Babita Singh Reporting: ‘Concern’ के नाम पर कैसे छिपा रहता है पितृसत्ता का सबसे खतरनाक चेहरा?
Nimisha Sajayan की फिल्म Babita Singh Reporting सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं है। फिल्म रोजमर्रा की उस पितृसत्ता को सामने लाती है, जो गुस्से या हिंसा के बजाय ‘तुम्हारी भलाई के लिए’ जैसी चिंता, प्यार और सुरक्षा के नाम पर महिलाओं की जिंदगी को नियंत्रित करती है।
Written by
Jyoti Mukherjee
नई दिल्ली: आमतौर पर फिल्मों में पितृसत्ता का चेहरा साफ दिखाई देता है—सख्त पिता, हिंसक पति या अधिकार जमाने वाला पुरुष। लेकिन Babita Singh Reporting इससे कहीं ज्यादा असहज सवाल उठाती है। क्या पितृसत्ता हमेशा डराने-धमकाने के रूप में आती है? या कई बार वह ‘मैं तुम्हारी चिंता कर रहा हूं’, ‘तुम्हारे लिए बेहतर क्या है, मुझे पता है’ और ‘घर की इज्जत का ख्याल रखो’ जैसी बातों के पीछे छिपी होती है?
Ambiecka Pandit के निर्देशन में बनी यह फिल्म Nimisha Sajayan को बाबिता सिंह के किरदार में पेश करती है। वह पुलिस अधिकारी है, लेकिन फिल्म उसे किसी ‘सुपरकॉप’ की तरह नहीं दिखाती। बाबिता अपने काम, शादी और समाज—तीनों जगह अपनी पहचान और आवाज के लिए संघर्ष करती नजर आती है। फिल्म 28 अगस्त 2026 को रिलीज हुई।
पितृसत्ता का सबसे खतरनाक रूप—जब नियंत्रण को प्यार कहा जाए
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यहां नियंत्रण हमेशा आदेश के रूप में सामने नहीं आता। कई बार वह चिंता जैसा लगता है।
पति Sharad का व्यवहार इसका उदाहरण है। वह हमेशा किसी खलनायक की तरह सामने नहीं आता। वह परवाह करने वाला पति भी दिखाई देता है, लेकिन धीरे-धीरे यह साफ होता है कि उसकी ‘परवाह’ के भीतर पत्नी के फैसलों पर अधिकार जमाने की मानसिकता छिपी है।
यही बात फिल्म को ज्यादा वास्तविक बनाती है। क्योंकि असल जिंदगी में भी नियंत्रण हमेशा हिंसा से शुरू नहीं होता। कभी वह कपड़ों पर टिप्पणी से शुरू होता है, कभी नौकरी को लेकर सलाह से, कभी दोस्तों से मिलने पर सवाल उठाने से और कभी यह तय करने से कि महिला के लिए ‘सही’ क्या है।
बाबिता सिर्फ पुलिस केस नहीं सुलझा रही
बाबिता अपने बचपन के दोस्त Bansi की हत्या की जांच में उलझती है। लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती है, फिल्म का असली फोकस हत्या से हटकर बाबिता की अपनी जिंदगी पर आने लगता है।
वह जिस केस की तह तक पहुंचने की कोशिश कर रही है, उसी दौरान उसे अपनी शादी, नौकरी और उन रिश्तों को नए नजरिए से देखने का मौका मिलता है, जिन्हें वह अब तक सामान्य मानती आई थी।
फिल्म का यह हिस्सा खास है क्योंकि बाबिता अचानक निडर सुपरहीरो नहीं बन जाती। वह डरती है, गलतियां करती है, सलाह लेती है और कई बार खुद पर भी संदेह करती है। उसकी ताकत धीरे-धीरे बनती है।
‘अच्छी पत्नी’ बनने की कीमत
फिल्म घर के भीतर महिलाओं से जुड़ी उन अपेक्षाओं को भी निशाना बनाती है जिन्हें अक्सर सामान्य पारिवारिक जिम्मेदारी कह दिया जाता है।
कामकाजी महिला से उम्मीद की जाती है कि वह नौकरी भी पूरी जिम्मेदारी से करे और घर की जिम्मेदारियों में कोई कमी न आने दे। वहीं पुरुषों से जुड़े पारंपरिक अधिकारों को अक्सर ‘स्वाभाविक’ मान लिया जाता है।
यही दोहरा पैमाना Babita Singh Reporting को महज एक क्राइम फिल्म से आगे ले जाता है। Variety India ने भी फिल्म की इसी खूबी को रेखांकित किया है कि बाबिता के साथ होने वाला भेदभाव किसी एक बड़े अत्याचार के बजाय रोजमर्रा के छोटे-छोटे व्यवहारों में दिखाई देता है।
Nimisha Sajayan की खामोश एक्टिंग सबसे बड़ा हथियार
Nimisha Sajayan बाबिता के किरदार को बहुत नियंत्रित अंदाज में निभाती हैं। यहां बड़े-बड़े संवादों से महिला सशक्तिकरण साबित करने की कोशिश नहीं है।
उनके चेहरे पर झिझक, असहजता, गुस्सा और धीरे-धीरे बढ़ता आत्मविश्वास कहानी को आगे बढ़ाता है। India Today ने भी उनके प्रदर्शन को फिल्म की प्रमुख ताकतों में गिना है।
यही वजह है कि बाबिता का सफर विश्वसनीय लगता है। वह एक दिन में बदलने वाली महिला नहीं है। वह उन तमाम छोटे समझौतों से गुजरती है जिनके बाद आखिरकार उसे यह समझ आता है कि अपने जीवन के फैसले लेने के लिए किसी और की अनुमति जरूरी नहीं है।
फिल्म की असली जांच हत्या से ज्यादा समाज की है
Babita Singh Reporting का मर्डर मिस्ट्री वाला हिस्सा फिल्म को गति देता है, लेकिन इसका असली सवाल कहीं बड़ा है—किसी महिला की जिंदगी के बारे में फैसला लेने का अधिकार आखिर किसके पास है?
फिल्म यह भी दिखाती है कि पितृसत्ता केवल पुरुषों द्वारा लागू नहीं होती। कई बार महिलाएं भी उसी व्यवस्था को आगे बढ़ाती हैं, जिसमें उन्हें खुद पाला गया है। इस तरह फिल्म किसी एक व्यक्ति को खलनायक बनाकर समस्या खत्म नहीं करती, बल्कि उस सामाजिक ढांचे की ओर इशारा करती है जिसमें नियंत्रण को सामान्य मान लिया जाता है।
क्या फिल्म पूरी तरह सफल है?
आलोचकों की राय यहां थोड़ी बंटी हुई है। Times of India ने इसे 3.5/5 देते हुए एक शांत लेकिन प्रभावी कहानी बताया, जबकि India Today ने माना कि फिल्म के विषय मजबूत हैं, लेकिन लेखन हर जगह उतनी गहराई तक नहीं पहुंचता।
क्राइम कहानी के स्तर पर कुछ हिस्से धीमे पड़ते हैं। लेकिन फिल्म का सामाजिक पक्ष ज्यादा प्रभावशाली है—खासकर उन दर्शकों के लिए जो पितृसत्ता को सिर्फ हिंसा या खुले भेदभाव के रूप में नहीं, बल्कि रिश्तों के भीतर छिपे नियंत्रण के रूप में समझना चाहते हैं।
Babita Singh Reporting की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि यह पूछती है—अगर कोई व्यक्ति आपको नियंत्रित कर रहा है, लेकिन हर बार कह रहा है कि वह ऐसा आपकी ‘भलाई’ के लिए कर रहा है, तो क्या वह नियंत्रण कम खतरनाक हो जाता है?
शायद नहीं। और फिल्म इसी असहज सच को सामने लाती है।
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