क्या 150 दिनों में फीका पड़ा बालेन शाह का जादू? काठमांडू में Gen-Z मांग रहे इस्तीफा, अपनों ने भी खोला मोर्चा
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह को सत्ता संभाले करीब 150 दिन हुए हैं, लेकिन जिस Gen-Z लहर ने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया था, वही युवा अब उनके खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं। काठमांडू में इस्तीफे की मांग, संसद से दूरी, भारत-नेपाल सीमा पर बयान को लेकर विवाद और अपनी ही पार्टी में बढ़ते मतभेदों ने शाह की सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है।
लेखक
Vinay Mishra
कभी Gen-Z के 'हीरो' रहे बालेन शाह अब उसी युवा पीढ़ी के निशाने पर हैं। नेपाल की राजनीति में रैपर से मेयर और फिर प्रधानमंत्री बने बालेंद्र 'बालेन' शाह ने 27 मार्च 2026 को प्रधानमंत्री पद संभाला था। महज 150 दिन बाद उनकी लोकप्रियता और सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। काठमांडू में युवा प्रदर्शनकारी उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं, जबकि संसद और उनकी अपनी पार्टी के भीतर भी दबाव बढ़ रहा है।
यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शाह की सत्ता की पूरी कहानी ही युवाओं के असंतोष से शुरू हुई थी। 2025 के Gen-Z आंदोलन ने पुराने राजनीतिक नेतृत्व के खिलाफ माहौल बनाया था और उसी के बाद 2026 के चुनाव में शाह की Rastriya Swatantra Party (RSP) ने शानदार जीत दर्ज की। अब वही युवा वर्ग सरकार से जवाब मांग रहा है।
150 दिन में क्यों बदला माहौल?
बालेन शाह जब प्रधानमंत्री बने तो उनसे पारंपरिक नेपाली राजनीति से अलग काम करने की उम्मीद की गई थी। पूर्व काठमांडू मेयर और रैपर के तौर पर उनकी पहचान ने उन्हें पुराने राजनीतिक चेहरों से अलग बनाया।
लेकिन सत्ता संभालने के बाद सरकार को कई मोर्चों पर विवादों और प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। रोजगार, सुशासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई जैसे मुद्दों पर युवाओं की उम्मीदें काफी ऊंची थीं। कुछ ही महीनों में यह उम्मीदें नाराजगी में बदलने लगीं।
जिस Gen-Z ने सत्ता दिलाई, वही अब सड़कों पर
बालेन शाह की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत युवा मतदाता थे। 2025 के आंदोलन के बाद हुए चुनाव में उनकी पार्टी ने पुराने राजनीतिक दलों को पीछे छोड़ते हुए भारी बहुमत हासिल किया।
लेकिन जुलाई से ही काठमांडू समेत नेपाल के कई हिस्सों में युवाओं के विरोध की खबरें सामने आने लगी थीं। प्रदर्शनकारियों में ऐसे युवा भी शामिल रहे हैं जो शाह के सत्ता में आने को बदलाव की उम्मीद से जोड़ते थे।
अब अगस्त में 150 दिन पूरे होने के साथ यह सवाल और तेज हो गया है कि क्या बालेन का 'चेंज' वाला मॉडल लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रहा?
भारत-नेपाल सीमा पर बयान से बढ़ी मुश्किल
बालेन शाह की सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकट उस वक्त पैदा हुआ जब उन्होंने नेपाल की संसद में भारत-नेपाल सीमा विवाद को लेकर बयान दिया।
शाह ने कहा था कि सीमा विवाद को एकतरफा मुद्दे के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके बयान के बाद नेपाल में विपक्षी दलों और छात्रों ने विरोध किया तथा उनके इस्तीफे की मांग भी उठी। खास तौर पर कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर उनकी टिप्पणी ने राजनीतिक विवाद पैदा किया।
भारत ने इन क्षेत्रों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि ये भारत का अभिन्न हिस्सा हैं।
संसद से दूरी भी बनी बड़ी वजह
बालेन शाह की कार्यशैली को लेकर सबसे गंभीर सवालों में से एक उनका संसद से जुड़ा रवैया है।
रिपोर्टों के मुताबिक, प्रधानमंत्री बनने के बाद शुरुआती 39 संसदीय बैठकों में शाह सिर्फ पांच में उपस्थित हुए। इस पर विपक्षी सांसदों ने सवाल उठाए और उनकी जवाबदेही को लेकर आलोचना की।
अब नेपाल के स्पीकर डोल प्रसाद आर्याल ने शाह को 26 अगस्त को संसद में उपस्थित होकर सांसदों के सवालों का जवाब देने का निर्देश दिया है।
यह घटनाक्रम इसलिए अहम है क्योंकि शाह की राजनीति ही पारंपरिक व्यवस्था और जवाबदेही की आलोचना से उभरी थी। संसद से उनकी दूरी को उनके आलोचक इसी वादे के उलट कदम के तौर पर देख रहे हैं।
'अपनों' ने भी खोला मोर्चा
मुश्किल सिर्फ सड़क या विपक्ष तक सीमित नहीं है। Rastriya Swatantra Party के भीतर भी सरकार की कार्यशैली को लेकर असहमति सामने आने लगी है।
150 दिनों में शाह को प्रशासनिक फैसलों, मंत्रियों की भूमिका और राजनीतिक रणनीति को लेकर लगातार सवालों का सामना करना पड़ा है। रिपोर्टों में पार्टी के भीतर बढ़ती बेचैनी को भी उनके लिए बड़ा राजनीतिक खतरा बताया गया है।
शाह की पार्टी ने 2026 के चुनाव में भारी बहुमत हासिल किया था, इसलिए फिलहाल उनकी सरकार को तत्काल सत्ता संकट का सामना नहीं दिख रहा। लेकिन पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ना उनके लिए लंबी अवधि में चुनौती बन सकता है।
सरकार के सामने रोजगार भी बड़ी चुनौती
बालेन शाह की लोकप्रियता का एक बड़ा आधार युवाओं की उम्मीदें थीं। नेपाल में बड़ी संख्या में युवा रोजगार के लिए विदेश जाते हैं। चुनाव के दौरान घरेलू रोजगार पैदा करने और युवाओं को देश में अवसर देने का मुद्दा महत्वपूर्ण था।
लेकिन सरकार के शुरुआती महीनों में रोजगार के मोर्चे पर अपेक्षित बदलाव नहीं दिखने को लेकर युवाओं में निराशा की बात सामने आई है। अप्रैल में ही Gen-Z मतदाताओं ने सरकार से रोजगार को लेकर ठोस कदम उठाने की मांग की थी।
एक मंत्री का इस्तीफा भी बना परेशानी
बालेन सरकार को शुरुआती महीनों में ही मंत्रिस्तरीय संकट का सामना करना पड़ा। अप्रैल में गृह मंत्री सुदन गुरूंग ने निवेश और अन्य मामलों को लेकर उठे सवालों के बीच इस्तीफा दे दिया था। वह शाह सरकार से इस्तीफा देने वाले दूसरे मंत्री थे।
ऐसे घटनाक्रमों ने उस छवि को नुकसान पहुंचाया है जिसमें शाह की सरकार को पुरानी राजनीति से बिल्कुल अलग और साफ-सुथरा विकल्प माना जा रहा था।
क्या सच में खत्म हो गया बालेन शाह का जादू?
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि बालेन शाह की लोकप्रियता पूरी तरह खत्म हो गई है। उनके पास संसद में मजबूत बहुमत है और उनकी RSP अभी भी नेपाल की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक ताकतों में है।
लेकिन इतना जरूर है कि शुरुआती उत्साह अब सवालों में बदल चुका है। जिन युवाओं ने उन्हें बदलाव का चेहरा माना था, उनके बीच सरकार के प्रदर्शन को लेकर असंतोष दिख रहा है। संसद से दूरी, सीमा विवाद पर बयान, प्रशासनिक फैसले और पार्टी के भीतर मतभेद ने उनकी सरकार को शुरुआती दौर में ही रक्षात्मक स्थिति में ला दिया है।
बालेन शाह की राजनीति: रैपर से PM तक
बालेन शाह की कहानी नेपाल की पारंपरिक राजनीति से बिल्कुल अलग रही है। पेशे से स्ट्रक्चरल इंजीनियर और रैपर रहे शाह ने 2022 में काठमांडू के मेयर का चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीता था।
मेयर के रूप में उनकी सख्त प्रशासनिक शैली और पुराने राजनीतिक दलों के खिलाफ उनकी छवि ने उन्हें युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाया। इसके बाद 2026 के चुनाव में उन्होंने RSP का नेतृत्व किया और पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलाई।
यही वजह है कि उनकी मौजूदा मुश्किलें सामान्य राजनीतिक संकट से ज्यादा बड़ी मानी जा रही हैं। जिस 'एंटी-एस्टैब्लिशमेंट' छवि ने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया, वही अब उनसे ज्यादा तेज नतीजे मांग रही है।
150 दिनों में बालेन शाह के सामने आई बड़ी चुनौतियां
चुनौतीस्थितिGen-Z विरोधयुवाओं के एक वर्ग ने इस्तीफे की मांग कीसंसद से दूरी39 में सिर्फ 5 बैठकों में उपस्थिति की रिपोर्टभारत-नेपाल सीमा विवादबयान के बाद राजनीतिक विवादपार्टी के भीतर असंतोषRSP में मतभेद की खबरेंरोजगारयुवाओं की अपेक्षाओं पर सवालमंत्रिमंडलशुरुआती महीनों में मंत्रियों के इस्तीफेविपक्ष का दबावलगातार जवाबदेही की मांग
अब आगे क्या?
बालेन शाह के लिए आने वाले दिन बेहद महत्वपूर्ण हैं। 26 अगस्त को संसद में उनकी मौजूदगी और सांसदों के सवालों के जवाब से यह पता चलेगा कि वह बढ़ते राजनीतिक दबाव का सामना किस तरह करते हैं।
उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपने समर्थक युवा वर्ग को फिर से भरोसा दिलाएं कि जिस बदलाव के नाम पर उन्हें सत्ता मिली थी, वह सिर्फ राजनीतिक नारा नहीं बल्कि शासन की वास्तविक दिशा है।
निष्कर्ष:
बालेन शाह की लोकप्रियता खत्म हो गई है, ऐसा अभी नहीं कहा जा सकता। लेकिन 150 दिनों में उनके सामने जिस तरह के विरोध, संसदीय सवाल और पार्टी के भीतर असंतोष खड़े हुए हैं, वे निश्चित रूप से उनकी शुरुआती चमक को कमजोर करते हैं। सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल अब यही है—क्या बालेन शाह Gen-Z की उस उम्मीद को फिर से जगा पाएंगे, जिसने उन्हें नेपाल की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाया था?
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