बिहार के इस सुपरफूड के मुरीद हुए विदेशी! अमेरिका से लेकर जर्मनी तक बढ़ रही डिमांड, 12,000 करोड़ के पार पहुंच सकता है कारोबार
बिहार का पारंपरिक मखाना (Fox Nuts) अब सिर्फ व्रत और स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं रहा। अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, यूएई और ब्रिटेन जैसे देशों में इसकी मांग बढ़ रही है। भारत का मखाना बाजार 2029-30 तक ₹11,000-12,000 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। बिहार 2025-26 में करीब 60,000 मीट्रिक टन उत्पादन के साथ देश का सबसे बड़ा मखाना उत्पादक राज्य है।
लेखक
Vinay Mishra
Bihar Makhana: बिहार का मखाना बना ग्लोबल सुपरफूड, अमेरिका से जर्मनी तक बढ़ी डिमांड; 12 हजार करोड़ की ओर बाजार
नई दिल्ली/पटना: कभी बिहार के तालाबों और खेतों तक सीमित रहने वाला मखाना अब ग्लोबल सुपरफूड बनता जा रहा है। हेल्थ-कॉन्शियस लोगों के बीच इसकी बढ़ती लोकप्रियता ने अमेरिका से लेकर जर्मनी तक इसके लिए बाजार तैयार कर दिया है। कम फैट, ग्लूटेन-फ्री और प्लांट-बेस्ड स्नैक के तौर पर इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
मखाने की बढ़ती लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भारत का घरेलू मखाना बाजार 2029-30 तक ₹11,000-12,000 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। हालांकि यह आंकड़ा मौजूदा कारोबार का नहीं, बल्कि अगले कुछ वर्षों के बाजार आकार का अनुमान है।
बिहार है मखाने का सबसे बड़ा गढ़
मखाना उत्पादन में बिहार की भूमिका सबसे अहम है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 में बिहार में करीब 60,000 मीट्रिक टन मखाने का उत्पादन होने का अनुमान है। राज्य में इसकी औसत उत्पादकता करीब 2 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर रही।
कटिहार, पूर्णिया, मधुबनी, दरभंगा, सहरसा, सुपौल, अररिया और मधेपुरा जैसे जिले मखाना उत्पादन के प्रमुख केंद्र हैं। दरभंगा में ICAR-National Research Centre on Makhana भी मौजूद है, जहां उत्पादन, प्रसंस्करण और वैल्यू एडिशन से जुड़ी तकनीकों पर काम किया जा रहा है।
अमेरिका सबसे बड़ा विदेशी बाजार
भारत से मखाना निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी सबसे बड़ी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2025-26 में भारत ने करीब 7,264.89 मीट्रिक टन मखाना उत्पाद का निर्यात किया, जिसकी कीमत करीब ₹192.96 करोड़ थी।
निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 40 फीसदी, कनाडा की 20 फीसदी और यूएई की 17 फीसदी बताई गई है। वहीं जर्मनी जैसे बाजारों में मात्रा कम होने के बावजूद मखाने को अपेक्षाकृत ज्यादा कीमत मिल रही है।
यानी अमेरिका जहां बड़ा बाजार है, वहीं जर्मनी जैसे यूरोपीय बाजार प्रीमियम मखाने के लिए संभावनाएं दिखा रहे हैं।
जर्मनी में मिल रही है ज्यादा कीमत
मखाने के अंतरराष्ट्रीय बाजार में सिर्फ मात्रा ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उसकी क्वालिटी और ग्रेड भी कीमत तय करते हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक जर्मनी में भारतीय मखाने की औसत कीमत करीब $26 प्रति किलो तक रही, जबकि अमेरिका में यह करीब $13.3 और यूएई में करीब $19.5 प्रति किलो बताई गई। इससे पता चलता है कि यूरोप के कुछ बाजारों में प्रीमियम क्वालिटी के मखाने की अच्छी कीमत मिल सकती है।
कनाडा भेजा गया पहली बार समुद्री रास्ते से फ्लेवर्ड मखाना
बिहार के मखाने की ग्लोबल कहानी में हाल ही में एक और बड़ी उपलब्धि जुड़ी। जुलाई 2026 में दरभंगा से कनाडा के लिए पहली बार समुद्री रास्ते से फ्लेवर्ड मखाने की खेप भेजी गई।
कुल 7 मीट्रिक टन मखाना दो कंटेनरों में पैक कर मुंद्रा पोर्ट के रास्ते कनाडा भेजा गया। खास बात यह थी कि यह केवल कच्चा मखाना नहीं था, बल्कि वैल्यू-एडेड फ्लेवर्ड मखाना था।
इस तरह की प्रोसेसिंग से किसानों और स्थानीय कारोबारियों को कच्चे उत्पाद की तुलना में बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ती है।
मखाना सिर्फ व्रत का खाना नहीं रहा
मखाने की अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता की एक बड़ी वजह बदलती खान-पान की आदतें हैं।
आज दुनिया भर में लोग ऐसे स्नैक्स की तलाश में हैं जो स्वादिष्ट होने के साथ-साथ अपेक्षाकृत हल्के और पौष्टिक हों। मखाना इसी ट्रेंड में फिट बैठता है। इसे roasted snack, flavoured snack, trail mix और flour जैसे अलग-अलग रूपों में इस्तेमाल किया जा रहा है।
इसी वजह से मखाना अब भारतीय किराना स्टोर से निकलकर ग्लोबल हेल्थ-फूड और स्नैकिंग कैटेगरी में जगह बना रहा है।
बाजार 12 हजार करोड़ का कैसे होगा?
मखाने के कारोबार में तेजी सिर्फ निर्यात की वजह से नहीं आ रही। घरेलू बाजार भी तेजी से बढ़ रहा है।
आधिकारिक तथ्यों के मुताबिक 2021-22 से 2024-25 के बीच घरेलू मखाना बाजार में करीब 17-18 फीसदी सालाना वृद्धि हुई। इसी दौरान औसत कीमत करीब ₹500 प्रति किलो से बढ़कर 2025 में लगभग ₹1,250 प्रति किलो हो गई।
इसी बढ़ती मांग, प्रीमियम ब्रांडिंग, कीमतों में वृद्धि और उत्पादन में सुधार के आधार पर बाजार के 2029-30 तक ₹11,000-12,000 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है।
सरकार ने बनाया National Makhana Board
मखाने की बढ़ती आर्थिक क्षमता को देखते हुए सरकार ने National Makhana Board का गठन किया है। इसका उद्देश्य उत्पादन, प्रोसेसिंग, वैल्यू एडिशन, मार्केटिंग और निर्यात को बढ़ावा देना है।
इसके अलावा मखाना सेक्टर के विकास के लिए ₹476.03 करोड़ की केंद्रीय योजना को मंजूरी दी गई है। इसमें किसानों को उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने, पोस्ट-हार्वेस्ट मैनेजमेंट, प्रोसेसिंग, रिसर्च, ब्रांडिंग और एक्सपोर्ट प्रमोशन में सहायता देने का प्रावधान है।
खेती के तरीके भी बदल रहे हैं
परंपरागत तौर पर मखाने की खेती तालाबों में होती थी, लेकिन अब field-system farming जैसी तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। साथ ही स्वर्ण वैदेही और सबौर मखाना-1 जैसी उन्नत किस्मों के जरिए उत्पादकता बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
इस बदलाव से खेती का क्षेत्र बढ़ाने, जोखिम कम करने और किसानों की आय में सुधार की संभावना बनी है।
चुनौती भी कम नहीं
मखाने की कहानी पूरी तरह चमकदार नहीं है। उत्पादन में तेजी के बावजूद खेती का क्षेत्र कई वर्षों से सीमित रहा है और कीमतों में वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा volume growth के बजाय price growth से आया है।
वैश्विक बाजार में गुणवत्ता, खाद्य सुरक्षा मानकों, पैकेजिंग, प्रमाणन और लॉजिस्टिक्स की जरूरतें भी भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ी चुनौती हैं।
इसके अलावा अमेरिका जैसे प्रमुख बाजार में टैरिफ और व्यापारिक नीतियों में बदलाव का असर भी निर्यात पर पड़ सकता है।
तालाब से ग्लोबल सुपरफूड तक का सफर
बिहार का मखाना अब सिर्फ एक पारंपरिक फसल नहीं रह गया है। 60 हजार मीट्रिक टन के करीब राज्य उत्पादन, तेजी से बढ़ता घरेलू बाजार, अमेरिका-कनाडा जैसे देशों में मांग और वैल्यू-एडेड उत्पादों का विस्तार इसे बिहार की सबसे संभावनाशील कृषि-आधारित इंडस्ट्री में बदल रहा है।
12 हजार करोड़ रुपये का आंकड़ा फिलहाल भविष्य का अनुमान है, लेकिन मौजूदा रफ्तार बताती है कि बिहार का मखाना आने वाले वर्षों में भारत के प्रमुख एग्री-एक्सपोर्ट ब्रांडों में शामिल हो सकता है।
Keep reading
More in व्यापार और अर्थव्यवस्था
व्यापार और अर्थव्यवस्था
देश के 5 बड़े मसाला बाजार, सिर्फ ₹70,000 से शुरू करें अपना मसाला ब्रांड; ये रजिस्ट्रेशन और बिजनेस प्लान आएगा काम
भारत में अपना छोटा मसाला ब्रांड शुरू करने के लिए शुरुआत में बहुत बड़ा प्लांट लगाना जरूरी नहीं है। खारी बावली, गोंटूर, उंझा, ईरोड और सांगली ज…
व्यापार और अर्थव्यवस्था
1500 एकड़ में खेती, 10 साल पुलिस की नौकरी; किसान से Berkshire Hathaway के चेयरमैन बनने वाले हॉवर्ड बफे की अनोखी कहानी
वॉरेन बफे के बेटे हॉवर्ड ग्राहम बफे ने पारंपरिक कॉरपोरेट करियर के बजाय खेती, कानून-प्रवर्तन, फोटोग्राफी और परोपकार के अलग-अलग क्षेत्रों में…
व्यापार और अर्थव्यवस्था
मुकेश अंबानी बंगाल में कर सकते हैं बड़ा प्रोजेक्ट शुरू, सीएम शुभेंदु से मुलाकात; क्या बना प्लान?
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने मुंबई में रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी से मुलाकात की। बैठक में पश्चिम बंगाल में…
व्यापार और अर्थव्यवस्था
उत्तर मध्य रेलवे ने लॉन्च किया 'टोटल' पोर्टल, 67 हजार से अधिक रेल कर्मचारियों को मिलेगा डिजिटल क्लेम का लाभ
उत्तर मध्य रेलवे ने अपने कर्मचारियों के लिए 'टोटल' (TOTAL) पोर्टल लॉन्च किया है। इस डिजिटल पहल का उद्देश्य रेल कर्मचारियों से जुड़े विभिन्न…
व्यापार और अर्थव्यवस्था
चंद्रशेखरन के Tata Sons के दोबारा चेयरमैन बनने का नोएल ने क्यों किया विरोध? पढ़ें पूरी इनसाइड स्टोरी
Tata Sons के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन को बोर्ड ने एक और पांच साल के कार्यकाल के लिए फिर नियुक्त कर दिया है, लेकिन Tata Trusts के चेयरमैन नोएल…
व्यापार और अर्थव्यवस्था
देशभर में 28 सितंबर से तीन दिन बैंकों की हड़ताल, 26 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन आंदोलन की तैयारी
देशभर में बैंक कर्मचारियों और अधिकारियों के यूनियन संगठन यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) ने सितंबर और अक्टूबर में चरणबद्ध आंदोलन का ऐला…
