अभी भी मौका है, अपनी गलती सुधार ले गुजरात सरकार: ऊना दलित कांड पर मायावती का बड़ा हमला, 35 आरोपी बरी होने पर उठाए सवाल
गुजरात के ऊना में 2016 में हुए चर्चित दलित अत्याचार कांड को लेकर बसपा प्रमुख मायावती ने शुक्रवार को गुजरात सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देकर पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने के लिए सरकार को प्रभावी पैरवी करनी चाहिए। मार्च 2026 में अदालत ने 40 आरोपियों में से 35 को बरी किया था, जबकि 5 आरोपियों को दोषी ठहराया गया था। मायावती ने पीड़ितों को सरकारी खर्च पर कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की मांग भी की है।
लेखक
Vinay Mishra

ऊना कांड जुलाई 2016 में गुजरात के गिर सोमनाथ जिले में सामने आया था। इस घटना में दलित परिवार के लोगों के साथ मारपीट की गई थी। घटना से जुड़ा वीडियो सामने आने के बाद पूरे देश में व्यापक आक्रोश फैल गया था।
मामले की पृष्ठभूमि में मृत गाय की खाल उतारने का विवाद था। पीड़ित परिवार पर कथित तौर पर गाय को मारने का आरोप लगाया गया था, जबकि परिवार का कहना था कि वे मृत पशु की खाल उतारने का पारंपरिक काम करते थे। इस घटना ने गुजरात समेत देश के कई हिस्सों में बड़े विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया।
ऊना कांड उस समय दलित अधिकारों, जातीय भेदभाव और कानून-व्यवस्था को लेकर राष्ट्रीय बहस का बड़ा मुद्दा बन गया था।
करीब 10 साल बाद आया अदालत का फैसला
इस मामले में करीब एक दशक तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद 16 मार्च 2026 को गुजरात के गिर सोमनाथ जिले की वेरावल अदालत ने फैसला सुनाया।
अदालत ने 5 आरोपियों को दोषी ठहराया और 35 आरोपियों को बरी कर दिया। फैसले के बाद पीड़ित पक्ष ने असंतोष जताते हुए हाईकोर्ट का रुख करने की बात कही थी।
इसके अगले दिन 17 मार्च को दोषी ठहराए गए पांच लोगों को अधिकतम 5 साल की सजा और 5,000 रुपये जुर्माना सुनाया गया। रिपोर्ट के अनुसार, सभी पांचों आरोपी पहले ही पांच साल से अधिक समय हिरासत में रह चुके थे, इसलिए हिरासत में बिताया गया समय सजा में समायोजित होने की संभावना थी।
यही अदालत का फैसला अब मायावती के ताजा बयान का केंद्र बन गया है।
35 आरोपियों के बरी होने पर क्यों उठे सवाल?
इस मामले में अदालत के फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यही रहा कि इतने चर्चित और व्यापक रूप से सामने आए मामले में बड़ी संख्या में आरोपी बरी क्यों हुए।
अदालत ने जिन आरोपियों को बरी किया, उनके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य साबित नहीं होने का आधार सामने आया। वहीं पीड़ित पक्ष ने फैसले पर असंतोष जताते हुए आगे हाईकोर्ट में अपील करने की बात कही थी।
ऐसे में अब मामला निचली अदालत के फैसले से आगे बढ़कर हाईकोर्ट की कानूनी प्रक्रिया की ओर देख रहा है। मायावती चाहती हैं कि राज्य सरकार इस प्रक्रिया में प्रभावी पैरवी सुनिश्चित करे।
मायावती ने कहा- पीड़ितों को सरकारी खर्च पर वकील मिले
मायावती ने सिर्फ हाईकोर्ट में पैरवी की मांग नहीं की है, बल्कि पीड़ित परिवारों की आर्थिक स्थिति को भी मुद्दा बनाया है।
उनका कहना है कि इतने लंबे समय से चल रही कानूनी लड़ाई में परिवारों के लिए आर्थिक खर्च उठाना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में सरकार को पीड़ितों की पसंद के अनुसार वकील उपलब्ध कराना चाहिए और उसका खर्च सरकार को उठाना चाहिए।
यह मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी लंबे आपराधिक मामले में निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट तक कानूनी प्रक्रिया में समय और संसाधन दोनों लगते हैं।
आम लोगों पर क्या असर?
ऊना कांड सिर्फ एक पुराने आपराधिक मामले का सवाल नहीं है। इसने समाज में कानून के समान इस्तेमाल और कमजोर वर्गों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर बहस पैदा की थी।
मायावती के बयान के बाद यह मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा में आ सकता है। खासकर दलित अधिकार, सामाजिक न्याय और एससी-एसटी अत्याचार से जुड़े मामलों में सरकार और प्रशासन की भूमिका पर बहस तेज होने की संभावना है।
पीड़ित परिवार के लिए सबसे अहम मुद्दा यही है कि करीब 10 साल बाद भी न्याय की प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। अब उनकी उम्मीद हाईकोर्ट में होने वाली कानूनी कार्रवाई पर टिकी हुई है।
राजनीतिक असर भी महत्वपूर्ण
मायावती का बयान ऐसे समय आया है जब ऊना कांड के 10 साल पूरे होने के बाद गुजरात में इस मामले की चर्चा फिर तेज हुई है। जुलाई 2026 में ऊना कांड की दसवीं बरसी के मौके पर पीड़ित परिवारों और दलित संगठनों ने न्याय की मांग दोहराई थी। रिपोर्टों के मुताबिक पीड़ित पक्ष ने मार्च के फैसले को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती देने की बात कही है।
मायावती का ताजा बयान इसी व्यापक न्याय की मांग को राजनीतिक स्तर पर आवाज देता है। उन्होंने सरकार से यह संकेत दिया है कि निचली अदालत के फैसले के बाद भी मामला खत्म नहीं हुआ है और सरकार के पास हाईकोर्ट में प्रभावी पैरवी का रास्ता मौजूद है।
अब आगे क्या होगा?
अब सबसे महत्वपूर्ण नजर गुजरात हाईकोर्ट की कानूनी प्रक्रिया पर होगी। पीड़ित पक्ष यदि निचली अदालत के फैसले को चुनौती देता है, तो हाईकोर्ट में मामले के रिकॉर्ड, साक्ष्यों और निचली अदालत के निष्कर्षों की कानूनी समीक्षा होगी।
हालांकि, किसी भी अपील में अंतिम निर्णय अदालत के सामने रखे गए साक्ष्यों और कानूनी दलीलों के आधार पर ही होगा। इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि हाईकोर्ट में नतीजा क्या होगा।
मायावती ने सरकार से इसी स्तर पर मजबूत पैरवी करने की मांग की है, ताकि पीड़ित परिवारों को अपनी कानूनी लड़ाई में सरकारी सहयोग मिल सके।
निष्कर्ष
करीब एक दशक पुराने ऊना दलित अत्याचार कांड ने एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस को तेज कर दिया है। मार्च 2026 में 5 आरोपियों को दोषी और 35 को बरी किए जाने के बाद अब बसपा प्रमुख मायावती ने गुजरात सरकार पर बड़ा हमला बोला है।
मायावती का स्पष्ट संदेश है कि “अभी भी मौका है” और राज्य सरकार हाईकोर्ट में प्रभावी पैरवी करके अपनी भूमिका सुधार सकती है। उन्होंने पीड़ित परिवारों को सरकारी खर्च पर कानूनी सहायता देने की भी मांग की है।
अब बड़ा सवाल यही है कि गुजरात सरकार इस मामले में आगे क्या कदम उठाती है और हाईकोर्ट में पीड़ित पक्ष को कितनी प्रभावी कानूनी सहायता मिलती है। करीब 10 साल बाद भी ऊना कांड का न्यायिक अध्याय पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।
स्रोत आधार: 7 अगस्त 2026 की मायावती की प्रतिक्रिया तथा ऊना मामले में मार्च 2026 के अदालत के फैसले से संबंधित प्रकाशित रिपोर्टें।
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