डिजिटल पुनर्जन्म: पैसे देकर मृतक परिजन से कर सकते हैं चैट, AI से बनाया जा रहा ‘वर्चुअल इंसान’
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने मौत के बाद भी किसी व्यक्ति की डिजिटल मौजूदगी बनाए रखने की तकनीक विकसित कर ली है। ‘Griefbots’, ‘Deadbots’ और डिजिटल अवतार मृत व्यक्ति के पुराने मैसेज, ईमेल, आवाज, तस्वीरों और अन्य डिजिटल डेटा के आधार पर तैयार किए जा सकते हैं। इसके बाद परिवार के लोग AI से उस व्यक्ति के अंदाज में बातचीत कर सकते हैं। यह तकनीक जहां कुछ लोगों को शोक से उबरने में मददगार लगती है, वहीं विशेषज्ञ इसके साथ जुड़े भावनात्मक, कानूनी और नैतिक जोखिमों को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
Written by
Vinay Mishra
डिजिटल पुनर्जन्म: मौत के बाद भी अपनों से बातचीत, AI बना रहा ‘वर्चुअल इंसान’
नई दिल्ली: किसी अपने की मौत के बाद उसकी आवाज सुनना, पुराने अंदाज में उससे बातचीत करना और उसके जवाब पाना अब सिर्फ कल्पना या फिल्मों की कहानी नहीं रह गई है। Artificial Intelligence (AI) की मदद से ऐसी डिजिटल प्रतिकृतियां तैयार की जा रही हैं, जिनसे मृत व्यक्ति के परिवार और करीबी लोग बातचीत कर सकते हैं।
इसे तकनीकी दुनिया में Digital Afterlife, Griefbot या Deadbot जैसे नाम दिए जा रहे हैं। ये सिस्टम मृत व्यक्ति के डिजिटल निशानों—जैसे टेक्स्ट मैसेज, ईमेल, सोशल मीडिया पोस्ट, तस्वीरें, वीडियो और आवाज की रिकॉर्डिंग—का इस्तेमाल करके उसकी बातचीत की शैली और व्यक्तित्व की नकल करने की कोशिश करते हैं।
कैसे तैयार होता है मृत व्यक्ति का डिजिटल अवतार?
इसके लिए AI सिस्टम को उस व्यक्ति से जुड़े पर्याप्त डिजिटल डेटा की जरूरत होती है। पुराने मैसेज, ईमेल, सोशल मीडिया गतिविधियां, ऑडियो रिकॉर्डिंग और वीडियो जैसी सामग्री AI को उस व्यक्ति की भाषा, पसंद, बोलने के तरीके और व्यवहार के पैटर्न को समझने में मदद कर सकती है।
इसके बाद एक ऐसा चैटबॉट या डिजिटल अवतार तैयार किया जाता है, जो सवालों का जवाब उस मृत व्यक्ति की शैली से मिलता-जुलता देकर दे सकता है। कुछ तकनीकें केवल टेक्स्ट चैट तक सीमित हैं, जबकि दूसरी प्रणालियां आवाज और चेहरे के डिजिटल रूप को भी इस्तेमाल करती हैं।
पैसे देकर कर सकते हैं ‘मृतक’ से बातचीत
इस क्षेत्र में कई कंपनियां और स्टार्टअप ऐसी सेवाएं विकसित कर रहे हैं, जिनके जरिए यूजर मृत व्यक्ति की डिजिटल प्रतिकृति से बातचीत कर सकता है। कुछ सेवाएं सदस्यता या भुगतान के आधार पर उपलब्ध हैं।
यानी तकनीक अब सिर्फ किसी की यादों को डिजिटल रूप में सुरक्षित रखने तक सीमित नहीं है। कुछ सेवाएं उस डिजिटल प्रतिरूप को इंटरैक्टिव बनाती हैं, ताकि यूजर सवाल पूछ सके और जवाब हासिल कर सके।
हालिया रिपोर्टों में ऐसे प्लेटफॉर्म का भी उल्लेख है जहां लोग AI के जरिए अपने मृत परिजनों के डिजिटल संस्करण से बातचीत कर सकते हैं।
क्या यह सच में ‘वापस आना’ है?
नहीं। यह समझना बेहद जरूरी है कि AI किसी मृत व्यक्ति को वास्तविक रूप से वापस जीवित नहीं करता।
AI केवल उपलब्ध डिजिटल डेटा के आधार पर उस व्यक्ति के व्यवहार और बातचीत की एक कृत्रिम नकल तैयार करता है। यानी स्क्रीन पर जो व्यक्ति जवाब दे रहा है, वह उस इंसान की चेतना या वास्तविक व्यक्तित्व नहीं है।
यही वजह है कि विशेषज्ञ इसे ‘डिजिटल पुनर्जन्म’ कहे जाने के बावजूद वास्तविक पुनर्जीवन नहीं मानते।
शोक में डूबे परिवारों के लिए सहारा या नया खतरा?
इस तकनीक को लेकर सबसे बड़ा सवाल इसके भावनात्मक प्रभाव का है।
कई लोग मानते हैं कि मृत परिजन के डिजिटल अवतार से बातचीत करने से उन्हें अधूरी बातें कहने या भावनात्मक रूप से closure पाने में मदद मिल सकती है। कुछ डेवलपर्स भी दावा करते हैं कि ऐसी तकनीक शोक से जूझ रहे लोगों के लिए एक तरह का भावनात्मक सहारा बन सकती है।
लेकिन दूसरी ओर विशेषज्ञों की चिंता है कि किसी मृत व्यक्ति की AI प्रतिकृति से लगातार बातचीत करना कुछ लोगों के लिए शोक की सामान्य प्रक्रिया को और जटिल बना सकता है। खासकर तब, जब यूजर डिजिटल अवतार को वास्तविक व्यक्ति समझने लगे या उस पर भावनात्मक निर्भरता विकसित कर ले।
सबसे बड़ा सवाल—मृत व्यक्ति की अनुमति किससे ली जाए?
यह तकनीक सिर्फ भावनाओं का मामला नहीं है। इससे डेटा प्राइवेसी और सहमति जैसे गंभीर कानूनी सवाल भी जुड़े हैं।
अगर किसी व्यक्ति ने जीवन में यह तय नहीं किया कि उसकी मौत के बाद उसकी आवाज, तस्वीर, संदेश और निजी डेटा का इस्तेमाल AI मॉडल बनाने के लिए किया जा सकता है, तो उसकी डिजिटल पहचान के इस्तेमाल का अधिकार किसके पास होगा?
इसके अलावा यह भी सवाल उठता है कि परिवार के सदस्य मृत व्यक्ति का पूरा डिजिटल डेटा किसी कंपनी को सौंप सकते हैं या नहीं। विशेषज्ञों ने post-mortem privacy, यानी मृत्यु के बाद भी व्यक्ति की डिजिटल निजता की सुरक्षा, को एक महत्वपूर्ण मुद्दा माना है।
AI के जवाब हमेशा सही नहीं होंगे
एक और समस्या AI की विश्वसनीयता है। डिजिटल अवतार असली व्यक्ति की चेतना नहीं है। वह उपलब्ध डेटा के आधार पर अनुमान लगाकर जवाब देता है।
इसका मतलब है कि वह ऐसी बात भी कह सकता है जो मृत व्यक्ति ने कभी नहीं कही थी। ऐसे में परिवार के लिए यह समझना मुश्किल हो सकता है कि कौन-सी बात वास्तव में उस व्यक्ति के विचारों से जुड़ी थी और कौन-सी AI की बनाई हुई प्रतिक्रिया है।
चीन से लेकर अमेरिका तक बढ़ रहा ‘Digital Afterlife’ कारोबार
मृतकों के AI संस्करण तैयार करने की तकनीक पर दुनिया के कई हिस्सों में प्रयोग हो रहे हैं। चीन में AI के जरिए मृत परिजनों को ‘वर्चुअल’ रूप में वापस लाने वाली सेवाओं को लेकर खासा ध्यान गया है। कुछ मामलों में परिवारों ने मृत परिजनों की आवाज और व्यक्तित्व की डिजिटल प्रतिकृति बनाकर उनसे बातचीत भी की है।
अमेरिका और दूसरे देशों में भी grief-tech और digital-afterlife कंपनियां इस क्षेत्र में काम कर रही हैं। इससे संकेत मिलता है कि आने वाले वर्षों में मृत्यु और डिजिटल तकनीक का यह मेल एक बड़ा कारोबारी और सामाजिक विषय बन सकता है।
क्या आने वाला समय ‘डिजिटल अमरता’ का होगा?
AI के विकास ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि इंसान की डिजिटल पहचान उसकी मौत के बाद कितने समय तक मौजूद रह सकती है।
आज जहां डिजिटल अवतार सिर्फ बातचीत और यादों तक सीमित हैं, वहीं भविष्य में और अधिक उन्नत AI सिस्टम किसी व्यक्ति की आवाज, चेहरे, भाषा और व्यवहार को और ज्यादा वास्तविक तरीके से दोहरा सकते हैं।
लेकिन तकनीक जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, उसके साथ कानून, सहमति, डेटा सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े सवालों का समाधान करना भी उतना ही जरूरी होगा।
क्योंकि किसी प्रिय व्यक्ति की याद को डिजिटल रूप देना एक बात है, लेकिन उसकी ऐसी AI प्रतिकृति बनाना जो लगातार ‘जीती-जागती’ नजर आए—यह इंसानी रिश्तों और मौत को देखने के हमारे नजरिए को ही बदल सकता है।
