ऊना दलित उत्पीड़न कांड पर भड़कीं मायावती, गुजरात सरकार से बोलीं- अभी भी मौका है, अपनी गलती सुधार ले
गुजरात के चर्चित ऊना दलित उत्पीड़न मामले को लेकर बसपा प्रमुख मायावती ने गुजरात सरकार पर तीखा निशाना साधा है। उन्होंने सरकार से अपनी गलती सुधारने और पीड़ितों को न्याय दिलाने की मांग की। यह मामला 2016 में चार दलित युवकों के साथ हुई मारपीट से जुड़ा है। मार्च 2026 में विशेष अदालत ने पांच आरोपियों को पांच साल की सजा सुनाई, जबकि 35 आरोपी बरी हुए; पीड़ित पक्ष ने फैसले के खिलाफ गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया है।
लेखक
Vinay Mishra

ऊना दलित उत्पीड़न कांड पर भड़कीं मायावती, गुजरात सरकार से बोलीं- अभी भी मौका है, अपनी गलती सुधार ले
गुजरात के चर्चित ऊना दलित उत्पीड़न कांड को लेकर राजनीतिक बयानबाजी एक बार फिर तेज हो गई है। बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने मामले को लेकर गुजरात सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि सरकार के पास अभी भी अपनी गलती सुधारने का मौका है। उन्होंने पीड़ितों को न्याय दिलाने और मामले में प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग की है।
करीब एक दशक पुराने इस मामले में मार्च 2026 में विशेष अदालत का फैसला आने के बाद विवाद फिर चर्चा में आया। अदालत ने पांच आरोपियों को दोषी ठहराया और उन्हें पांच साल की सजा सुनाई, जबकि 35 आरोपियों को बरी कर दिया गया। इसके बाद पीड़ित परिवारों की ओर से गुजरात हाईकोर्ट में अपील किए जाने की जानकारी सामने आई।
मायावती ने गुजरात सरकार को क्या कहा?
मायावती ने ऊना मामले को लेकर गुजरात सरकार की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए सरकार से अपनी गलती सुधारने की अपील की है। उनका कहना है कि ऐसे मामलों में केवल कानूनी प्रक्रिया पूरी होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पीड़ितों को न्याय मिलने का भरोसा भी होना चाहिए।
मायावती का यह बयान ऐसे समय आया है जब ऊना मामले के फैसले को लेकर पीड़ित पक्ष और सामाजिक संगठनों की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, पीड़ित परिवारों ने अदालत के फैसले के खिलाफ गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
क्या है ऊना दलित उत्पीड़न मामला?
ऊना मामला जुलाई 2016 में गुजरात के गिर सोमनाथ जिले के ऊना क्षेत्र में सामने आया था। चार दलित युवकों के साथ मारपीट की घटना के बाद इसका वीडियो सामने आया और पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई।
यह मामला उस समय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया था। घटना के बाद गुजरात समेत कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए और दलित अधिकारों तथा सामाजिक भेदभाव को लेकर व्यापक बहस छिड़ी।
मामले ने कानून-व्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक न्याय और कमजोर वर्गों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए।
2026 में आया कोर्ट का फैसला
ऊना मामले में लंबे समय तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद मार्च 2026 में वेरावल स्थित विशेष एससी/एसटी अत्याचार निवारण अदालत ने फैसला सुनाया।
अदालत ने पांच आरोपियों को दोषी ठहराया और उन्हें पांच साल की जेल की सजा सुनाई। इसके अलावा जुर्माना भी लगाया गया। वहीं, मामले में मुकदमे का सामना कर रहे 35 अन्य आरोपियों को बरी कर दिया गया।
यही फैसला अब राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बना हुआ है।
ऊना केस के फैसले की बड़ी बातें
मामला वर्ष 2016 की घटना से जुड़ा है।
चार दलित युवकों के साथ मारपीट की घटना ने देशभर में प्रतिक्रिया पैदा की थी।
मार्च 2026 में विशेष अदालत ने फैसला सुनाया।
पांच आरोपियों को पांच साल की सजा मिली।
35 आरोपियों को अदालत ने बरी कर दिया।
पीड़ित पक्ष ने फैसले को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
पीड़ित पक्ष ने हाईकोर्ट का रुख क्यों किया?
मार्च में आए फैसले के बाद पीड़ित पक्ष की ओर से गुजरात हाईकोर्ट में अपील की गई। जुलाई 2026 की रिपोर्टिंग में बताया गया कि ऊना मामले के पीड़ित परिवारों ने दोषसिद्धि और बरी किए गए आरोपियों से जुड़े फैसले के खिलाफ कानूनी लड़ाई जारी रखने की बात कही है।
इससे साफ है कि मामला अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। हाईकोर्ट में आगे की कानूनी प्रक्रिया इस केस की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकती है।
10 साल बाद भी क्यों चर्चा में है ऊना कांड?
ऊना की घटना को केवल एक आपराधिक मामले के रूप में नहीं देखा जाता। इसने भारत में जातिगत भेदभाव, सामाजिक सम्मान और कमजोर वर्गों की सुरक्षा जैसे सवालों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया था।
जुलाई 2026 में घटना के दस साल पूरे होने के मौके पर अहमदाबाद में पीड़ित परिवारों और समर्थकों ने न्याय और समर्थन की मांग को फिर उठाया। रिपोर्ट के अनुसार, पीड़ितों के परिवारों की ओर से कानूनी लड़ाई जारी रखने की बात कही गई है।
यानी लगभग एक दशक बाद भी इस मामले में न्याय की प्रक्रिया को लेकर सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।
मायावती के बयान का राजनीतिक असर
मायावती लंबे समय से दलित अधिकारों और सामाजिक न्याय के मुद्दों को अपनी राजनीति का प्रमुख आधार बनाती रही हैं। ऐसे में गुजरात के ऊना मामले पर उनका बयान राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
उनका निशाना केवल अदालत के फैसले पर नहीं बल्कि सरकार की जवाबदेही पर भी है। मायावती का संदेश साफ है कि कमजोर और वंचित वर्गों के मामलों में सरकार को ऐसी कार्रवाई करनी चाहिए जिससे पीड़ितों का कानून और प्रशासन पर भरोसा मजबूत हो।
हालांकि, मामले की अंतिम कानूनी स्थिति गुजरात हाईकोर्ट में चलने वाली आगे की प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
आम लोगों पर इसका क्या असर?
ऊना मामला सीधे तौर पर आम नागरिकों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सवाल उठाता है कि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ सामाजिक या जातिगत आधार पर हिंसा और भेदभाव होने पर कानून कितनी प्रभावी सुरक्षा देता है।
ऐसे मामलों में केवल सजा का आंकड़ा महत्वपूर्ण नहीं होता। पीड़ित परिवारों की सुरक्षा, निष्पक्ष जांच, समय पर न्याय और कानून के समान इस्तेमाल पर लोगों का भरोसा भी उतना ही जरूरी है।
यही वजह है कि मायावती के बयान के बाद ऊना मामला एक बार फिर सामाजिक न्याय और सरकारी जवाबदेही की बहस में आ गया है।
आगे क्या होगा?
अब सभी की नजर गुजरात हाईकोर्ट में चलने वाली कानूनी प्रक्रिया पर है। पीड़ित पक्ष की अपील के बाद मामले के उन पहलुओं पर फिर सुनवाई हो सकती है जिन्हें चुनौती दी गई है।
फिलहाल मार्च में विशेष अदालत द्वारा सुनाई गई पांच दोषियों की पांच साल की सजा और 35 आरोपियों के बरी होने का फैसला इस मामले की मौजूदा कानूनी स्थिति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
निष्कर्ष
ऊना दलित उत्पीड़न कांड की कहानी करीब दस साल बाद भी खत्म नहीं हुई है। मार्च 2026 का अदालत का फैसला आने के बावजूद पीड़ित पक्ष की हाईकोर्ट में अपील ने मामले को फिर सुर्खियों में ला दिया है।
इसी बीच मायावती ने गुजरात सरकार को निशाने पर लेते हुए कहा है कि अभी भी सरकार के पास अपनी गलती सुधारने का मौका है। अब बड़ा सवाल यही है कि आगे की न्यायिक प्रक्रिया में क्या होता है और क्या पीड़ित परिवारों को वह न्याय मिल पाता है जिसकी वे लंबे समय से मांग कर रहे हैं।
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