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72 घंटे में टूट सकती है नेपाल बॉर्डर पर बनी झील, चीन की चेतावनी के बाद हाई अलर्ट पर प्रशासन

नेपाल-तिब्बत सीमा पर विनाशकारी बाढ़ के बाद अब एक और बड़ा खतरा मंडरा रहा है। चीन ने चेतावनी दी है कि Chhochen Khola और Purepu Tsangpo नदियों के संगम के पास बनी एक बैरियर झील अगले तीन दिनों में टूट सकती है। झील के टूटने पर नीचे की ओर फिर अचानक बाढ़ आने का खतरा है। चीन ने संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ा दी है और कुछ गांवों को खाली कराया गया है।

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72 घंटे में टूट सकती है नेपाल बॉर्डर पर बनी झील, चीन की चेतावनी के बाद हाई अलर्ट पर प्रशासन

नई दिल्ली: नेपाल-चीन सीमा पर 26 अगस्त को आई भीषण फ्लैश फ्लड से हुई तबाही के बाद अब एक और संभावित जल प्रलय का खतरा सामने आ गया है। चीन ने सीमा के ऊपरी इलाके में बनी एक प्राकृतिक बैरियर झील को लेकर हाई अलर्ट जारी किया है। अधिकारियों का आकलन है कि अगर झील का प्राकृतिक बांध टूटता है तो अगले 72 घंटे में अचानक बड़े पैमाने पर पानी नीचे की ओर आ सकता है।

यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब नेपाल के रासुवा जिले और चीन के तिब्बत क्षेत्र में विनाशकारी बाढ़ ने बड़ी संख्या में लोगों की जान ले ली है और सैकड़ों लोग अब भी लापता हैं।

कहां बनी है यह खतरनाक झील?

चीन के मुताबिक, जिस बैरियर झील पर नजर रखी जा रही है, वह Chhochen Khola और Purepu Tsangpo नदियों के संगम के पास बनी है। यह इलाका नेपाल सीमा के काफी करीब है।

विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्रों में जब भूस्खलन, बर्फ और चट्टानों का विशाल मलबा किसी नदी या घाटी को रोक देता है तो उसके पीछे पानी जमा होकर ऐसी landslide-dammed या barrier lake बन सकती है। यदि प्राकृतिक अवरोध कमजोर हुआ तो जमा पानी अचानक निकल सकता है और नीचे की घाटियों में विनाशकारी बाढ़ ला सकता है।

चीन ने क्यों जारी किया अलर्ट?

26 अगस्त की आपदा के बाद चीन की जल संसाधन एजेंसियां सीमा क्षेत्र में लगातार स्थिति पर नजर रख रही हैं। Reuters के मुताबिक, चीन ने संभावित द्वितीयक आपदा को रोकने के लिए मॉनिटरिंग और आकलन तेज कर दिया है। बीजिंग और चेंगदू से फायर एवं रेस्क्यू टीमें भी राहत कार्य में लगाई गई हैं।

चीनी अधिकारियों को आशंका है कि अगर बैरियर झील का पानी तेजी से बाहर निकला तो पहले से बाढ़ से जूझ रहे इलाकों में स्थिति और खराब हो सकती है।

72 घंटे का खतरा कितना गंभीर है?

'72 घंटे में झील टूट सकती है' वाली चेतावनी का अर्थ यह नहीं है कि झील निश्चित रूप से टूट जाएगी। इसका मतलब है कि मौजूदा परिस्थितियों में उसके टूटने का जोखिम इतना बढ़ गया है कि प्रशासन को संभावित बाढ़ के लिए तुरंत तैयार रहने की जरूरत है।

अगर प्राकृतिक बांध टूटता है, तो पानी और मलबे का तेज बहाव निचले इलाकों में पहुंच सकता है। यही वजह है कि संवेदनशील गांवों को खाली कराने और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने की कार्रवाई शुरू की गई है।

पहले ही मच चुकी है भारी तबाही

यह चेतावनी उस आपदा के ठीक बाद आई है जिसमें नेपाल और तिब्बत के सीमावर्ती इलाकों में भारी नुकसान हुआ।

26 अगस्त को नेपाल के रासुवा जिले और चीन के तिब्बत स्थित ग्यिरोंग क्षेत्र में अचानक आई बाढ़ और मलबे ने सड़कें, पुल, इमारतें और बिजली परियोजनाओं को नुकसान पहुंचाया। चीन में भी तीन मौतों की पुष्टि हुई है, जबकि तिब्बत क्षेत्र में सैकड़ों लोग लापता बताए गए हैं।

AP के अनुसार, नेपाल और तिब्बत में इस आपदा से सैकड़ों लोगों की मौत और 1,300 से अधिक लोगों के लापता होने की रिपोर्ट सामने आई है। बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक और तीर्थयात्री भी प्रभावित हुए हैं।

आखिर पहली बाढ़ आई कैसे?

शुरुआती रिपोर्टों में भूकंप की आशंका जताई गई थी, लेकिन बाद के वैज्ञानिक आकलन में तस्वीर अलग सामने आई।

USGS और अन्य विश्लेषणों के आधार पर अब बर्फ और चट्टान के बड़े हिस्से के टूटने से हुए हिमस्खलन/भूस्खलन और उसके बाद बने मलबे के तेज बहाव को आपदा का प्रमुख कारण माना जा रहा है। इससे पानी का विशाल प्रवाह नीचे की ओर गया और ल्हेंडे खोला तथा ब्होटे कोशी नदी तंत्र में तबाही मच गई।

क्या यह पहली बार है जब इस इलाके में ऐसी झील बनी?

नहीं। हिमालय में ग्लेशियरों के पीछे पानी जमा होने और प्राकृतिक बांध बनने की घटनाएं पहले भी होती रही हैं।

नेपाल में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) एक जाना-पहचाना खतरा है। जब ग्लेशियल झील का प्राकृतिक बांध टूटता है तो बहुत कम समय में बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर पहुंच सकता है।

हालिया घटनाक्रम ने इस खतरे को इसलिए और गंभीर बना दिया है क्योंकि सीमा क्षेत्र पहले ही एक बड़ी प्राकृतिक आपदा से जूझ रहा है।

चीन ने गांव खाली कराने शुरू किए

संभावित खतरे को देखते हुए चीन के तिब्बती क्षेत्र में संवेदनशील गांवों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया है। अधिकारियों ने नदी और झील की स्थिति पर लगातार निगरानी बढ़ाई है।

बचावकर्मियों के सामने चुनौती यह है कि इलाके में पहले से ही सड़क और संचार व्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा है। ऐसे में यदि दूसरी बाढ़ आती है तो राहत दलों के लिए प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचना और मुश्किल हो सकता है।

नेपाल के लिए क्यों बढ़ी चिंता?

नेपाल का उत्तरी हिस्सा बेहद ऊंचे और दुर्गम हिमालयी इलाके में स्थित है। चीन-नेपाल सीमा के पास से निकलने वाली नदियां आगे नेपाल में प्रवेश करती हैं और नीचे की ओर बसे कई इलाकों को प्रभावित करती हैं।

26 अगस्त की बाढ़ में भी ल्हेंडे खोला से आया पानी और मलबा ब्होटे कोशी नदी में पहुंचा, जिसके बाद नेपाल के रासुवा और आगे के इलाकों में भारी नुकसान हुआ।

इसलिए सीमा के ऊपरी हिस्से में किसी भी नए जल अवरोध या झील के टूटने की स्थिति में नेपाल के निचले इलाकों में अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।

भारत के लिए भी क्यों अहम है यह अलर्ट?

नेपाल और तिब्बत के हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली बड़ी जल घटनाओं का असर केवल सीमा के आसपास तक सीमित नहीं रहता। हिमालय से निकलने वाली नदियां आगे चलकर भारत के बड़े नदी तंत्र का हिस्सा बनती हैं।

हालिया आपदा के बाद नेपाल के विदेश मंत्री ने भी हिमालय में तेजी से बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों को लेकर भारत और चीन के साथ क्षेत्रीय सहयोग की जरूरत पर जोर दिया है।

इसलिए नई बैरियर झील को लेकर जारी चेतावनी भारत के लिए भी जल और आपदा सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण संकेत है।

क्या झील टूटने से फिर आएगी बाढ़?

खतरा है, लेकिन इसे निश्चित नहीं कहा जा सकता।

फिलहाल चीन की चेतावनी का आधार झील के प्राकृतिक अवरोध की स्थिति और उसके टूटने की संभावना है। यदि अवरोध टूटता है तो अचानक पानी नीचे की ओर जा सकता है। लेकिन बाढ़ की तीव्रता इस बात पर निर्भर करेगी कि झील में कितना पानी जमा है, प्राकृतिक बांध कितना मजबूत है और पानी किस दिशा में बहता है।

यही वजह है कि अधिकारी संभावित स्थिति के लिए पहले से तैयारी कर रहे हैं।

72 घंटे के अलर्ट की अहम बातें

मुद्दाजानकारीखतराबैरियर झील के टूटने की आशंकासंभावित समयअगले 3 दिन/72 घंटेस्थानChhochen Khola–Purepu Tsangpo संगम के पासक्षेत्रतिब्बत, नेपाल सीमा के करीबसंभावित असरअचानक बाढ़ और मलबे का बहावचीन की कार्रवाईनिगरानी और जोखिम आकलन तेजगांवसंवेदनशील इलाकों से लोगों को हटाया गयामौजूदा स्थितिहाई अलर्ट

एक आपदा के बाद दूसरी चुनौती

नेपाल-तिब्बत सीमा पर मौजूदा संकट यह दिखाता है कि हिमालय में एक प्राकृतिक घटना दूसरी आपदा को जन्म दे सकती है। पहले ग्लेशियर/बर्फ-चट्टान के ढहने और मलबे के बहाव ने विनाशकारी बाढ़ पैदा की। अब उसी क्षेत्र में बने संभावित जल अवरोध ने नई चिंता पैदा कर दी है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक हिमालय में ग्लेशियरों के पीछे हटने, पर्माफ्रॉस्ट के कमजोर होने और चरम मौसम की घटनाओं से ऐसे जोखिमों को गंभीरता से लेना जरूरी है। हालांकि किसी एक घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम घोषित करने में सावधानी बरतनी चाहिए।

निष्कर्ष

नेपाल-तिब्बत सीमा पर बाढ़ की तबाही अभी थमी भी नहीं है कि एक और संभावित खतरे ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। चीन के मुताबिक Chhochen Khola और Purepu Tsangpo के संगम के पास बनी बैरियर झील के अगले तीन दिनों में टूटने का जोखिम है।

फिलहाल इसे संभावित खतरा समझना जरूरी है, न कि तयशुदा दूसरी बाढ़। चीन ने निगरानी बढ़ा दी है और संवेदनशील गांवों को खाली कराया जा रहा है। अगले 72 घंटे इस बात के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होंगे कि झील स्थिर रहती है या उसका प्राकृतिक बांध टूटकर नीचे की ओर नया जलप्रलय पैदा करता है।

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