300 की रिश्वत का मामला: पटवारी को तीन दशक बाद मिला न्याय; एमपी हाई कोर्ट ने खारिज की सरकार की अपील
मध्य प्रदेश के सागर जिले के तत्कालीन पटवारी मुन्ना लाल से जुड़े 300 रुपये के कथित रिश्वत मामले में करीब तीन दशक बाद कानूनी विवाद खत्म हुआ। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकार की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के दोषमुक्ति के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि केवल रकम की बरामदगी और फिनाल्फ्थेलीन परीक्षण से रिश्वत की मांग और अवैध स्वीकारोक्ति साबित नहीं होती।
लेखक
Vinay Mishra
1996 के रिश्वत मामले में पटवारी को हाई कोर्ट से राहत
जबलपुर: मध्य प्रदेश के सागर जिले में करीब 30 साल पुराने 300 रुपये की कथित रिश्वत के मामले में तत्कालीन पटवारी मुन्ना लाल को हाई कोर्ट से राहत मिली है। न्यायमूर्ति संजय एस. कलगांवकर की एकलपीठ ने मध्य प्रदेश सरकार की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें मुन्ना लाल को दोषमुक्त किया गया था। हाई कोर्ट ने 19 सितंबर 2026 को अपना फैसला सुनाया।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 1996 का है। अभियोजन के अनुसार, सागर जिले के खुरई क्षेत्र में पदस्थ पटवारी मुन्ना लाल ने वीर सिंह से डुप्लीकेट भू-अधिकार एवं ऋण पुस्तिका जारी करने के बदले रिश्वत की मांग की थी। आरोप था कि 450 रुपये की मांग की गई और शिकायतकर्ता ने पहले 150 रुपये दिए, जबकि बाकी 300 रुपये बाद में देने की बात हुई।
इसके बाद शिकायत लोकायुक्त के पास पहुंची और 17 अक्टूबर 1996 को ट्रैप कार्रवाई की गई। शिकायतकर्ता ने 100-100 रुपये के तीन चिह्नित नोट पटवारी को दिए। ये नोट बाद में मुन्ना लाल की शर्ट की जेब से बरामद किए गए। उनके हाथ और शर्ट की जेब पर फिनाल्फ्थेलीन के निशान भी पाए गए थे।
1997 में ट्रायल कोर्ट ने किया था दोषमुक्त
मामले की सुनवाई के बाद सागर की विशेष अदालत ने 19 दिसंबर 1997 को मुन्ना लाल को आरोपों से दोषमुक्त कर दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने वर्ष 1998 में हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। करीब तीन दशक तक लंबित रहने के बाद हाई कोर्ट ने अब इस अपील पर फैसला सुनाया।
325 रुपये की सरकारी बकाया राशि भी थी
हाई कोर्ट ने मामले के साक्ष्यों पर विचार करते हुए पाया कि राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार शिकायतकर्ता वीर सिंह पर 325 रुपये और ब्याज की सरकारी बकाया राशि थी। बचाव पक्ष का कहना था कि शिकायतकर्ता द्वारा दी गई रकम रिश्वत नहीं, बल्कि इसी सरकारी बकाया की अदायगी के लिए थी। अदालत ने माना कि उपलब्ध साक्ष्यों से इस संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
रिश्वत की मांग साबित करने वाले साक्ष्यों पर सवाल
अदालत ने यह भी पाया कि कथित रिश्वत मांग से संबंधित मूल रिकॉर्डिंग ट्रायल कोर्ट में सत्यापित नहीं हुई थी। आरोपी की आवाज की पहचान नहीं कराई गई और रिकॉर्डिंग की पूर्णता एवं शुद्धता को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य भी सामने नहीं रखे गए। इसके अलावा शिकायतकर्ता के बयानों में रिश्वत की रकम और कथित मांग के समय तथा मौजूद लोगों को लेकर असंगतियां थीं।
सिर्फ रकम बरामद होने से रिश्वत साबित नहीं
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल कथित रिश्वत की रकम की बरामदगी और फिनाल्फ्थेलीन परीक्षण से रिश्वत मांगने और अवैध रूप से रकम स्वीकार करने का अपराध अपने आप साबित नहीं होता। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष को साक्ष्यों पर आधारित और उचित माना तथा उसमें हस्तक्षेप का आधार नहीं पाया। इसके साथ ही सरकार की अपील खारिज कर दी गई।
इस फैसले के साथ 1996 में शुरू हुआ यह कानूनी विवाद करीब 30 साल बाद समाप्त हुआ और तत्कालीन पटवारी मुन्ना लाल की दोषमुक्ति बरकरार रही।
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