यूपी चुनाव से पहले एक सीट पर कैसे हुई 10,470 नाम में गड़बड़ी?
उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में 10,470 एंट्रीज़ में अनियमितताएं सामने आई हैं। जांच के मुताबिक, फॉर्म 8 के हजारों आवेदनों से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे। मामले में कंप्यूटर असिस्टेंट की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं और दो चुनाव अधिकारियों समेत तीन लोगों के खिलाफ FIR दर्ज हुई है। इस खुलासे के बाद मतदाता सूची की पारदर्शिता और चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
लेखक
Jyoti Mukherjee

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले पीलीभीत की मतदाता सूची में बड़ी अनियमितताओं का मामला सामने आया है। जांच में विधानसभा क्षेत्र की 10,470 एंट्रीज़ में गड़बड़ी पाए जाने की बात सामने आई है। इस मामले में एक कंप्यूटर असिस्टेंट की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं, जबकि दो चुनाव अधिकारियों समेत तीन लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराई गई है।
मामले ने मतदाता सूची की शुद्धता, चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, गड़बड़ियों के पीछे किसी बड़ी साजिश की भूमिका अभी साबित नहीं हुई है।
### जांच में क्या खुलासा हुआ?
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) ने अक्टूबर 2026 में जारी जानकारी में बताया कि पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में 10,470 एंट्रीज़ में अनियमितताएं पाई गई हैं।
जिला निर्वाचन अधिकारी की जांच रिपोर्ट के अनुसार, पीलीभीत के वोटर रजिस्ट्रेशन सेंटर में तैनात एक कंप्यूटर असिस्टेंट ने 31 मई से 29 अगस्त 2026 के बीच मतदाता विवरण में सुधार के नाम पर फॉर्म 8 के 13,779 आवेदन दर्ज किए थे।
निर्वाचन नियमों के तहत फॉर्म 8 का इस्तेमाल मतदाता सूची में दर्ज जानकारी सुधारने, पता बदलने या मतदाता पहचान पत्र से संबंधित कुछ बदलावों के लिए किया जाता है।
जांच में सामने आया कि इन 13,779 एंट्रीज़ से जुड़े भौतिक फॉर्म या सहायक दस्तावेज कार्यालय में उपलब्ध नहीं थे। इनमें से 10,470 आवेदनों को मंजूरी दी गई थी और इन सभी स्वीकृत मामलों में अनियमितताएं पाई गईं।
### किसके खिलाफ हुई कार्रवाई?
मामले में असिस्टेंट डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर (ADEO) ने कंप्यूटर असिस्टेंट और दो इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (EROs) के खिलाफ FIR दर्ज कराई है। कंप्यूटर असिस्टेंट की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं।
दोनों EROs के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। इसके अलावा, असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (AEROs) की भूमिका की भी जांच की जा रही है।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जिला निर्वाचन अधिकारी को यह भी निर्देश दिया कि 10 अप्रैल से 21 अक्टूबर के बीच इसी कंप्यूटर असिस्टेंट द्वारा किए गए फॉर्म 6 के जरिए नाम जोड़ने और फॉर्म 7 के जरिए नाम हटाने से संबंधित मामलों की गहन जांच की जाए।
### शिकायतों के बाद कैसे सामने आया मामला?
उत्तर प्रदेश में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के बाद 10 अप्रैल 2026 को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की गई थी। इसके बाद कुछ मतदाताओं ने शिकायत की कि उनके EPIC यानी वोटर आईडी नंबर पर उनका नाम नहीं, बल्कि किसी अन्य व्यक्ति का नाम दिखाई दे रहा है।
पीलीभीत के अधिवक्ता फैजान अली खान ने 14 अक्टूबर को जिला प्रशासन से शिकायत की थी। उनके मुताबिक, वह और उनके छोटे भाई फरहान चुनाव अधिकारियों के सामने दस्तावेजों के सत्यापन के लिए पेश हुए थे और उनके नाम अंतिम मतदाता सूची में भी मौजूद थे।
लेकिन बाद में EPIC नंबर की जांच करने पर फैजान के रिकॉर्ड में रईस अली और उनके भाई के रिकॉर्ड में गुफरान असलम का नाम दिखाई दिया। फैजान ने दावा किया कि वे इन नामों वाले लोगों को अपने मोहल्ले में नहीं जानते।
उन्होंने अपने और अपने भाई के सही विवरण बहाल करने के साथ ही इस बात की जांच की मांग की कि सत्यापन के बाद मतदाता रिकॉर्ड में बदलाव कैसे हुए।
पीलीभीत के एक अन्य अधिवक्ता रेहान अली ने भी अपने परिवार और आसपास के लोगों के मतदाता रिकॉर्ड में कथित गड़बड़ियां मिलने की बात कही। इसके बाद स्थानीय स्तर पर मतदाता सूची की जांच का मुद्दा उठा।
### राजनीतिक दलों ने क्या आरोप लगाए?
कांग्रेस नेता कुमुद गंगवार के मुताबिक, पार्टी ने स्वयंसेवकों समेत 55 लोगों की एक टीम बनाई थी। टीम ने पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र के लगभग 3.48 लाख मतदाताओं की सूची की बूथ स्तर पर जांच की और 13,150 संदिग्ध मामलों को चिह्नित करने का दावा किया।
गंगवार ने आरोप लगाया कि कई बदलाव देर रात, रविवार या छुट्टियों के दौरान किए गए थे। ये विपक्ष की ओर से लगाए गए आरोप हैं; इन सभी संदिग्ध मामलों को आधिकारिक जांच में अनियमितता पाया जाना अभी अलग विषय है।
19 अक्टूबर को समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा को ज्ञापन सौंपा था। रिपोर्ट के अनुसार, ज्ञापन में पीलीभीत से जुड़ी शिकायत भी शामिल थी। इसके बाद मामले पर प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई शुरू हुई।
### विपक्ष और बीजेपी का क्या कहना है?
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं ने आरोप लगाया है कि कथित तौर पर नाम बदलने के मामलों में मुस्लिम मतदाताओं को निशाना बनाया गया। विपक्ष का कहना है कि गलत विवरण के कारण वास्तविक मतदाताओं को मतदान के समय परेशानी हो सकती है।
समाजवादी पार्टी ने यह आशंका भी जताई है कि ऐसी गड़बड़ियां अन्य विधानसभा क्षेत्रों में भी हो सकती हैं। पार्टी ने व्यापक स्तर पर मतदाता सूची की जांच कराने की बात कही है।
दूसरी ओर, बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा कि राजनीतिक दलों को मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी ने जानबूझकर बदलाव किए हैं, तो जांच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।
फिलहाल, विपक्ष के आरोपों और कथित राजनीतिक मंशा की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है।
### पीलीभीत सीट का चुनावी महत्व
पीलीभीत विधानसभा सीट का पिछला चुनावी परिणाम भी इस मामले को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के मुताबिक, 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के संजय सिंह गंगवार ने इस सीट पर 7,000 से कम वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी।
ऐसे में मतदाता सूची में बड़ी संख्या में अनियमितताएं मिलने की खबर ने चुनाव से पहले राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। हालांकि, केवल अनियमितताओं की संख्या के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कितने मतदाताओं का वोट वास्तव में प्रभावित हुआ।
### अब आगे क्या होगा?
प्रशासन ने 10,470 स्वीकृत मामलों में अनियमितताओं की बात स्वीकार की है और संबंधित रिकॉर्ड की जांच के निर्देश दिए हैं। आगे की जांच से यह स्पष्ट होना बाकी है कि बदलाव किस प्रक्रिया के तहत किए गए, किन लोगों की जिम्मेदारी थी और क्या किसी व्यापक साजिश की भूमिका थी।
मतदाता सूची में सही जानकारी सुनिश्चित करना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए बेहद जरूरी है। पीलीभीत का मामला अब इस सवाल पर केंद्रित है कि प्रभावित मतदाताओं के रिकॉर्ड कितनी जल्दी ठीक किए जाते हैं और जांच में जिम्मेदार पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है।
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