हिमालयी आपदा: निगरानी तंत्र का सवाल, भारत के लिए बड़ी चेतावनी
नेपाल-तिब्बत सीमा पर 26 अगस्त को ग्लेशियर टूटने के बाद आई विनाशकारी बाढ़ ने पूरे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर, ग्लेशियल झीलों और भूस्खलन की निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत ने भी नेपाल की आपदा के बाद हिमालयी क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने के कदम उठाए हैं। देश में करीब 200 उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है, जबकि 100 प्रमुख झीलों की निगरानी और जोखिम वाले क्षेत्रों की मैपिंग पर भी काम चल रहा है।
लेखक
Vinay Mishra
नई दिल्ली: नेपाल में 26 अगस्त को ग्लेशियर के टूटने के बाद आई भीषण बाढ़ ने सिर्फ एक देश को नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र को चेतावनी दी है। इस आपदा ने यह सवाल फिर सामने ला दिया है कि तेजी से बदलते हिमालय में ग्लेशियरों, ग्लेशियल झीलों और संभावित बाढ़ के खतरे की निगरानी के लिए मौजूदा तंत्र कितना मजबूत है।
नेपाल-तिब्बत सीमा के पास हुई इस घटना में ग्लेशियर, बर्फ और चट्टानों के बड़े हिस्से के नदी तंत्र में गिरने के बाद अचानक बाढ़ आई। देखते ही देखते नदी का बहाव मलबे के साथ नीचे की ओर बढ़ा और कई इलाकों में भारी तबाही हुई।
इस घटना के बाद नेपाल ने चीन के साथ रियल-टाइम डेटा साझा करने और अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय जैसे दुर्गम और तेजी से बदलते इलाके में आपदा के बाद राहत पहुंचाने से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है—आपदा से पहले खतरे का पता लगाना।
भारत के लिए क्यों बड़ी चेतावनी?
नेपाल की आपदा भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हिमालय का बड़ा हिस्सा भारत की उत्तरी सीमा में फैला हुआ है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख जैसे क्षेत्र ग्लेशियरों, ऊंचाई वाली झीलों और तेज बहाव वाली नदियों के कारण संवेदनशील हैं।
भारत सरकार पहले से ही ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की निगरानी के लिए वैज्ञानिक और तकनीकी परियोजनाएं चला रही है। लेकिन नेपाल की ताजा घटना ने इन प्रयासों को और तेज करने की जरूरत पैदा कर दी है।
200 ग्लेशियल झीलें हाई रिस्क कैटेगरी में
ताजा रिपोर्टों के मुताबिक भारत में करीब 200 ग्लेशियल झीलों को उच्च जोखिम वाली झीलों के तौर पर चिन्हित किया गया है। इन झीलों से संभावित Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF का खतरा है। इसके लिए गठित विशेषज्ञ पैनल जोखिम कम करने और सुरक्षा उपायों पर काम कर रहा है।
वहीं, करीब 100 प्रमुख ग्लेशियल झीलों की निगरानी पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। हिमाचल प्रदेश में 34 झीलों में जलस्तर बढ़ने की जानकारी सामने आई है और संभावित बाढ़ के रास्तों यानी कैचमेंट एरिया की मैपिंग की जा रही है।
ग्लेशियल झील फटी तो क्या होगा?
ग्लेशियल झीलें आम झीलों की तरह स्थिर जलाशय नहीं होतीं। इनके आसपास बर्फ, मलबे और चट्टानों से बनी प्राकृतिक दीवारें होती हैं। यदि यह बांध कमजोर हो जाए या अचानक टूट जाए तो झील का भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर तेजी से बह सकता है।
इसी घटना को Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) कहा जाता है। ऐसी बाढ़ अपने रास्ते में आने वाले पुल, सड़क, बिजली परियोजना, गांव और अन्य बुनियादी ढांचे को बेहद कम समय में नुकसान पहुंचा सकती है।
सबसे बड़ी चुनौती है 'समय'
हिमालय में आपदा निगरानी की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ यह पता लगाना नहीं है कि कोई झील या ग्लेशियर जोखिम में है। असली चुनौती यह है कि खतरा पैदा होने और बाढ़ नीचे पहुंचने के बीच मिलने वाले बेहद कम समय में चेतावनी कैसे दी जाए।
इसी वजह से वैज्ञानिकों का जोर सैटेलाइट डेटा, सेंसर, मौसम संबंधी जानकारी, नदी के जलस्तर और रियल-टाइम मॉनिटरिंग को एक साथ जोड़ने पर है। भारत में सैटेलाइट आधारित हिमालयी ग्लेशियल कैचमेंट मॉनिटरिंग को अर्ली फ्लड वार्निंग के लिए उपयोगी माना गया है।
भारत के पास अर्ली वार्निंग सिस्टम, लेकिन नेटवर्क और मजबूत करने की जरूरत
भारत में बाढ़ और फ्लैश फ्लड की निगरानी के लिए कई संस्थाएं और प्रणालियां काम कर रही हैं। South Asia Flash Flood Guidance System संभावित फ्लैश फ्लड को लेकर 6 से 24 घंटे पहले तक चेतावनी देने में सक्षम है।
लेकिन हिमालयी आपदाएं सिर्फ सामान्य बारिश से पैदा होने वाली बाढ़ नहीं हैं। ग्लेशियर टूटना, ग्लेशियल झील का फटना, भूस्खलन, बर्फ और चट्टानों का अचानक गिरना—ये सभी घटनाएं एक-दूसरे को ट्रिगर कर सकती हैं।
नेपाल की हालिया त्रासदी ने इसी cascading disaster यानी एक खतरे से दूसरे खतरे के पैदा होने वाली स्थिति की गंभीरता दिखा दी है।
सिर्फ सैटेलाइट से नहीं चलेगा काम
हिमालय की भौगोलिक परिस्थितियां बेहद कठिन हैं। कई संवेदनशील ग्लेशियर और झीलें ऐसे इलाकों में हैं जहां जमीन पर जाकर लगातार निगरानी करना मुश्किल है।
इसलिए विशेषज्ञों के मुताबिक भारत को सैटेलाइट, ड्रोन, स्वचालित सेंसर, नदी जलस्तर स्टेशन और स्थानीय समुदायों को जोड़कर एक बहुस्तरीय निगरानी नेटवर्क तैयार करना होगा।
स्थानीय लोगों की भूमिका भी अहम है। किसी झील के जलस्तर में अचानक बदलाव, नदी के रंग या बहाव में असामान्य परिवर्तन अथवा पहाड़ से असामान्य आवाजें—ये शुरुआती संकेत हो सकते हैं। समय रहते इन संकेतों को प्रशासन तक पहुंचाने की व्यवस्था जान बचा सकती है।
सीमा पार डेटा साझा करना भी जरूरी
हिमालय किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं है। ग्लेशियर एक देश में हो सकता है, लेकिन उससे निकलने वाला पानी दूसरे देश में तबाही मचा सकता है।
नेपाल की हालिया आपदा ने भारत-नेपाल-चीन के बीच जल, ग्लेशियर और मौसम संबंधी डेटा साझा करने की जरूरत को भी उजागर किया है। नेपाल पहले ही चीन से अधिक रियल-टाइम जानकारी की मांग कर चुका है। दूसरी ओर भारत के साथ उसका डेटा-साझाकरण सहयोग पहले से मौजूद है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चिंता
हिमालय में बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों के पीछे हटने से जोखिम और जटिल हो रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बदलती जलवायु ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फ और ग्लेशियर की स्थिरता को प्रभावित कर रही है।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर ग्लेशियर के टूटने या हर ग्लेशियल झील के बढ़ने से आपदा निश्चित है। लेकिन जोखिम का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, इसलिए पुराने खतरा-आकलन और निगरानी व्यवस्था को लगातार अपडेट करना जरूरी है।
भारत के लिए अब अगला कदम क्या?
नेपाल की त्रासदी के बाद भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि अगली आपदा कब आएगी। सवाल यह होना चाहिए कि जब अगला खतरा पैदा हो, तब भारत के पास उसे पहले पहचानने और लोगों तक चेतावनी पहुंचाने के लिए कितना समय होगा।
हिमालय में करीब 200 उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों की पहचान अपने आप में पर्याप्त नहीं है। जरूरत है कि प्रत्येक संवेदनशील क्षेत्र के लिए रियल-टाइम निगरानी, खतरे की मैपिंग, निकासी योजना और स्थानीय स्तर पर मॉक ड्रिल को मजबूत किया जाए।
नेपाल की आपदा ने साफ कर दिया है कि हिमालय अब केवल भौगोलिक सीमा या प्राकृतिक संपदा नहीं रहा। यह एक ऐसा संवेदनशील क्षेत्र है जहां जलवायु, भूगोल, बुनियादी ढांचा और राष्ट्रीय सुरक्षा एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
भारत के लिए यह समय सिर्फ निगरानी बढ़ाने का नहीं, बल्कि 'आपदा आने के बाद प्रतिक्रिया' से 'आपदा आने से पहले तैयारी' की ओर निर्णायक बदलाव करने का है।
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