सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए DPSU बनाएं 5 साल का व्यावहारिक रोडमैप, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बड़ा निर्देश
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने देश के सभी 16 डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (DPSU) के प्रदर्शन की समीक्षा करते हुए अगले पांच वर्षों के लिए स्पष्ट और व्यावहारिक रोडमैप तैयार करने का निर्देश दिया है। उन्होंने स्वदेशी उत्पादन, आयात पर निर्भरता कम करने, R&D को टेक्नोलॉजी लीडरशिप में बदलने, रक्षा निर्यात बढ़ाने और वैश्विक स्तर की गुणवत्ता हासिल करने पर जोर दिया। रक्षा मंत्री ने कहा कि DPSU का विकास केवल आर्थिक या औद्योगिक जरूरत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्यता है।
Written by
Vinay Mishra
नई दिल्ली: बदलते युद्ध के तौर-तरीकों और लगातार उभरती सुरक्षा चुनौतियों के बीच रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने देश की रक्षा कंपनियों को भविष्य के लिए तैयार रहने का स्पष्ट संदेश दिया है। उन्होंने 16 डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स यानी DPSU के वार्षिक प्रदर्शन की समीक्षा करते हुए सभी उपक्रमों से अगले पांच साल के लिए स्पष्ट और व्यावहारिक रोडमैप तैयार करने को कहा।
यह समीक्षा बैठक 1 सितंबर 2026 को नई दिल्ली स्थित Defence PSU Bhawan में हुई। बैठक में DPSU के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर ने अपनी उपलब्धियों, उत्पादन क्षमता, तकनीकी विकास, निर्यात और भविष्य की योजनाओं की जानकारी दी।
राजनाथ सिंह ने कहा कि DPSU का बदलाव केवल उद्योग और अर्थव्यवस्था से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला है। उन्होंने इन कंपनियों को बदलती सुरक्षा जरूरतों के अनुरूप अपनी क्षमताओं को तेजी से विकसित करने पर जोर दिया।
पांच साल का रोडमैप क्यों जरूरी?
रक्षा मंत्री का यह निर्देश ऐसे समय आया है जब युद्ध की प्रकृति तेजी से बदल रही है। ड्रोन, साइबर वॉरफेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्वायत्त प्रणालियां, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और सप्लाई चेन सुरक्षा जैसे क्षेत्र अब पारंपरिक सैन्य क्षमताओं जितने ही महत्वपूर्ण हो गए हैं।
राजनाथ सिंह पहले भी कह चुके हैं कि मौजूदा दौर में हाइब्रिड खतरे, साइबर चुनौतियां, सूचना युद्ध, ड्रोन और लॉजिस्टिक्स की मजबूती रक्षा तैयारियों के अहम हिस्से बन चुके हैं।
ऐसे में DPSU को सिर्फ मौजूदा हथियार और सैन्य उपकरण बनाने वाली कंपनियों के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की रक्षा तकनीक विकसित करने वाले संस्थानों के रूप में तैयार करने पर सरकार का जोर है।
स्वदेशी उत्पादन और आयात निर्भरता घटाने पर जोर
राजनाथ सिंह ने DPSU को आयात पर निर्भरता कम करने और स्वदेशी तकनीक एवं उत्पादन क्षमता बढ़ाने का निर्देश दिया।
उन्होंने कहा कि देश की रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए भारतीय कंपनियों को अपनी तकनीकी क्षमता और उत्पादन ढांचे को मजबूत करना होगा। इससे न केवल सैन्य तैयारियों को बल मिलेगा, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन में किसी तरह के व्यवधान की स्थिति में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता भी मजबूत होगी।
R&D को टेक्नोलॉजी लीडरशिप में बदलने की चुनौती
रक्षा मंत्री ने DPSU के रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) पर भी खास जोर दिया। उनका लक्ष्य केवल देश में तकनीक विकसित करना नहीं, बल्कि भारतीय कंपनियों को ऐसी तकनीक के विकास में आगे लाना है जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सके।
सरकार पहले ही DPSU के R&D निवेश को बढ़ाने पर जोर देती रही है। नवंबर 2025 में रक्षा मंत्रालय ने बताया था कि 16 DPSU ने अगले पांच वर्षों में R&D पर करीब ₹32,766 करोड़ खर्च करने का प्रस्ताव रखा था।
रक्षा निर्यात बढ़ाने की तैयारी
राजनाथ सिंह ने डिफेंस एक्सपोर्ट को भी प्राथमिकता देने को कहा। उनका लक्ष्य है कि भारतीय रक्षा कंपनियां घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ वैश्विक बाजार में भी अपनी जगह मजबूत करें।
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में DPSU का कुल टर्नओवर ₹1.29 लाख करोड़ रहा, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 15.4 फीसदी अधिक था। इसी अवधि में DPSU के रक्षा निर्यात में 151.2 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।
राजनाथ सिंह ने इसी गति को आगे बढ़ाते हुए कंपनियों से नए वैश्विक बाजार तलाशने और अंतरराष्ट्रीय स्तर की गुणवत्ता हासिल करने को कहा।
2025-26 में भारत का रक्षा उत्पादन ₹1.8 लाख करोड़
बैठक में रक्षा मंत्री ने भारत के बढ़ते रक्षा उत्पादन को भी रेखांकित किया। वित्त वर्ष 2025-26 में देश का कुल रक्षा उत्पादन करीब ₹1.8 लाख करोड़ रहा, जिसमें DPSU का योगदान करीब ₹1.29 लाख करोड़ था।
सरकार इसे आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि मान रही है।
स्टार्टअप और MSME को साथ लेकर चलने का निर्देश
रक्षा मंत्री ने DPSU से कहा कि उन्हें देश के स्टार्टअप और MSME सेक्टर के साथ भी ज्यादा सक्रिय तरीके से काम करना चाहिए।
रक्षा क्षेत्र में कई नई कंपनियां ड्रोन, सेंसर, AI, रोबोटिक्स, साइबर सिक्योरिटी और दूसरे उभरते क्षेत्रों में काम कर रही हैं। DPSU के बड़े उत्पादन नेटवर्क और इनोवेशन क्षमता को इन छोटी कंपनियों के साथ जोड़ने से नई तकनीकों को तेजी से विकसित और सैन्य इस्तेमाल के लिए तैयार करने में मदद मिल सकती है।
वैश्विक स्तर की गुणवत्ता पर फोकस
राजनाथ सिंह ने DPSU को अपने उत्पादों की गुणवत्ता को वैश्विक मानकों के बराबर लाने का निर्देश दिया।
उन्होंने समय पर डिलीवरी और उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दिया। रक्षा क्षेत्र में किसी उपकरण या प्लेटफॉर्म की समय पर उपलब्धता सीधे ऑपरेशनल तैयारियों से जुड़ी होती है। इसलिए सरकार अब सिर्फ उत्पादन बढ़ाने के बजाय समयबद्ध डिलीवरी और गुणवत्ता दोनों को समान महत्व दे रही है।
कैपेक्स बढ़ाकर उत्पादन क्षमता मजबूत करने की तैयारी
DPSU को अपने कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) का विस्तार करने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है।
इसका उद्देश्य बढ़ती घरेलू रक्षा मांग के साथ-साथ भविष्य के निर्यात ऑर्डर को पूरा करने के लिए पर्याप्त उत्पादन क्षमता तैयार करना है। वैश्विक संघर्षों से मिली सीख के बीच मजबूत सप्लाई चेन और जरूरत पड़ने पर उत्पादन तेजी से बढ़ाने की क्षमता को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
'Make in India' से 'Make for the World' तक
राजनाथ सिंह ने DPSU को केवल घरेलू बाजार तक सीमित रहने के बजाय वैश्विक कंपनियों के स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने का लक्ष्य दिया है।
उनका संदेश साफ है कि भारत को रक्षा उपकरणों के मामले में सिर्फ आत्मनिर्भर नहीं बनना है, बल्कि भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी भरोसेमंद रक्षा आपूर्तिकर्ता के रूप में स्थापित करना है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह लक्ष्य 'Make in India, Make for the World' की दिशा में DPSU के बदलाव से जुड़ा है।
राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़ा है DPSU का प्रदर्शन
रक्षा मंत्री ने DPSU के प्रदर्शन को राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से देखने की जरूरत बताई है। किसी संकट या युद्ध जैसी स्थिति में हथियारों, स्पेयर पार्ट्स और सैन्य उपकरणों की घरेलू उपलब्धता महत्वपूर्ण होती है।
इसी वजह से सरकार अब रक्षा उत्पादन, R&D, सप्लाई चेन और तकनीकी क्षमता को एक साथ मजबूत करने पर जोर दे रही है। मार्च 2026 में भी राजनाथ सिंह ने बदलते वैश्विक संघर्षों से मिली ऑपरेशनल और तकनीकी सीख को भारत की रक्षा तैयारियों में शामिल करने और आत्मनिर्भरता के साथ ऑपरेशनल रेडीनेस बनाए रखने पर जोर दिया था।
आगे क्या होगा?
अब 16 DPSU को अपने-अपने क्षेत्र के हिसाब से अगले पांच वर्षों की योजनाएं तैयार करनी होंगी। इसमें उत्पादन क्षमता, स्वदेशीकरण, R&D, नई तकनीक, निर्यात, गुणवत्ता, Capex और निजी क्षेत्र व MSME के साथ सहयोग जैसे पहलुओं को शामिल किया जाएगा।
सरकार की कोशिश साफ है—भारत की रक्षा कंपनियां केवल देश की जरूरतें पूरी करने वाली इकाइयां न रहें, बल्कि भविष्य की तकनीक विकसित करने और वैश्विक रक्षा बाजार में मुकाबला करने वाली कंपनियां बनें। राजनाथ सिंह का पांच साल का रोडमैप इसी बड़े लक्ष्य की दिशा में अगला कदम माना जा रहा है।
