MP High Court on DNA Report: 'फोरेंसिक लैब भरोसेमंद नहीं', मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने DNA रिपोर्ट पर स्वतंत्र जांच के दिए आदेश
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य की फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरीज से तैयार DNA रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। मामला तब सामने आया जब एक DNA रिपोर्ट में आरोपी और पीड़ित के सैंपल भेजे जाने के बावजूद किसी दूसरे व्यक्ति का नाम दर्ज पाया गया। कोर्ट ने अब राज्य से बाहर की फोरेंसिक लैब के वरिष्ठ वैज्ञानिकों की तीन सदस्यीय समिति बनाकर पिछले पांच वर्षों में अदालतों के सामने पेश की गई DNA रिपोर्ट के 20% सैंपल की स्वतंत्र जांच का आदेश दिया है। समिति को छह महीने में अपनी रिपोर्ट हाई कोर्ट में सौंपनी होगी।
लेखक
Vinay Mishra

MP High Court on DNA Report: 'फोरेंसिक लैब भरोसेमंद नहीं', मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने DNA रिपोर्ट पर स्वतंत्र जांच के दिए आदेश
भोपाल/जबलपुर। मध्य प्रदेश में आपराधिक मामलों की जांच में इस्तेमाल होने वाली DNA रिपोर्ट को लेकर हाई कोर्ट ने ऐसा सवाल उठा दिया है, जिसका असर आने वाले दिनों में कई मामलों पर पड़ सकता है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य की फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरीज की रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर गंभीर चिंता जताते हुए अब स्वतंत्र जांच के आदेश दिए हैं।
मामला एक ऐसी DNA रिपोर्ट से जुड़ा है, जिसमें आरोपी और सर्वाइवर के सैंपल DNA जांच के लिए भेजे गए थे, लेकिन अदालत के सामने पेश रिपोर्ट में किसी दूसरे व्यक्ति का नाम दर्ज था। फोरेंसिक लैब की ओर से इसे पहले 'टाइपिंग' या 'टाइपोग्राफिकल' गलती बताया गया। बाद में अदालत के सामने 'कट एंड पेस्ट' की वजह से नाम बदल जाने की संभावना बताई गई।
हाई कोर्ट ने इसी स्पष्टीकरण पर सबसे गंभीर सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि यदि नाम में कट-पेस्ट की गलती संभव है तो DNA मैचिंग से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़ों में भी ऐसी गलती की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला पंकज कुमार बिंदोलिया की अपील की सुनवाई के दौरान सामने आया। उन्हें POCSO मामले में उम्रकैद की सजा मिली है। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट की नजर उस DNA रिपोर्ट पर गई, जिसमें जांच के लिए आरोपी और सर्वाइवर के सैंपल भेजे जाने के बावजूद रिपोर्ट में किसी अन्य व्यक्ति के नाम का उल्लेख था।
इस विसंगति के बाद अदालत ने मामले को सामान्य तकनीकी गलती मानकर आगे बढ़ने के बजाय फोरेंसिक रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठाया।
हाई कोर्ट ने इस संबंध में मध्य प्रदेश के गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव और भोपाल फोरेंसिक साइंस लैब के निदेशक से हलफनामा भी मांगा था। लैब निदेशक शशिकांत शुक्ला की ओर से अदालत को बताया गया कि रिपोर्ट में नाम का बदलाव 'टाइपोग्राफिकल एरर' यानी टाइपिंग संबंधी गलती के कारण हुआ।
'कट-पेस्ट' की गलती पर हाई कोर्ट ने जताई नाराजगी
अदालत इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुई। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब DNA रिपोर्ट में किसी व्यक्ति के सैंपल से जुड़े Article B और C को किसी दूसरे व्यक्ति का बताया जा सकता है, तो केवल इसे टाइपिंग की गलती बताकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि जब किसी रिपोर्ट का संबंध किसी व्यक्ति की जिंदगी और मौत जैसे गंभीर परिणामों से हो, तब ऐसी गलती को मामूली तकनीकी त्रुटि मानना उचित नहीं है।
इसके बाद प्रारंभिक जांच के लिए डॉ. हर्षा सिंह को जिम्मेदारी दी गई थी। उन्होंने 5 अगस्त 2026 को अदालत के सामने पेश होकर बताया कि गलत नाम 'कट एंड पेस्ट' की गलती से रिपोर्ट में आ सकता है।
यही जवाब हाई कोर्ट के लिए चिंता का सबसे बड़ा कारण बन गया।
कोर्ट ने पूछा- नाम बदल सकता है तो DNA मैचिंग के नंबर भी?
हाई कोर्ट की चिंता केवल एक गलत नाम तक सीमित नहीं रही। अदालत ने कहा कि अगर 'कट एंड पेस्ट' के दौरान नाम बदल सकता है, तो क्या DNA chromosomes की matching से जुड़े numerals में भी ऐसी गलती हो सकती है?
यही सवाल पूरे मामले को गंभीर बना देता है, क्योंकि DNA रिपोर्ट में केवल नाम ही महत्वपूर्ण नहीं होता। सैंपल की पहचान, प्रोफाइलिंग, मैचिंग और रिपोर्टिंग से जुड़े वैज्ञानिक आंकड़े किसी आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
अदालत ने इसी आधार पर राज्य की फोरेंसिक लैब से आने वाली DNA रिपोर्टों की विश्वसनीयता की व्यापक जांच का रास्ता खोला है।
अब 20% DNA सैंपल की होगी स्वतंत्र जांच
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अब राज्य के बाहर की फोरेंसिक लैबोरेटरीज के वरिष्ठ वैज्ञानिकों की तीन सदस्यीय समिति गठित करने का आदेश दिया है।
इस समिति की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होगी कि वह पिछले 5 वर्षों में राज्य की फोरेंसिक लैब से तैयार और अदालतों में पेश की गई DNA रिपोर्टों में से 20% सैंपल को रैंडम तरीके से चुने।
इसके बाद इन सैंपल की स्वतंत्र रूप से जांच की जाएगी और यह देखा जाएगा कि रिपोर्टों में दर्ज निष्कर्ष सही और वैज्ञानिक रूप से विश्वसनीय हैं या नहीं।
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि समिति में शामिल वरिष्ठ वैज्ञानिक अलग-अलग राज्यों से होने चाहिए और एक ही राज्य से दो सदस्य नहीं होने चाहिए। इससे जांच को अधिक स्वतंत्र और निष्पक्ष रखने की कोशिश की गई है।
7 दिन में समिति बनाने का आदेश, 6 महीने में रिपोर्ट
हाई कोर्ट ने मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को समिति गठित करने के लिए 7 दिन की समयसीमा दी है।
इसके बाद समिति को DNA रिपोर्टों की जांच करनी होगी और अपनी विस्तृत रिपोर्ट हाई कोर्ट के सामने 6 महीने के भीतर पेश करनी होगी।
यानी आने वाले महीनों में मध्य प्रदेश की फोरेंसिक व्यवस्था को लेकर एक व्यापक वैज्ञानिक समीक्षा सामने आ सकती है। इस जांच के निष्कर्ष यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि समस्या केवल एक रिपोर्ट तक सीमित थी या फोरेंसिक रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया में व्यापक स्तर पर सुधार की जरूरत है।
आम लोगों और आपराधिक मामलों पर क्या पड़ेगा असर?
फोरेंसिक रिपोर्ट आज के आपराधिक न्याय तंत्र का अहम हिस्सा है। हत्या, यौन अपराध, पहचान, जैविक सैंपल और दूसरे गंभीर मामलों में DNA जांच पुलिस की जांच और अदालत में पेश किए जाने वाले सबूतों को वैज्ञानिक आधार देने में मदद करती है।
ऐसे में किसी DNA रिपोर्ट में नाम या वैज्ञानिक आंकड़ों की गलती सामने आना केवल कागजी त्रुटि नहीं है। इसका सीधा संबंध किसी आरोपी के खिलाफ चल रहे मुकदमे और पीड़ित पक्ष को मिलने वाले न्याय से हो सकता है।
हालांकि, इस आदेश का यह अर्थ नहीं है कि मध्य प्रदेश की हर DNA रिपोर्ट गलत है या हर मामले में फोरेंसिक लैब की रिपोर्ट अविश्वसनीय साबित हो गई है। हाई कोर्ट ने स्वतंत्र जांच का आदेश देकर इसी सवाल की वैज्ञानिक तरीके से पड़ताल करने को कहा है।
पहले भी सामने आ चुकी है फोरेंसिक लैब की क्षमता और देरी की समस्या
मध्य प्रदेश में फोरेंसिक जांच से जुड़े मुद्दे पहले भी अदालतों के सामने आते रहे हैं। 2022 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने DNA जांच से जुड़े मामलों में रिपोर्ट में देरी और फोरेंसिक लैब की क्षमता को लेकर राज्य से जानकारी मांगी थी। उस समय अदालत के सामने लैब में कर्मचारियों की कमी और सीमित क्षमता का मुद्दा भी आया था।
इससे साफ है कि फोरेंसिक व्यवस्था को लेकर सवाल केवल आज का नहीं है। लेकिन 2026 का मौजूदा मामला इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि अब सवाल सिर्फ रिपोर्ट मिलने में देरी का नहीं, बल्कि रिपोर्ट की correctness और veracity यानी सही होने और विश्वसनीयता की स्वतंत्र जांच तक पहुंच गया है।
DNA रिपोर्ट कितनी महत्वपूर्ण होती है?
DNA प्रोफाइलिंग वैज्ञानिक साक्ष्य के रूप में बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन अदालत में इसकी उपयोगिता केवल 'मैच' शब्द तक सीमित नहीं होती। सैंपल कैसे लिया गया, उसे कैसे सील किया गया, किस तरह लैब तक पहुंचाया गया, लैब में उसकी जांच किस प्रक्रिया से हुई और रिपोर्ट कैसे तैयार हुई—इन सभी चरणों की विश्वसनीयता मायने रखती है।
वैज्ञानिक साक्ष्य में प्रयोगशाला की प्रक्रिया और संभावित त्रुटियों का मूल्यांकन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी जांच प्रणाली में quality control और सही documentation आवश्यक होते हैं।
अब आगे क्या होगा?
अब सबसे बड़ी नजर तीन सदस्यीय स्वतंत्र समिति की जांच पर रहेगी। समिति पिछले पांच वर्षों में अदालतों के सामने पेश की गई DNA रिपोर्टों के 20% सैंपल का चयन करेगी और उनकी जांच करेगी।
इस जांच से तीन महत्वपूर्ण सवालों के जवाब मिलने की उम्मीद है:
क्या DNA रिपोर्ट में गलत नाम दर्ज होने की घटना केवल एक अलग मामला है?
क्या रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया में systematic error की संभावना है?
क्या पिछले वर्षों में अदालतों में पेश की गई कुछ रिपोर्टों की दोबारा वैज्ञानिक जांच जरूरी होगी?
इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में मध्य प्रदेश की न्यायिक और फोरेंसिक व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे।
निष्कर्ष
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का यह आदेश फोरेंसिक जांच व्यवस्था के लिए एक बड़ा चेतावनी संकेत है। अदालत ने अभी किसी निष्कर्ष के आधार पर सभी DNA रिपोर्टों को गलत नहीं ठहराया है, बल्कि स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच के जरिए सच्चाई सामने लाने का रास्ता चुना है।
पिछले पांच वर्षों की 20% DNA रिपोर्टों की जांच और छह महीने में रिपोर्ट पेश करने का आदेश यह दिखाता है कि अदालत इस मामले को कितनी गंभीरता से देख रही है।
अब असली परीक्षा स्वतंत्र समिति की रिपोर्ट की होगी। अगर जांच में बड़ी खामियां सामने आती हैं तो फोरेंसिक लैब की कार्यप्रणाली, रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया, quality control और वैज्ञानिक निगरानी में बड़े सुधार की जरूरत पड़ सकती है। वहीं अगर अधिकांश रिपोर्ट सही पाई जाती हैं, तो मौजूदा विवाद की वास्तविक सीमा भी स्पष्ट हो जाएगी।
फिलहाल इतना तय है कि DNA रिपोर्ट को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का यह आदेश आने वाले समय में कई आपराधिक मामलों और राज्य की फोरेंसिक जांच व्यवस्था पर असर डाल सकता है।
स्रोत आधार: उपलब्ध ताजा न्यायिक रिपोर्टिंग और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से संबंधित सार्वजनिक न्यायिक रिकॉर्ड।
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