10 मिनट, 125 गोले और मद्रास पर जर्मन हमला, जानिए पहले विश्व युद्ध में भारत की क्या थी भूमिका
22 सितंबर 1914 की रात प्रथम विश्व युद्ध का असर भारत के तट तक पहुंचा, जब जर्मन युद्धपोत SMS Emden ने मद्रास (अब चेन्नई) बंदरगाह पर हमला किया। जहाज ने करीब 125 गोले लगभग 10 मिनट में दागे और ब्रिटिश स्वामित्व वाली बर्मा ऑयल कंपनी के तेल टैंकों को निशाना बनाया। इस हमले में बड़ी मात्रा में तेल नष्ट हुआ और शहर में दहशत फैल गई। भारत उस समय ब्रिटिश शासन के अधीन था और भारतीय सेना ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से युद्ध में शामिल हुई थी। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत से 14 लाख के करीब लोग सेना और उससे जुड़ी सेवाओं में शामिल हुए तथा भारतीय सैनिकों ने यूरोप, मेसोपोटामिया, पूर्वी अफ्रीका, मिस्र और अन्य मोर्चों पर सेवा दी।
लेखक
Vinay Mishra
जब प्रथम विश्व युद्ध की गूंज मद्रास तक पहुंची
नई दिल्ली: प्रथम विश्व युद्ध को आम तौर पर यूरोप के मोर्चों पर लड़ी गई लड़ाई के तौर पर याद किया जाता है, लेकिन 1914 में इसका असर भारतीय उपमहाद्वीप तक भी पहुंचा। इसका सबसे चर्चित उदाहरण 22 सितंबर 1914 को मद्रास पर जर्मन युद्धपोत SMS Emden का हमला है।
उस रात Emden मद्रास के तट के पास पहुंचा और बंदरगाह के आसपास स्थित तेल भंडारण सुविधाओं को निशाना बनाया। ऑस्ट्रेलियाई युद्ध स्मारक और अन्य ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, जहाज ने करीब 125 गोले दागे और तेल भंडारण क्षेत्र में लगभग 3.5 लाख गैलन तेल नष्ट हुआ।
10 मिनट में 125 गोले, तेल के टैंकों में लगी आग
ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक, Emden रात करीब 9:30 बजे मद्रास बंदरगाह के पास पहुंचा। जहाज के एक चालक दल के सदस्य को मद्रास की जानकारी थी और उसने बंदरगाह के प्रवेश क्षेत्र में मौजूद तेल टैंकों के बारे में कप्तान को जानकारी दी थी। इसके बाद जहाज ने तेल टैंकों की दिशा में गोलाबारी शुरू की।
कई ऐतिहासिक स्रोतों में 125 गोले और करीब 10 मिनट की गोलाबारी का उल्लेख मिलता है। गोलों की वजह से तेल के टैंकों में आग लग गई और बंदरगाह के ऊपर काफी दूर तक आग की लपटें दिखाई दीं।
इस हमले का मकसद केवल भौतिक नुकसान पहुंचाना नहीं था। बाद में Emden के कप्तान कार्ल फॉन म्यूलर के रिकॉर्ड से संकेत मिलता है कि वह ब्रिटिश वाणिज्य और प्रतिष्ठा पर असर डालने तथा भारतीय आबादी पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने वाला प्रदर्शन करना चाहते थे।
मद्रास में मची दहशत
अचानक हुई गोलाबारी से मद्रास में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। कुछ ऐतिहासिक विवरणों में तीन लोगों की मौत और 13 लोगों के घायल होने का उल्लेख है। तेल भंडारण को नुकसान पहुंचने के साथ शहर के कई हिस्सों में गोलों और उनके टुकड़ों के पहुंचने की रिपोर्ट भी मिलती है।
हमले के बाद ब्रिटिश प्रशासन के सामने यह चुनौती भी थी कि भारतीय तट और समुद्री व्यापार मार्ग पूरी तरह सुरक्षित नहीं थे। Emden के अचानक पहुंचने और तेजी से वापस निकल जाने ने ब्रिटिश नौसैनिक व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ा दी थी।
SMS Emden कौन सा जहाज था?
SMS Emden जर्मन नौसेना का एक हल्का क्रूजर था और प्रथम विश्व युद्ध के शुरुआती महीनों में उसने हिंद महासागर में ब्रिटिश और मित्र देशों के समुद्री व्यापार को निशाना बनाया।
ऑस्ट्रेलियाई हेरिटेज रिकॉर्ड के अनुसार, अगस्त से अक्टूबर 1914 के बीच Emden ने कई जहाजों को पकड़ा या डुबोया और हिंद महासागर में समुद्री परिवहन को प्रभावित किया। मद्रास पर हमला इसी अभियान का एक प्रमुख हिस्सा था।
बाद में 9 नवंबर 1914 को कोकोस द्वीप समूह के पास ऑस्ट्रेलियाई युद्धपोत HMAS Sydney के साथ हुई लड़ाई में Emden को गंभीर नुकसान पहुंचा। उसके बाद जहाज को तट पर चढ़ाना पड़ा।
पहले विश्व युद्ध में भारत की क्या भूमिका थी?
1914 में भारत ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा था। इसलिए भारतीय सेना को ब्रिटिश युद्ध प्रयासों में शामिल किया गया। Imperial War Museums के अनुसार, 1914 से 1918 के बीच भारत से करीब 14 लाख लोग प्रथम विश्व युद्ध में सेवा के लिए गए। इनमें सैनिकों के अलावा बड़ी संख्या में सहायक और गैर-लड़ाकू कर्मचारी भी शामिल थे।
भारतीय सैनिकों ने केवल भारत में ही नहीं, बल्कि फ्रांस और बेल्जियम, मेसोपोटामिया (आज का इराक), फारस, पूर्वी अफ्रीका और मिस्र सहित कई क्षेत्रों में सेवा की।
Imperial War Museums के रिकॉर्ड के अनुसार, भारतीय सेना ने युद्ध के दौरान 10 लाख से अधिक सैनिकों को विदेशों में भेजा। भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश और मित्र देशों की सेनाओं के साथ यूरोप, अफ्रीका और एशिया के अलग-अलग मोर्चों पर लड़ाई में हिस्सा लिया।
सैनिकों के साथ बड़ी संख्या में गैर-लड़ाकू कर्मचारी भी गए
भारत की भूमिका सिर्फ युद्ध लड़ने वाले सैनिकों तक सीमित नहीं थी। भारतीय सेना के साथ बड़ी संख्या में कुक, घोड़े संभालने वाले कर्मचारी, मजदूर, बढ़ई, दर्जी, लश्कर और अन्य सहायक कर्मचारी भी विदेश गए।
Imperial War Museums के एक शोध संसाधन के अनुसार, भारतीय युद्ध प्रयास में 5.63 लाख से अधिक गैर-लड़ाकू कर्मियों ने भी सहयोग किया था। इनमें Indian Labour and Porter Corps, Army Bearer Corps और अन्य सहायक सेवाओं से जुड़े लोग शामिल थे।
भारत में भी पड़ा युद्ध का आर्थिक और रणनीतिक असर
युद्ध के दौरान भारत ब्रिटिश साम्राज्य के लिए सैनिकों, श्रम और संसाधनों का महत्वपूर्ण आधार बना रहा। समुद्री रास्तों पर जर्मन युद्धपोतों की गतिविधियों ने भारतीय बंदरगाहों और व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा को भी प्रभावित किया।
मद्रास पर Emden का हमला इसी व्यापक वैश्विक संघर्ष का प्रत्यक्ष उदाहरण था। इस घटना ने दिखाया कि यूरोप में शुरू हुआ युद्ध समुद्री व्यापार मार्गों के जरिए हजारों किलोमीटर दूर स्थित ब्रिटिश उपनिवेशों तक पहुंच सकता था।
मद्रास हमला क्यों याद रखा जाता है?
22 सितंबर 1914 का Emden हमला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय धरती पर जर्मन नौसैनिक कार्रवाई का सबसे चर्चित उदाहरण बना। करीब 125 गोलों की गोलाबारी, तेल टैंकों में लगी आग और उसके बाद फैली दहशत ने मद्रास के लोगों को यह अहसास करा दिया कि विश्व युद्ध का खतरा केवल यूरोप तक सीमित नहीं था।
वहीं, युद्ध में भारत की सैन्य और गैर-सैन्य भागीदारी ने प्रथम विश्व युद्ध को भारतीय इतिहास का भी एक महत्वपूर्ण अध्याय बना दिया। लाखों भारतीयों ने ऐसे युद्ध में सेवा की, जो ब्रिटिश साम्राज्य के लिए लड़ा जा रहा था, जबकि भारत स्वयं उस समय औपनिवेशिक शासन के अधीन था।
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