2 साल, 2 इस्तीफे और 2 अलग-अलग मुख्यमंत्री... B नागेंद्र को फिर क्यों छोड़ना पड़ा मंत्री पद? समझिए पूरी Inside Story
कर्नाटक के कांग्रेस नेता बी. नागेंद्र ने महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम से जुड़े कथित करोड़ों रुपये के घोटाले के आरोपों के बीच दो साल में दूसरी बार मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। खास बात यह है कि दोनों बार इस्तीफे की पृष्ठभूमि एक ही विवाद रही, लेकिन दोनों मौकों पर मुख्यमंत्री अलग थे। 2024 में सिद्धारमैया सरकार में मंत्री रहते नागेंद्र ने इस्तीफा दिया था, जबकि अगस्त 2026 में डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद कैबिनेट में दोबारा शामिल होने के महज 25 दिन बाद उन्हें फिर पद छोड़ना पड़ा।
लेखक
Vinay Mishra
बेंगलुरु: कर्नाटक की राजनीति में बी. नागेंद्र का नाम एक बार फिर सुर्खियों में है। वजह है उनका मंत्री पद से इस्तीफा। खास बात यह है कि यह कोई पहली बार नहीं है। करीब दो साल में नागेंद्र ने दूसरी बार मंत्री पद छोड़ा है और दोनों बार विवाद की जड़ महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताएं रही हैं।
पहली बार जून 2024 में जब सिद्धारमैया मुख्यमंत्री थे, तब नागेंद्र ने मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। अब अगस्त 2026 में, जब डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री हैं, उन्होंने दोबारा इस्तीफा दे दिया। सबसे दिलचस्प बात यह है कि कैबिनेट में उनकी वापसी को अभी सिर्फ 25 दिन ही हुए थे।
2024 में पहली बार क्यों देना पड़ा था इस्तीफा?
मामला कर्नाटक महार्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम में कथित वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ा है। निगम का गठन अनुसूचित जनजाति समुदाय के कल्याण और विकास के लिए किया गया था।
मई 2024 में निगम के एक अकाउंट्स सुपरिंटेंडेंट पी. चंद्रशेखरन की आत्महत्या के बाद मामला सामने आया। उनके कथित सुसाइड नोट में निगम के फंड में गड़बड़ी और अनधिकृत ट्रांसफर से जुड़े गंभीर आरोप लगाए गए थे।
इसके बाद विपक्ष ने तत्कालीन मंत्री बी. नागेंद्र के इस्तीफे की मांग तेज कर दी। राजनीतिक दबाव बढ़ने के बाद जून 2024 में नागेंद्र ने सिद्धारमैया कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया।
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ
मंत्री पद छोड़ने के बाद भी नागेंद्र की मुश्किलें खत्म नहीं हुईं। मामले में प्रवर्तन निदेशालय यानी ED की जांच आगे बढ़ी और जुलाई 2024 में उन्हें गिरफ्तार किया गया था। बाद में उन्हें जमानत मिल गई।
नागेंद्र ने जांच के दौरान अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि ED ने उन पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और तत्कालीन उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के नाम लेने का दबाव बनाया। इन दावों पर जांच एजेंसी की ओर से अलग रुख रहा।
फिर 2026 में कैबिनेट में वापसी कैसे हुई?
समय बीतने के साथ नागेंद्र की राजनीतिक वापसी हुई। कर्नाटक की सत्ता में नेतृत्व परिवर्तन के बाद डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री बने और कैबिनेट विस्तार में नागेंद्र को फिर से मंत्री बनाया गया।
उन्हें प्लानिंग एंड स्टैटिस्टिक्स विभाग की जिम्मेदारी दी गई। लेकिन उनकी वापसी के साथ ही विपक्ष ने सरकार पर हमला तेज कर दिया।
BJP और JD(S) ने उनकी दोबारा कैबिनेट में एंट्री का लगातार विरोध किया और वाल्मीकि निगम मामले का हवाला देते हुए उनके इस्तीफे की मांग की। अगस्त में BJP नेताओं ने इस मुद्दे पर विधानसभा तक मार्च किया और प्रदर्शन भी किए।
सिर्फ 25 दिन बाद फिर इस्तीफा
नागेंद्र की मुश्किलें तब और बढ़ गईं जब CBI ने कथित वाल्मीकि निगम घोटाले में उनके खिलाफ अभियोजन की अनुमति के लिए राज्यपाल से संपर्क किया। इसी के बाद विपक्षी दबाव और राजनीतिक विवाद और तेज हो गया।
28 अगस्त 2026 को नागेंद्र ने भावुक अंदाज में अपने इस्तीफे का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि वह अपनी पार्टी को शर्मिंदगी से बचाने के लिए स्वेच्छा से पद छोड़ रहे हैं। उन्होंने अपने इस्तीफे को अपने ऊपर लगे आरोपों की स्वीकारोक्ति नहीं बताया और राजनीतिक निशाना बनाए जाने का आरोप लगाया।
नागेंद्र ने किसे ठहराया जिम्मेदार?
इस्तीफे की घोषणा के दौरान नागेंद्र ने विपक्ष पर हमला बोला और दावा किया कि उन्हें राजनीतिक रूप से निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने अपने खिलाफ कार्रवाई को लेकर “मनुवादियों” पर निशाना साधा और खुद को राजनीतिक साजिश का शिकार बताया।
दूसरी ओर, BJP का आरोप है कि सरकार ने गंभीर आरोपों के बावजूद नागेंद्र को दोबारा मंत्री बनाकर जांच और जवाबदेही को कमजोर करने की कोशिश की।
BJP के प्रदेश अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने तो नागेंद्र को इस पूरे मामले में “छोटी मछली” बताते हुए कहा कि असली बड़े जिम्मेदार लोगों तक जांच अभी नहीं पहुंची है।
दो इस्तीफे, एक ही विवाद
बी. नागेंद्र की राजनीतिक कहानी में सबसे बड़ा सवाल यही है कि एक ही विवाद दो साल बाद फिर उनके मंत्री पद तक क्यों पहुंच गया?
2024 में मामला सामने आने के बाद उन्होंने मंत्री पद छोड़ा था। इसके बाद जांच, गिरफ्तारी और जमानत का दौर चला। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और 2026 में उन्हें दोबारा कैबिनेट में जगह मिल गई।
उनकी वापसी के साथ ही वही पुराना मामला फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया। विपक्ष ने इसे सरकार की जवाबदेही का मुद्दा बनाया और लगातार प्रदर्शन किए। अंततः नागेंद्र को दूसरी बार मंत्री पद छोड़ना पड़ा।
क्या यह सिर्फ इस्तीफा है या कांग्रेस के लिए बड़ा राजनीतिक संकट?
मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा है कि नागेंद्र ने कांग्रेस को संभावित शर्मिंदगी से बचाने के लिए इस्तीफा दिया। हालांकि, अंतिम निर्णय पार्टी हाईकमान से सलाह के बाद होने की बात भी कही गई है।
ऐसे में नागेंद्र का इस्तीफा केवल एक मंत्री के पद छोड़ने की घटना नहीं है। यह कांग्रेस सरकार के सामने भ्रष्टाचार के आरोपों, विपक्ष के दबाव और पार्टी के भीतर राजनीतिक प्रबंधन की चुनौती को भी सामने लाता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जांच आगे बढ़ने पर नागेंद्र के खिलाफ आरोपों की दिशा क्या होगी और क्या इस मामले में उन लोगों तक जांच पहुंचेगी, जिन्हें विपक्ष कथित घोटाले के “बड़े खिलाड़ी” बता रहा है।
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