए बन जाती है, जिसका फायदा पौधों को मिलता है।
कब लगाया जाता है पौधा?
विशेषज्ञों के अनुसार नवंबर के अंतिम सप्ताह से दिसंबर के पहले सप्ताह तक पौधे लगाना सबसे उपयुक्त समय माना जाता है।
चूंकि दो साल बाद फल आना शुरू होता है, इसलिए शुरुआती देखभाल बेहद जरूरी होती है। सही समय पर सिंचाई, छंटाई और मिट्टी प्रबंधन से बेहतर उत्पादन हासिल किया जा सकता है।
किसानों के लिए नई उम्मीद बन रही यह खेती
मुर्शिदाबाद में सेब की सफल खेती अब दूसरे किसानों के लिए भी नई उम्मीद बनती जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैज्ञानिक तरीके से खेती की जाए तो पश्चिम बंगाल समेत देश के कई गर्म इलाकों में भी कम चिलिंग वाली सेब की किस्मों की खेती संभव हो सकती है।
इससे किसानों की आय बढ़ सकती है और पारंपरिक खेती पर निर्भरता कम हो सकती है।
कृषि विशेषज्ञों की नजर में बड़ी उपलब्धि
कृषि विशेषज्ञ इस सफलता को जलवायु अनुकूल खेती का बड़ा उदाहरण मान रहे हैं। बदलते मौसम और नई कृषि तकनीकों के बीच यह प्रयोग भविष्य की खेती के लिए अहम साबित हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार और कृषि विभाग ऐसे किसानों को तकनीकी सहायता और बाजार उपलब्ध कराएं तो यह मॉडल बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है।
स्थानीय लोगों में उत्साह, सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरें
रुपेश दास के बागान की तस्वीरें अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं। लोग इसे “मुर्शिदाबाद का एप्पल रिवोल्यूशन” तक कह रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि आमों की धरती पर एक दिन सेब भी उगेंगे।
निष्कर्ष
मुर्शिदाबाद में सेब की खेती की यह सफलता केवल एक किसान की उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय कृषि के बदलते स्वरूप की बड़ी तस्वीर है।
रुपेश दास ने यह साबित कर दिया है कि सही तकनीक, धैर्य और मेहनत से खेती में असंभव दिखने वाले लक्ष्य भी हासिल किए जा सकते हैं। आने वाले समय में यह मॉडल देश के कई किसानों के लिए नई दिशा बन सकता है।
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