'डॉक्टरों से मारपीट करने वाले नेताओं को हिरासत में लो', सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र की घटना पर जताई नाराजगी
महाराष्ट्र में डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों पर राजनीतिक दलों के सदस्यों द्वारा कथित हमलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा कि डॉक्टरों पर हमला करने वाले लोग खुले में घूमने के हकदार नहीं हैं और राज्य सरकार से ऐसे आरोपियों को हिरासत में लेने को कहा। मामला शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे से जुड़े डोंबिवली डॉक्टर मारपीट केस और पालघर में हुई एक ताजा घटना के संदर्भ में सामने आया।
लेखक
Vinay Mishra
नई दिल्ली: महाराष्ट्र में डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ पर लगातार हो रही कथित हिंसा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बेहद सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि डॉक्टरों पर हमला करने वाले राजनीतिक नेताओं या कार्यकर्ताओं को खुले में घूमने नहीं दिया जा सकता और ऐसे लोगों को हिरासत में लिया जाना चाहिए।
यह टिप्पणी शिवसेना पार्षद रमेश सुक्र्या म्हात्रे की उस याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें वह डॉक्टरों से मारपीट के मामले में अपने खिलाफ लगाए गए जमानत संबंधी प्रतिबंधों को चुनौती दे रहे थे।
'एक मिनट के लिए भी खुले में घूमने के हकदार नहीं'
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों पर हमले को बेहद गंभीर माना। अदालत ने कहा कि जो लोग मेडिकल प्रोफेशनल्स के साथ हिंसा करते हैं, उन्हें समाज में खुलेआम घूमने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि ऐसे मामलों में सख्त कानूनी कार्रवाई जरूरी है, ताकि डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा को लेकर स्पष्ट संदेश जाए।
क्या है रमेश म्हात्रे से जुड़ा मामला?
मामला महाराष्ट्र के डोंबिवली स्थित शास्त्रीनगर अस्पताल का है। रमेश म्हात्रे और उनके साथियों पर ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के साथ मारपीट करने का आरोप है।
मामला सामने आने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था। हाईकोर्ट ने पहले निचली अदालत से मिली जमानत पर रोक लगाई और बाद में मामले में कड़ी शर्तें भी लगाईं।
म्हात्रे ने इन्हीं जमानत संबंधी शर्तों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सोमवार की सुनवाई के दौरान उनके वकील मुकुल रोहतगी ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों अपनाया इतना सख्त रुख?
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने महाराष्ट्र में डॉक्टरों पर हमले की एक और घटना का जिक्र आया। पालघर के एक अस्पताल में भी रविवार तड़के कथित तौर पर शिवसेना के कुछ पदाधिकारियों ने डॉक्टरों और स्टाफ के साथ मारपीट की।
रिपोर्टों के मुताबिक, यह विवाद दही-हांडी कार्यक्रम में घायल हुए एक युवक के इलाज के बिल को लेकर हुआ था। अस्पताल की ओर से करीब 19,866 रुपये का बिल दिए जाने के बाद विवाद बढ़ा और कथित तौर पर अस्पताल के कर्मचारियों के साथ हाथापाई हुई। इस मामले में 17 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है।
यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में डॉक्टरों के खिलाफ हो रही हिंसा को व्यापक संदर्भ में देखा।
पालघर केस में 17 लोगों पर मामला दर्ज
पालघर मामले में पुलिस ने जिन लोगों को आरोपी बनाया है, उनमें शिवसेना के स्थानीय पदाधिकारी भी शामिल हैं। आरोप है कि राहुल घरात ने अस्पताल के एक कर्मचारी को थप्पड़ मारा, जबकि अन्य लोगों पर भी अस्पताल में हंगामा और कर्मचारियों से मारपीट का आरोप है।
यह मामला अभी जांच के स्तर पर है और आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों का अंतिम न्यायिक निर्धारण होना बाकी है।
पहले भी डॉक्टरों पर हमले को लेकर कोर्ट ने दिखाई थी सख्ती
सुप्रीम कोर्ट इससे पहले भी रमेश म्हात्रे मामले में डॉक्टरों पर हमले को लेकर सख्त टिप्पणी कर चुका है। अदालत ने कहा था कि मेडिकल स्टाफ को धमकी या हिंसा का सामना करना पड़ेगा तो आम लोगों की मदद के लिए कौन आगे आएगा? कोर्ट ने संकेत दिया था कि डॉक्टरों पर हमले को सामान्य घटना की तरह नहीं देखा जा सकता।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी मामले में टिप्पणी करते हुए कहा था कि जनता अपने प्रतिनिधियों को सेवा करने के लिए चुनती है, डॉक्टरों का सिर फोड़ने के लिए नहीं।
महाराष्ट्र सरकार को क्या करना होगा?
सुप्रीम कोर्ट के ताजा रुख का सीधा संदेश है कि राजनीतिक प्रभाव या पद के आधार पर डॉक्टरों पर हिंसा करने वालों को राहत नहीं मिलनी चाहिए।
सोमवार को अदालत ने मामले में नोटिस जारी किया और अगली सुनवाई 28 सितंबर को निर्धारित की है।
यह मामला सिर्फ एक पार्षद या एक अस्पताल तक सीमित नहीं है। अदालत की टिप्पणियां अस्पतालों में डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा को लेकर व्यापक चिंता को दर्शाती हैं।
डॉक्टरों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल
अस्पतालों में मरीजों के इलाज, बिल, लापरवाही के आरोप या इलाज के नतीजे को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का रुख साफ है कि किसी भी विवाद का समाधान हिंसा के जरिए नहीं किया जा सकता।
महाराष्ट्र की हालिया घटनाओं के बीच अब पुलिस कार्रवाई, आरोपियों की हिरासत और अस्पतालों में मेडिकल स्टाफ की सुरक्षा पर सरकार की जवाबदेही भी अहम हो गई है।
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