FCRA संशोधन बिल पर धीमी चाल चलना चाहती है सरकार, परिसीमन पर DMK और शरद गुट को साधने की कोशिश
FCRA संशोधन बिल को लेकर केंद्र सरकार फिलहाल जल्दबाजी से बचना चाहती है। इसके साथ ही परिसीमन जैसे संवेदनशील राजनीतिक मुद्दे पर व्यापक सहमति बनाने की कोशिश जारी है। सरकार की रणनीति में DMK और शरद पवार गुट जैसे विपक्षी दलों को साथ लाने की कवायद भी शामिल मानी जा रही है।
Written by
Vinay Mishra
FCRA बिल पर सरकार की 'धीमी चाल', परिसीमन पर विपक्ष को साधने की कोशिश
नई दिल्ली: विदेशी योगदान नियमन कानून यानी FCRA में संशोधन से जुड़े विधेयक को लेकर केंद्र सरकार फिलहाल सावधानी से आगे बढ़ने के मूड में है। दूसरी ओर, परिसीमन के मुद्दे पर राजनीतिक सहमति बनाने की कोशिश तेज होती दिख रही है। सरकार की नजर खास तौर पर उन विपक्षी दलों पर है, जिनके समर्थन या कम से कम विरोध न करने से संसद में आगे की राह आसान हो सकती है।
FCRA संशोधन बिल और परिसीमन दोनों ही राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दे हैं। ऐसे में सरकार एक साथ कई मोर्चों पर विपक्षी दलों से संवाद बढ़ाने की रणनीति पर काम करती दिख रही है।
FCRA बिल पर जल्दबाजी क्यों नहीं?
FCRA संशोधन विधेयक विदेशी चंदे और उसके इस्तेमाल से जुड़े मौजूदा कानूनी ढांचे में बदलाव का प्रस्ताव रखता है। बिल के प्रावधानों को लेकर विपक्ष और नागरिक संगठनों की ओर से कई सवाल उठाए गए हैं।
सरकार की कोशिश है कि विधेयक को आगे बढ़ाने से पहले इससे जुड़े राजनीतिक और कानूनी पहलुओं पर पर्याप्त चर्चा हो। यही वजह मानी जा रही है कि केंद्र इस मामले में फिलहाल धीमी गति से आगे बढ़ने की रणनीति अपना सकता है।
सरकार का तर्क है कि विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है। वहीं विपक्ष को आशंका है कि प्रस्तावित बदलावों से सरकार को संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई के लिए अधिक शक्तियां मिल सकती हैं।
परिसीमन पर DMK की अहम भूमिका
दूसरी तरफ, परिसीमन का मुद्दा दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए बेहद संवेदनशील है। दक्षिण के कई दलों को आशंका है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्निर्धारण से उन राज्यों को नुकसान हो सकता है, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है।
DMK इस मुद्दे पर लंबे समय से मुखर रहा है। पार्टी का कहना है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया, उन्हें परिसीमन के बाद राजनीतिक प्रतिनिधित्व में नुकसान नहीं होना चाहिए।
ऐसे में केंद्र के लिए DMK जैसे दलों को भरोसे में लेना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
शरद पवार गुट से भी संपर्क की कोशिश
महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार गुट की भूमिका भी अहम हो सकती है। परिसीमन के मुद्दे पर विपक्षी दलों के बीच एक साझा रणनीति बनाने की कोशिशों के बीच सरकार ऐसे दलों से संवाद बढ़ाना चाहती है, जिनसे मुद्दा-दर-मुद्दा समर्थन हासिल किया जा सके।
हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि विपक्षी दल सरकार के प्रस्तावों का समर्थन करने के लिए तैयार हो गए हैं। परिसीमन को लेकर विपक्षी खेमे में भी अलग-अलग राज्यों और राजनीतिक हितों के आधार पर अलग-अलग चिंताएं हैं।
FCRA और परिसीमन—दोनों पर राजनीतिक गणित
सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह FCRA जैसे विधेयक को आगे बढ़ाते हुए विपक्ष की आपत्तियों को भी संबोधित करे और साथ ही परिसीमन जैसे बड़े संवैधानिक मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक सहमति बनाए।
ऐसे में मुद्दा सिर्फ किसी एक बिल को पारित कराने का नहीं है, बल्कि संसद के भीतर राजनीतिक समर्थन और सहमति का गणित साधने का भी है।
आने वाले दिनों में सरकार और विपक्षी दलों के बीच होने वाली बैठकों से यह स्पष्ट हो सकता है कि FCRA संशोधन बिल को किस गति से आगे बढ़ाया जाएगा और परिसीमन पर सहमति बनाने की रणनीति कितनी सफल होती है।
विपक्ष की नजर भी सरकार की रणनीति पर
विपक्षी दल सरकार के कदमों को बारीकी से देख रहे हैं। एक तरफ FCRA को लेकर वे विधेयक के प्रावधानों पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं परिसीमन पर दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में DMK और शरद पवार गुट की स्थिति खास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि सरकार इन दलों के साथ किसी स्तर पर सहमति बनाने में सफल रहती है, तो संसद में कई अहम मुद्दों पर उसका राजनीतिक प्रबंधन आसान हो सकता है।
