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'सुनवाई से पहले किसी को सजा के तौर पर हिरासत में नहीं रख सकते', सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के संभल हिंसा मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हुई एक व्यक्ति की निवारक हिरासत को रद्द करते हुए कहा कि प्रिवेंटिव डिटेंशन का इस्तेमाल सजा देने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक आरोप होने मात्र से उसे निवारक हिरासत में रखना सामान्य आपराधिक कानून का विकल्प नहीं हो सकता। फैसले में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निवारक हिरासत से जुड़े कानूनी सुरक्षा उपायों का पालन करने पर जोर दिया गया।

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'सुनवाई से पहले किसी को सजा के तौर पर हिरासत में नहीं रख सकते', सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने निवारक हिरासत से जुड़े एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि प्रिवेंटिव डिटेंशन को किसी आरोपी को सजा देने के माध्यम के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अदालत ने संभल हिंसा मामले में मल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत की गई हिरासत को रद्द कर दिया और उत्तर प्रदेश सरकार को 10 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया।

क्या है पूरा मामला?

मल्ला अफरोज को संभल में नवंबर 2024 में हुई हिंसा के मामले में 17 जनवरी 2025 को गिरफ्तार किया गया था। बाद में 13 अक्टूबर 2025 को उन पर NSA लगाया गया। उस समय वह पहले से ही न्यायिक हिरासत में थे।

अफरोज ने अपनी निवारक हिरासत को चुनौती दी थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 8 जून 2026 को उनकी हिरासत को बरकरार रखा था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए हिरासत आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि निवारक हिरासत की शक्ति का इस्तेमाल कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार करने या किसी व्यक्ति को दंडित करने के लिए नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य सरकार निवारक हिरासत के तहत किसी व्यक्ति को लंबे समय तक रखने के लिए संतोषजनक आधार पेश नहीं कर सकी।

एक साल तक हिरासत पर उठे सवाल

अदालत के सामने यह तथ्य भी था कि अफरोज को लगभग एक साल तक NSA के तहत निवारक हिरासत में रखा गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस अवधि को लेकर सरकार से स्पष्टीकरण मांगा, लेकिन अदालत को राज्य की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं मिला। इसके बाद कोर्ट ने 10 लाख रुपये की लागत लगाने का आदेश दिया, जिसे हिरासत में रखे गए व्यक्ति को दिया जाना है।

पुलिस हिरासत में कथित कबूलनामे का भी मुद्दा

सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत आदेश के आधार के तौर पर इस्तेमाल किए गए कथित अतिरिक्त-न्यायिक कबूलनामे पर भी सवाल उठाया। अदालत ने अफरोज की उस दलील को स्वीकार किया कि हिरासत आदेश पुलिस हिरासत के दौरान दिए गए कथित कबूलनामे पर आधारित था।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि केवल किसी कथित स्वीकारोक्ति के आधार पर निवारक हिरासत का आदेश उचित नहीं ठहराया जा सकता।

प्रिवेंटिव डिटेंशन और सामान्य आपराधिक कानून में अंतर

निवारक हिरासत का उद्देश्य किसी व्यक्ति को भविष्य में ऐसी गतिविधि करने से रोकना होता है, जिसे कानून या राज्य सुरक्षा के लिए खतरा माना जाता है। यह सामान्य आपराधिक मुकदमे और दोषसिद्धि से अलग कानूनी व्यवस्था है।

सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुका है कि निवारक हिरासत में किसी अपराध का दोष सिद्ध नहीं होता और ऐसी शक्ति का इस्तेमाल कड़े कानूनी सुरक्षा उपायों के साथ होना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा है कि सामान्य आपराधिक कानून उपलब्ध होने पर निवारक हिरासत को उसका विकल्प नहीं बनाया जा सकता।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सुप्रीम कोर्ट का जोर

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के पालन के महत्व को फिर रेखांकित किया गया है। अदालत के अनुसार निवारक हिरासत जैसी असाधारण शक्ति का इस्तेमाल करते समय संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं और सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन जरूरी है।

फैसले का व्यापक कानूनी संदेश यह है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर आरोप होने मात्र से निवारक हिरासत को दंड के विकल्प के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। निवारक हिरासत के लिए कानून में निर्धारित आधार और प्रक्रियात्मक सुरक्षा का पालन आवश्यक है।

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