'SIR प्रक्रिया पूरी तरह विफल, आयोग का प्रेस नोट सिर्फ डैमेज कंट्रोल'; जयराम रमेश ने चुनाव आयोग पर साधा निशाना
SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को लेकर कांग्रेस और चुनाव आयोग के बीच विवाद और तेज हो गया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने 27 सितंबर को चुनाव आयोग के हालिया प्रेस नोट पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे “डैमेज कंट्रोल की हताश कोशिश” बताया और आरोप लगाया कि आयोग ने SIR से जुड़े कई गंभीर सवालों का जवाब नहीं दिया है। वहीं, चुनाव आयोग ने 26 सितंबर के अपने प्रेस नोट में कहा कि SIR से जुड़े उसके फैसले आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी से लिए गए हैं। आयोग ने यह भी कहा कि SIR पूरा हो चुके राज्यों में छूटे हुए मतदाता लगातार अपडेट की प्रक्रिया के तहत नाम जोड़ने के लिए आवेदन कर सकते हैं।
लेखक
Jyoti Mukherjee
SIR को लेकर फिर आमने-सामने कांग्रेस और चुनाव आयोग
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर कांग्रेस और चुनाव आयोग के बीच विवाद बढ़ता जा रहा है। कांग्रेस महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश ने चुनाव आयोग के 26 सितंबर के प्रेस नोट पर कई सवाल उठाए हैं।
रमेश ने आयोग के स्पष्टीकरण को “डैमेज कंट्रोल” बताते हुए कहा कि इससे SIR प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े कांग्रेस के सवालों का समाधान नहीं होता। उनका बयान कांग्रेस की ओर से जारी आधिकारिक प्रतिक्रिया में भी दर्ज है।
जयराम रमेश ने क्या कहा?
जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि आयोग की ओर से जारी प्रेस नोट “सीधे तौर पर” उन खबरों और आरोपों का खंडन नहीं करता, जिनके बाद आयोग ने यह स्पष्टीकरण जारी किया।
उन्होंने गोवा का उदाहरण देते हुए कहा कि 97 मतदाताओं के नाम हटाए जाने के मामले में आयोग ने बताया है कि उनमें से 81 लोगों ने नाम शामिल कराने के लिए Form 6 भर दिया है। रमेश ने इसे लेकर चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाया।
हालांकि, ये जयराम रमेश और कांग्रेस के आरोप हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि गोवा के मामले में संबंधित बूथ लेवल अधिकारियों को छूटे हुए मतदाताओं के घर जाकर फॉर्म जमा कराने और नाम शामिल करने की प्रक्रिया में मदद करने का निर्देश दिया गया है।
5.43 करोड़ मतदाताओं को लेकर कांग्रेस का दावा
जयराम रमेश ने अपने बयान में 5.43 करोड़ मतदाताओं का भी उल्लेख किया, जिन्हें उन्होंने SIR प्रक्रिया में नाम हटाए जाने के जोखिम वाले मतदाताओं के रूप में पेश किया।
उनका सवाल था कि जिन मतदाताओं के लिए अब बूथ लेवल अधिकारियों को घर-घर जाकर दस्तावेज जुटाने की बात कही जा रही है, वही प्रक्रिया पहले के घर-घर सत्यापन चरण में पर्याप्त रूप से क्यों नहीं हुई। कांग्रेस का कहना है कि इस तरह के बाद के कदम बड़े पैमाने पर मतदाता अधिकारों से जुड़े सवालों का समाधान नहीं करते।
EC ने अपने प्रेस नोट में क्या कहा?
चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को जारी प्रेस नोट में कई फैसलों और स्पष्टीकरणों की जानकारी दी।
आयोग के अनुसार, जिन लोगों को SIR के दौरान unmapped या logical discrepancies के कारण नोटिस जारी किया गया है, उनके घर अब BLO जाकर दस्तावेज एकत्र कर सकते हैं। इन दस्तावेजों को ECINet पर अपलोड किया जाएगा और संबंधित Electoral Registration Officer यानी ERO फैसला करेगा। सामान्य परिस्थितियों में ऐसे लोगों को ERO/AERO कार्यालय में सुनवाई के लिए बुलाने की जरूरत नहीं होगी।
आयोग ने यह भी कहा कि 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में SIR पूरा हो चुका है, जिनमें बिहार और पश्चिम बंगाल भी शामिल हैं। जिन लोगों के नाम छूट गए हैं, वे लगातार मतदाता सूची अपडेट की प्रक्रिया के तहत नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं।
चुनाव आयोग ने SIR पर क्या सफाई दी?
आयोग ने कहा कि 24 जून 2025 को जारी SIR आदेश को सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी मिली थी। आयोग के अनुसार, इस आदेश को 27 मई 2026 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश में भी बरकरार रखा गया।
ECI ने यह भी कहा कि अलग-अलग चरणों के SIR कार्यक्रमों को भी आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी से जारी किया गया। हालांकि, अंतिम मतदाता संख्या अभी बाकी राज्यों में प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगी।
ECINet को लेकर भी उठे सवाल
जयराम रमेश ने चुनाव आयोग के ECINet पोर्टल को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने आयोग द्वारा IIT और IIIT विशेषज्ञों से पोर्टल की समीक्षा कराने के फैसले को पर्याप्त समाधान नहीं माना।
कांग्रेस का तर्क है कि उसकी चिंता केवल पोर्टल की तकनीकी क्षमता को लेकर नहीं, बल्कि मतदाता पंजीकरण और डेटा प्रबंधन में कथित केंद्रीकरण को लेकर भी है।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने अपने प्रेस नोट में कहा है कि ECINet और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों को दिए गए निर्देशों में निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया जा रहा है। आयोग ने यह भी कहा कि SIR से संबंधित निर्णय पूर्ण आयोग की मंजूरी से लिए गए।
Gen Z वोटर्स और Form 6 का मुद्दा
जयराम रमेश ने युवा यानी Gen Z मतदाताओं से जुड़े Form 6 के कथित बदलावों का मुद्दा भी उठाया। उनका आरोप है कि जुलाई 2026 के बाद किए गए बदलावों से नए मतदाताओं पर माता-पिता या दादा-दादी की जानकारी उपलब्ध कराने का अतिरिक्त बोझ पड़ा।
कांग्रेस ने इन बदलावों के कानूनी आधार और प्रक्रिया पर चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है। ये आरोप कांग्रेस की ओर से लगाए गए हैं और आयोग की 26 सितंबर की प्रेस नोट में दी गई जानकारी में इन सभी आरोपों का विस्तृत जवाब नहीं मिलता।
SIR को लेकर विवाद की अगली कड़ी
SIR पर मौजूदा विवाद की एक पृष्ठभूमि चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों से जुड़ी रिपोर्टें भी हैं। The Indian Express ने चुनाव आयुक्तों के बीच SIR से जुड़े कुछ मुद्दों पर आंतरिक पत्राचार और असहमतियों की रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसके बाद चुनाव आयोग ने अपने 26 सितंबर के प्रेस नोट में कहा कि SIR से जुड़े प्रमुख निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे।
इस पूरे विवाद में कांग्रेस आयोग की पारदर्शिता और मतदाता सूची से जुड़े निर्णयों पर सवाल उठा रही है, जबकि चुनाव आयोग अपने निर्णयों को निर्धारित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत लिया गया बता रहा है।
अब आगे क्या?
SIR पूरा हो चुके राज्यों में जिन मतदाताओं के नाम छूट गए हैं, उनके लिए चुनाव आयोग ने continuous updation के तहत आवेदन की व्यवस्था बताई है। आयोग ने संबंधित अधिकारियों को ऐसे मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाने के निर्देश भी दिए हैं।
इस बीच कांग्रेस की ओर से SIR की प्रक्रिया, मतदाता नामों के हटने और ECINet से जुड़े सवालों पर और स्पष्टीकरण की मांग की जा रही है। आगे इस मुद्दे पर चुनाव आयोग और विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक तथा कानूनी बहस जारी रहने की संभावना है।
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