बाढ़ में राहत-बचाव के लिए विदेशी मदद लेने को माना नेपाल, भारत से टीमें रवाना होने के लिए तैयार
नेपाल ने विनाशकारी बाढ़ के बाद विदेशी मदद को लेकर अपना रुख बदलते हुए सीमित तकनीकी और विशेषज्ञ सहायता स्वीकार करने का फैसला किया है। इससे पहले काठमांडू ने विदेशी सर्च एंड रेस्क्यू टीमों को यह कहते हुए अनुमति देने से इनकार किया था कि नेपाली सुरक्षा एजेंसियां अभियान संभाल सकती हैं। अब नेपाल को टनल रेस्क्यू, डीएनए टेस्टिंग, परिवहन और संचार बहाली जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञ मदद की जरूरत है। भारत ने पहले ही राहत सामग्री भेजी है और विशेषज्ञों व बचाव दलों को भेजने की तैयारी कर ली है।
लेखक
Vinay Mishra
नई दिल्ली: नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन के बाद राहत एवं बचाव अभियान के बीच बड़ा बदलाव सामने आया है। विदेशी सर्च एंड रेस्क्यू टीमों को लेकर शुरुआती हिचकिचाहट के बाद नेपाल ने अब सीमित विदेशी तकनीकी सहायता स्वीकार करने का फैसला किया है। भारत उन देशों में शामिल है, जिसने सबसे पहले मदद की पेशकश की थी।
नेपाल में बाढ़ से तबाही का पैमाना लगातार बढ़ता जा रहा है। हजारों लोग लापता हैं और कई इलाकों में सड़क, पुल, संचार व्यवस्था तथा अन्य बुनियादी ढांचा बुरी तरह प्रभावित हुआ है। ऐसे में नेपाल को सामान्य राहत सामग्री से ज्यादा विशेष तकनीकी विशेषज्ञता और उपकरणों की जरूरत महसूस हो रही है।
पहले विदेशी रेस्क्यू टीमों को किया था मना
बाढ़ के शुरुआती दिनों में नेपाल सरकार ने भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन समेत कई देशों की ओर से भेजी जाने वाली विदेशी सर्च एंड रेस्क्यू टीमों के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया था।
नेपाल का कहना था कि उसके अपने सुरक्षा बल और राहत एजेंसियां बचाव अभियान संभालने में सक्षम हैं। 2015 के भूकंप के दौरान बड़ी संख्या में विदेशी रेस्क्यू टीमों के पहुंचने से पैदा हुई समन्वय संबंधी मुश्किलों को भी इस फैसले की एक वजह बताया गया था।
लेकिन जमीनी हालात बेहद चुनौतीपूर्ण बने रहने के बाद काठमांडू ने अब अपना रुख नरम किया है।
अब किस तरह की विदेशी मदद चाहता है नेपाल?
नेपाल के विदेश मंत्री के मुताबिक, देश को सामान्य सर्च एंड रेस्क्यू टीमों से ज्यादा विशेषज्ञ और तकनीकी सहायता की जरूरत है।
खास तौर पर टनल में फंसे लोगों को निकालने, डीएनए टेस्टिंग, परिवहन व्यवस्था बहाल करने और संचार नेटवर्क को दोबारा खड़ा करने जैसे क्षेत्रों में विदेशी विशेषज्ञता मांगी जा रही है। नेपाल ने पुनर्निर्माण के लिए भी अरबों डॉलर की जरूरत का अनुमान जताया है।
भारत पहले से तैयार, टीमें भेजने की पेशकश
भारत ने नेपाल को NDRF की विशेषज्ञ टीम भेजने की पेशकश पहले ही कर दी थी। भारत का विदेश मंत्रालय नेपाल सरकार की अनुमति का इंतजार कर रहा था।
अब नेपाल के रुख में बदलाव के बाद भारत की ओर से विशेषज्ञ दलों को रवाना करने की तैयारी तेज हो गई है। ताजा घटनाक्रम के मुताबिक, एक 11 सदस्यीय भारतीय टीम, जिसमें मेडिकल कर्मी और टनल रेस्क्यू विशेषज्ञ शामिल हैं, नेपाल पहुंच चुकी है।
इससे संकेत मिलता है कि भारत अब केवल राहत सामग्री भेजने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विशेष तकनीकी बचाव अभियान में भी नेपाल की मदद करेगा।
भारत ने पहले ही भेजी बड़ी मात्रा में राहत सामग्री
नेपाल में आपदा के बाद भारत ने तेजी से मानवीय सहायता पहुंचाई है। भारतीय वायुसेना के C-130 विमान से दवाइयां, भोजन और अन्य जरूरी सामान नेपाल भेजे गए हैं।
29 अगस्त को भारत ने एक और खेप भेजी, जिसमें करीब 10 टन जरूरी राहत सामग्री शामिल थी। इससे पहले भी भारत की ओर से कई एयरलिफ्ट के जरिए राहत सामग्री पहुंचाई गई थी।
भारत की सहायता को Humanitarian Assistance and Disaster Relief (HADR) अभियान के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है।
नेपाल में क्यों मुश्किल हो रहा है बचाव अभियान?
बाढ़ की तबाही बेहद दुर्गम हिमालयी इलाकों में हुई है। कई जगह सड़कें और पुल बह गए हैं, जिससे जमीन के रास्ते राहत दलों का पहुंचना मुश्किल है।
इसके अलावा भारी मलबा, कीचड़ और खराब मौसम ने हेलीकॉप्टर और जमीनी अभियानों के सामने भी चुनौती खड़ी की है। कुछ इलाकों में सुरंगों के अंदर बड़ी संख्या में लोगों के फंसे होने की खबरों ने विशेषीकृत टनल रेस्क्यू विशेषज्ञों की जरूरत बढ़ा दी है।
करीब 3 हजार लोग अब भी लापता
ताजा रिपोर्टों के मुताबिक नेपाल में मृतकों की संख्या 600 के पार पहुंच गई है, जबकि करीब 3,000 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक भी शामिल हैं, जिनमें भारतीय नागरिकों की संख्या उल्लेखनीय है।
नेपाल-तिब्बत सीमा से लगे इलाकों में हुई तबाही ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। कई गांवों और महत्वपूर्ण परिवहन मार्गों को भारी नुकसान पहुंचा है।
भारत-नेपाल सहयोग की अहम परीक्षा
नेपाल का विदेशी सहायता स्वीकार करने का फैसला ऐसे समय आया है जब देश को एक साथ बचाव, चिकित्सा सहायता और बुनियादी ढांचे की बहाली की जरूरत है।
भारत के लिए भी यह अभियान अहम है। पड़ोसी देश होने के अलावा बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक नेपाल में प्रभावित हुए हैं। ऐसे में भारत की राहत और विशेषज्ञ सहायता दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
नेपाल ने शुरुआत में विदेशी रेस्क्यू टीमों को लेकर जो सावधानी बरती थी, अब वह तकनीकी सहायता की जरूरत के सामने बदलती दिखाई दे रही है। आने वाले दिनों में भारत और अन्य देशों की विशेषज्ञ टीमें राहत एवं बचाव अभियान में कितनी बड़ी भूमिका निभाती हैं, इस पर सबकी नजर रहेगी।
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