निचली अदालतों में जजों के 7,300 से ज्यादा पद खाली, कर्नाटक में सबसे ज्यादा कमी
देश की जिला और अधीनस्थ अदालतों में 7,310 न्यायिक अधिकारियों के पद खाली हैं। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, 30,868 स्वीकृत पदों के मुकाबले 23,558 न्यायिक अधिकारी ही कार्यरत हैं। यह कुल स्वीकृत पदों का करीब 23.68 प्रतिशत है। राज्यों में कर्नाटक में सबसे अधिक 1,640 पद रिक्त हैं। राज्य में 2,812 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 1,172 न्यायिक अधिकारी कार्यरत हैं, यानी करीब 58 प्रतिशत पद खाली हैं। इसके बाद उत्तर प्रदेश में 1,082 और महाराष्ट्र में 897 पद रिक्त हैं।
लेखक
Jyoti Mukherjee
जिला और अधीनस्थ अदालतों में जजों की भारी कमी
भारत की निचली अदालतों में न्यायिक अधिकारियों की कमी एक बार फिर सामने आई है। संसद में उपलब्ध कराए गए ताजा आंकड़ों के मुताबिक, जिला और अधीनस्थ अदालतों में 7,310 जजों के पद रिक्त हैं। 30,868 स्वीकृत पदों में से 23,558 पर ही न्यायिक अधिकारी कार्यरत हैं।
यह आंकड़ा 17 जुलाई 2026 की स्थिति पर आधारित है। कुल स्वीकृत पदों में से करीब 23.68 प्रतिशत पद खाली हैं।
कर्नाटक में सबसे ज्यादा 1,640 पद खाली
राज्यों में सबसे बड़ी कमी कर्नाटक की जिला न्यायपालिका में दर्ज की गई है। यहां 2,812 स्वीकृत पदों में से केवल 1,172 पदों पर न्यायिक अधिकारी कार्यरत हैं। यानी 1,640 पद खाली हैं और रिक्ति दर करीब 58 प्रतिशत है।
कर्नाटक के बाद उत्तर प्रदेश में 1,082, महाराष्ट्र में 897, गुजरात में 535, बिहार में 374, मध्य प्रदेश में 368, ओडिशा में 329 और झारखंड में 212 न्यायिक पद रिक्त हैं।
अन्य राज्यों की स्थिति
आंकड़ों के अनुसार पंजाब की जिला न्यायपालिका में 138 और हरियाणा में 139 पद खाली हैं। दिल्ली में 118, जम्मू-कश्मीर में 55 और लद्दाख में 9 न्यायिक पद रिक्त बताए गए हैं।
कुछ केंद्र शासित प्रदेशों में स्थिति अलग है। चंडीगढ़ और दमन एवं दीव में स्वीकृत न्यायिक पदों के मुकाबले कोई रिक्ति दर्ज नहीं की गई।
खाली पद और लंबित मुकदमों का दबाव
निचली अदालतों में न्यायिक अधिकारियों की कमी ऐसे समय सामने आई है जब देश की अदालतों में बड़ी संख्या में मुकदमे लंबित हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, जिला और अधीनस्थ अदालतों में लंबित मामलों की संख्या पांच करोड़ से अधिक है।
कर्नाटक में भी लंबित मामलों का दबाव काफी अधिक है। जुलाई 2026 के आसपास उपलब्ध आंकड़ों में राज्य की निचली अदालतों में 23 लाख से अधिक मामले लंबित बताए गए हैं। ऐसे में न्यायिक पदों की बड़ी संख्या में रिक्तियां अदालतों के कामकाज और मामलों के निपटारे की क्षमता से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बनती हैं।
हालांकि, केवल न्यायिक रिक्तियों को ही मामलों की लंबित संख्या का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता। अदालतों में बुनियादी ढांचा, स्टाफ, मुकदमों की प्रकृति और प्रक्रियात्मक देरी जैसे अन्य कारक भी न्यायिक कामकाज को प्रभावित करते हैं।
देश में जजों की संख्या और स्वीकृत पदों के बीच अंतर
संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, जिला और अधीनस्थ अदालतों में 30,868 पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें से 7,310 पदों पर नियुक्ति नहीं हुई है। यानी मौजूदा कार्यरत संख्या और स्वीकृत क्षमता के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है।
यह स्थिति इस बात पर भी ध्यान खींचती है कि केवल नए पद स्वीकृत करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि रिक्त पदों को समय पर भरना भी जरूरी है। न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति की प्रक्रिया में संबंधित राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों की भूमिका होती है।
न्यायपालिका में रिक्तियों का मुद्दा क्यों अहम?
जिला और अधीनस्थ अदालतें आम नागरिकों के लिए न्यायिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण स्तर हैं। आपराधिक मामलों, दीवानी विवादों, पारिवारिक मामलों और अन्य मुकदमों की बड़ी संख्या इन्हीं अदालतों में आती है।
इसलिए इन अदालतों में न्यायिक अधिकारियों की कमी का मुद्दा न्याय तक समय पर पहुंच और मामलों के निपटारे की गति से जुड़ा हुआ है। हालांकि किसी मामले के निपटारे में लगने वाला समय केवल जजों की संख्या पर निर्भर नहीं करता।
सरकार के आंकड़ों से सामने आई तस्वीर
ताजा संसदीय आंकड़े बताते हैं कि देश की जिला न्यायपालिका में कुल रिक्ति दर करीब 24 प्रतिशत है। वहीं कर्नाटक में यह दर करीब 58 प्रतिशत तक पहुंचती है, जिससे राज्य सबसे अधिक रिक्तियों वाले राज्यों में शीर्ष पर है।
न्यायिक पदों को भरने की प्रक्रिया और अदालतों की क्षमता बढ़ाने के प्रयास आने वाले समय में इस समस्या से निपटने के लिए महत्वपूर्ण होंगे। फिलहाल संसद में पेश आंकड़े देश की निचली अदालतों में उपलब्ध न्यायिक क्षमता और स्वीकृत पदों के बीच बने बड़े अंतर को रेखांकित करते हैं।
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