'अपनी हरकतें सुधारें', रूसी तेल खरीदने पर भड़की ट्रंप की टीम; भारत पर पड़ेगा असर?
रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिकी दबाव बढ़ गया है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने ऐसा विधेयक पारित किया है, जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले कुछ देशों के सामान पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार दे सकता है। भारत और चीन जैसे बड़े रूसी तेल खरीदार इस कदम की जद में आ सकते हैं। भारत ने अमेरिकी कदम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि उसकी तेल खरीद का फैसला देश की ऊर्जा सुरक्षा और 1.4 अरब लोगों के लिए सस्ती एवं भरोसेमंद ऊर्जा उपलब्ध कराने की जरूरत से निर्देशित होगा। नई दिल्ली ने यह भी कहा है कि वह अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगी।
लेखक
Jyoti Mukherjee
नई दिल्ली: रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत और अमेरिका के बीच एक बार फिर तनाव बढ़ने के संकेत हैं। अमेरिकी संसद के निचले सदन ने रूस पर दबाव बढ़ाने वाले एक व्यापक प्रतिबंध विधेयक को मंजूरी दे दी है। इसमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले कुछ देशों पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है।
इस घटनाक्रम के बाद भारत की रूसी तेल खरीद फिर अमेरिकी दबाव के केंद्र में आ गई है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि 100% टैरिफ अभी भारत पर लागू नहीं हुआ है। विधेयक राष्ट्रपति को अधिकार देने की दिशा में एक कदम है और किसी देश पर वास्तविक टैरिफ लगाने के लिए कानून में निर्धारित शर्तें और आगे की अमेरिकी कार्रवाई अहम होगी।
क्या है पूरा मामला?
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर को Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 को 262-159 के मत से पारित किया। यह विधेयक रूस की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा क्षेत्र पर दबाव बढ़ाने के साथ-साथ उन देशों को भी निशाना बनाने की व्यवस्था करता है जो रूसी ऊर्जा की बड़ी मात्रा में खरीद जारी रखते हैं।
विधेयक में राष्ट्रपति को पात्र देशों से अमेरिका में आने वाले सामान पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है। इसका उद्देश्य रूस की तेल और गैस से होने वाली आय पर दबाव बढ़ाना है।
अमेरिकी कदम का सीधा असर भारत पर इसलिए पड़ सकता है क्योंकि भारत रूसी समुद्री कच्चे तेल का एक बड़ा खरीदार बना हुआ है।
भारत ने क्या कहा?
अमेरिकी विधेयक पर भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि नई दिल्ली घटनाक्रम पर नजर रख रही है। भारत ने अमेरिकी अधिकारियों के साथ पिछले कुछ महीनों में इस मुद्दे पर बातचीत में द्विपक्षीय संबंधों और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर संभावित असर को स्पष्ट रूप से उठाया है।
भारत का कहना है कि उसकी ऊर्जा नीति का प्रमुख आधार देश की ऊर्जा सुरक्षा है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, भारत अपनी 1.4 अरब आबादी के लिए भरोसेमंद और किफायती ऊर्जा सुनिश्चित करने के लिए अलग-अलग स्रोतों से तेल खरीद जारी रखेगा।
क्या भारत पर तुरंत लगेगा 100% टैरिफ?
नहीं। यह अंतर समझना जरूरी है।
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से पारित विधेयक अपने आप भारत के उत्पादों पर 100% शुल्क लागू नहीं करता। यह राष्ट्रपति को कुछ परिस्थितियों में ऐसे देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की शक्ति देने का प्रावधान करता है।
इसके अलावा, 100% इस प्रावधान के तहत अधिकतम सीमा है, जरूरी नहीं कि हर प्रभावित देश पर यही दर लगाई जाए। आगे कानून के अंतिम रूप और अमेरिकी प्रशासन द्वारा उसके इस्तेमाल पर स्थिति स्पष्ट होगी।
भारत पर कैसे पड़ सकता है असर?
अगर भविष्य में भारत पर अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ लगाया जाता है, तो इसका सबसे सीधा असर भारत-अमेरिका व्यापार पर पड़ सकता है। अमेरिकी बाजार में भारतीय वस्तुओं की कीमत बढ़ सकती है और कुछ भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति प्रभावित हो सकती है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब दोनों देश व्यापार समझौते को लेकर बातचीत भी कर रहे हैं। इसलिए रूसी तेल का मुद्दा व्यापार वार्ता के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
दूसरी तरफ, अगर अमेरिकी दबाव के कारण भारतीय रिफाइनर रूसी कच्चे तेल की खरीद कम करते हैं, तो उन्हें वैकल्पिक स्रोतों से अधिक तेल लेना पड़ सकता है। इससे कच्चे तेल की लागत, माल ढुलाई और रिफाइनिंग मार्जिन पर असर पड़ सकता है।
क्या पेट्रोल-डीजल महंगा होगा?
इसका सीधा और तत्काल निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है और रूस के अलावा इराक, सऊदी अरब, अमेरिका, ब्राजील, कनाडा और अन्य देशों से भी तेल खरीदता है। सितंबर के शुरुआती आंकड़ों में रूसी तेल का भारत का आयात अगस्त की औसत दर की तुलना में कम रहा है, जबकि इराक से आयात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
अगर रूस से मिलने वाला सस्ता तेल कम होता है और उसकी जगह महंगा तेल लेना पड़ता है, तो भारतीय रिफाइनरों की लागत बढ़ सकती है। लेकिन पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमत पर असर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के दाम, रुपये की विनिमय दर, रिफाइनिंग लागत, कर और तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति समेत कई कारकों पर निर्भर करेगा।
भारत के सामने एक और चुनौती
भारत के लिए समस्या सिर्फ अमेरिका की संभावित कार्रवाई तक सीमित नहीं है। मौजूदा समय में वैश्विक तेल बाजार भी दबाव में है। पश्चिम एशिया में जारी व्यवधानों के बीच सऊदी अरब की East-West पाइपलाइन से आपूर्ति में भी अस्थायी बाधा आई है। ऐसे में रूस से मिलने वाली अपेक्षाकृत सस्ती आपूर्ति भारत के लिए और महत्वपूर्ण हो जाती है।
इसके साथ ही भारत के रूसी कच्चे तेल के आयात में सितंबर में पहले ही कुछ कमी देखी गई है। Kpler के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर के पहले 14 दिनों में भारत ने करीब 1.42 मिलियन बैरल प्रतिदिन रूसी कच्चा तेल आयात किया, जबकि अगस्त का औसत करीब 2.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन था। हालांकि, पूरे महीने के आंकड़े बाद में बदल सकते हैं।
क्या भारत रूसी तेल खरीदना बंद करेगा?
फिलहाल भारत की ओर से ऐसा कोई संकेत नहीं दिया गया है कि वह रूसी तेल की खरीद पूरी तरह बंद करने जा रहा है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि तेल की खरीद ऊर्जा सुरक्षा, कीमत और बाजार की परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग स्रोतों से की जाएगी।
यानी आने वाले समय में भारत के सामने दोहरी चुनौती हो सकती है—एक तरफ रूस से मिलने वाले कच्चे तेल के आर्थिक फायदे को बनाए रखना और दूसरी तरफ अमेरिकी प्रतिबंधों या संभावित टैरिफ के असर को सीमित करना।
आगे क्या होगा?
अब निगाह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अगली कार्रवाई पर है। विधेयक के कानून बनने और उसके बाद प्रशासन द्वारा टैरिफ प्रावधान का इस्तेमाल करने की स्थिति में भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर इसका वास्तविक प्रभाव अधिक स्पष्ट होगा।
फिलहाल भारत ने अपनी स्थिति साफ कर दी है कि वह ऊर्जा सुरक्षा और अपने आर्थिक हितों को प्राथमिकता देगा, जबकि अमेरिका रूस की ऊर्जा आय पर दबाव बढ़ाने के लिए उसके बड़े खरीदार देशों को भी निशाना बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
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