'आपराधिक मामलों में निजी विचार थोपने से बचें अदालतें', मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
Summary: सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के एक जमानत आदेश को रद्द करते हुए कहा कि जमानत याचिकाओं या आपराधिक मुकदमों की सुनवाई के दौरान अदालतों को न्यायाधीश की निजी नैतिक धारणाओं या मूल्य-आधारित विचारों को निर्णय पर हावी नहीं होने देना चाहिए। शीर्ष अदालत ने एक साल से अधिक समय से जेल में बंद आरोपी को जमानत भी दे दी।
लेखक
Vinay Mishra
जमानत के मामले में निजी नैतिक धारणाओं पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों में न्यायिक प्रक्रिया के दौरान न्यायाधीशों की निजी नैतिक धारणाओं और मूल्य-आधारित निष्कर्षों को आधार बनाने को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के एक आदेश को रद्द करते हुए कहा कि जमानत याचिका या आपराधिक मुकदमे की सुनवाई करते समय अदालतों को अपनी निजी नैतिक राय थोपने से बचना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी कान्हा उर्फ कन्हैया सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में की। शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी को जमानत देने से इनकार किया गया था।
किस मामले में आया फैसला?
यह मामला मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में दर्ज एक आपराधिक मामले से जुड़ा है। आरोपी पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), पॉक्सो एक्ट और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। आरोपों में नाबालिग के यौन शोषण सहित अन्य गंभीर आरोप शामिल थे। आरोपी ने आरोपों से इनकार किया था।
आरोपी सितंबर 2025 से हिरासत में था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने 23 सितंबर 2026 के आदेश में इस तथ्य पर भी गौर किया कि वह एक साल से अधिक समय जेल में रह चुका है और मुकदमे की सुनवाई पूरी होने में अभी समय लग सकता है।
हाई कोर्ट ने जमानत क्यों खारिज की थी?
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए इस बात का उल्लेख किया था कि उसकी रिहाई से सामाजिक व्यवस्था और पीड़िता के परिवार की नैतिकता पर असर पड़ सकता है। इसी आधार पर जमानत नहीं देने के फैसले को आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस तर्क से असहमति जताई और कहा कि जमानत या आपराधिक मुकदमे से जुड़े निर्णयों में पीठासीन न्यायाधीश की निजी नैतिक राय या मूल्य-निर्णय को आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जमानत पर फैसला करते समय या किसी आरोपी के आपराधिक मुकदमे की सुनवाई के दौरान अदालतों को नैतिकता संबंधी अपनी निजी राय या मूल्य-आधारित निष्कर्ष थोपने से बचना चाहिए।
पीठ ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए यह भी कहा कि आरोपी एक वर्ष से अधिक समय से जेल में है और मुकदमे को पूरा होने में अभी कुछ और समय लग सकता है। इन परिस्थितियों में अदालत ने जमानत दिए जाने का आधार पाया।
हाई कोर्ट का आदेश रद्द, आरोपी को जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के 20 मार्च 2026 के आदेश को रद्द कर दिया और आरोपी को नियमित जमानत देने का निर्देश दिया। हालांकि, आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया कि जमानत अन्य लंबित हिरासत संबंधी स्थिति और संबंधित न्यायिक शर्तों के अधीन रहेगी।
यह फैसला आपराधिक मामलों में जमानत पर विचार करते समय कानूनी आधार और मामले के प्रासंगिक तथ्यों पर ध्यान केंद्रित करने से जुड़ी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के कारण महत्वपूर्ण है।
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