भारत में बदल रहा क्लाइमेट पैटर्न... अधिक उग्र होगा मानसून, बारिश कम दिनों में लेकिन होगी बहुत जोरदार
भारत में मानसून का मिजाज बदल रहा है। नई रिसर्च के मुताबिक आने वाले समय में बारिश के दिनों की संख्या में बहुत बड़ी बढ़ोतरी नहीं होगी, लेकिन कुल बारिश का बड़ा हिस्सा कम दिनों में होने वाली बेहद तेज बारिश के रूप में आ सकता है। इससे फ्लैश फ्लड, शहरी जलभराव, भूस्खलन और खेती से जुड़ी चुनौतियां बढ़ सकती हैं। IIT रुड़की के अध्ययन ने भी भारत में भविष्य के मानसून के अधिक चरम होने की आशंका जताई है।
लेखक
Vinay Mishra
नई दिल्ली: भारत में मानसून का पारंपरिक पैटर्न धीरे-धीरे बदलता दिखाई दे रहा है। अब चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि किसी साल कितनी बारिश होगी, बल्कि यह भी है कि बारिश कब, कितने समय में और कितनी तीव्रता से होगी।
हालिया शोधों के मुताबिक भारत में भविष्य का मानसून अधिक अनियमित और चरम हो सकता है। बारिश के दिनों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़े बिना ही कुछ चुनिंदा दिनों में बेहद भारी बारिश होने की संभावना बढ़ रही है। इसका सीधा असर बाढ़, शहरी जलभराव, खेती और जल प्रबंधन पर पड़ सकता है।
कम बारिश वाले दिन, लेकिन अचानक तेज बरसात
IIT रुड़की के शोधकर्ताओं के अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि भविष्य में भारत में मानसून की बारिश का बड़ा हिस्सा कम संख्या वाले लेकिन ज्यादा तीव्र बारिश के दौर में केंद्रित हो सकता है। यानी बारिश के बीच लंबे अंतराल हो सकते हैं और फिर कुछ घंटों में इतनी बारिश हो जाए कि सामान्य व्यवस्था पर दबाव बढ़ जाए।
यही बदलाव मौसम विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय है।
किसी इलाके में पूरे सीजन की बारिश सामान्य या कम रह सकती है, लेकिन कुछ घंटों या दिनों में हुई अत्यधिक बारिश बाढ़ की स्थिति पैदा कर सकती है। यानी 'कुल बारिश' का आंकड़ा हमेशा जमीन पर पैदा होने वाले खतरे की पूरी तस्वीर नहीं बताएगा।
जलवायु परिवर्तन से क्यों बदल रहा है मानसून?
ग्लोबल वार्मिंग के कारण वातावरण में अधिक नमी मौजूद रह सकती है। गर्म वातावरण अधिक जलवाष्प धारण कर सकता है और अनुकूल परिस्थितियों में यही अतिरिक्त नमी ज्यादा तीव्र वर्षा के रूप में नीचे आ सकती है।
भारत के मानसून पर समुद्र के तापमान, वायुमंडलीय परिसंचरण, भूमि और समुद्र के तापमान अंतर तथा क्षेत्रीय भौगोलिक परिस्थितियों का भी असर पड़ता है। शोधों में भविष्य में मानसूनी बारिश की तीव्रता बढ़ने का अनुमान लगाया गया है।
बारिश का 'चरम' बढ़ना क्यों खतरनाक?
समस्या सिर्फ भारी बारिश नहीं, बल्कि बहुत कम समय में बहुत ज्यादा बारिश है।
जब कुछ घंटों में अत्यधिक पानी गिरता है तो:
शहरों के ड्रेनेज सिस्टम पर अचानक दबाव पड़ता है।
सड़कें और अंडरपास तेजी से जलमग्न हो सकते हैं।
नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ सकता है।
पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन और फ्लैश फ्लड का खतरा बढ़ सकता है।
फसलों को जलभराव और मिट्टी के कटाव से नुकसान हो सकता है।
राहत और बचाव एजेंसियों को तैयारी के लिए कम समय मिलता है।
IIT रुड़की के अध्ययन ने भी खास तौर पर शहरी ड्रेनेज, नदियों के तेजी से बढ़ते जलस्तर और आपदा प्रबंधन के लिए कम तैयारी समय को प्रमुख जोखिमों में गिना है।
दूसरी तरफ बढ़ सकते हैं लंबे Dry Spells
मानसून के बदलते मिजाज का दूसरा पहलू सूखे का लंबा दौर भी हो सकता है।
भारत में किए गए अध्ययनों में मानसून के दौरान कई क्षेत्रों में लंबे dry spells यानी लगातार बारिश न होने वाले दिनों की समस्या सामने आई है। एक अध्ययन के मुताबिक 65% मौसम संबंधी उप-विभागों में मानसून के दौरान 60 से ज्यादा dry days देखे गए।
इसका मतलब यह है कि किसान को एक तरफ बारिश का इंतजार करना पड़ सकता है और दूसरी तरफ जब बारिश आए तो वह इतनी तेज हो सकती है कि खेतों में पानी भर जाए।
यानी समस्या 'बारिश कम या ज्यादा' से आगे बढ़कर 'बारिश का वितरण कैसा है' की हो गई है।
भारत के कई हिस्सों में दिख रहे संकेत
चरम बारिश की घटनाओं में बढ़ोतरी का संकेत अलग-अलग अध्ययनों में सामने आया है। एक समीक्षा के अनुसार पिछले दशकों में भारत में अत्यधिक मानसूनी बारिश की घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ी है।
ओडिशा पर 2026 में प्रकाशित एक अध्ययन ने भी लंबे समय में rainfall frequency में कमी और intensity में वृद्धि के रुझान की पहचान की है।
मध्य भारत में व्यापक स्तर पर होने वाली extreme rainfall घटनाओं में भी पिछले कई दशकों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
इसका खेती पर क्या असर होगा?
भारत की खेती मानसून पर काफी निर्भर है। इसलिए बारिश का समय और वितरण किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
अगर बारिश लंबे समय तक नहीं होती और फिर अचानक बहुत तेज बारिश होती है, तो दोनों स्थितियां फसल के लिए नुकसानदेह हो सकती हैं।
कम बारिश: मिट्टी में नमी की कमी और सिंचाई की जरूरत बढ़ सकती है।
अत्यधिक बारिश: खेतों में जलभराव, फसल गिरना, मिट्टी का कटाव और कीट-रोग का खतरा बढ़ सकता है।
इसलिए भविष्य की कृषि योजना में सिर्फ मौसमी बारिश का औसत नहीं, बल्कि rainfall intensity और dry spells को भी ध्यान में रखना होगा।
शहरों के लिए बड़ी चुनौती
भारत के तेजी से बढ़ते शहरों में यह बदलाव और गंभीर हो सकता है।
कई शहरों की जल निकासी व्यवस्था सामान्य या पुराने बारिश के पैटर्न को ध्यान में रखकर बनाई गई है। लेकिन अगर कम समय में रिकॉर्ड बारिश होने लगे, तो ड्रेनेज सिस्टम की क्षमता जल्दी खत्म हो सकती है।
नतीजा—कुछ घंटों की बारिश में सड़कें, बाजार, अंडरपास और रिहायशी इलाके जलमग्न।
यही वजह है कि विशेषज्ञ अब शहरी बुनियादी ढांचे को भविष्य की extreme rainfall घटनाओं के हिसाब से तैयार करने की जरूरत पर जोर देते हैं।
2026 का मानसून भी दे रहा है अलग संकेत
इस साल भारत के मानसून ने भी पूर्वानुमानों को चुनौती दी है। अगस्त 2026 में भारत की कुल मौसमी बारिश सामान्य से कम रही है और कमजोर मानसून की आशंका जताई गई है। वहीं, अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश का वितरण एक जैसा नहीं रहा।
यही असमानता बदलते मानसून की बड़ी चुनौती है—देश के औसत आंकड़े कुछ और बताते हैं, जबकि स्थानीय स्तर पर बाढ़ या सूखे की स्थिति बिल्कुल अलग हो सकती है।
क्या भविष्य का हर मानसून ऐसा ही होगा?
यह कहना सही नहीं होगा कि हर साल भारत में बारिश सिर्फ कुछ दिनों में ही होगी या हर जगह extreme rainfall बढ़ेगी।
मानसून बेहद जटिल प्रणाली है और इसके व्यवहार पर El Niño, समुद्र का तापमान, वायुमंडलीय परिसंचरण और जलवायु परिवर्तन समेत कई कारक असर डालते हैं।
लेकिन वैज्ञानिक शोधों का व्यापक संकेत यह है कि गर्म होती जलवायु में अत्यधिक बारिश की घटनाओं का जोखिम बढ़ रहा है, जबकि बारिश के वितरण में अनिश्चितता भी बढ़ सकती है।
बदलते मानसून का मतलब क्या?
पुराना नजरियाउभरता पैटर्नपूरे सीजन की कुल बारिशबारिश का समय और तीव्रता भी महत्वपूर्णलगातार बारिश से जलभरावकम समय में अत्यधिक बारिश से फ्लैश फ्लडबारिश का औसतExtreme rainfall और dry spellsसामान्य ड्रेनेज डिजाइनभारी बारिश के लिए climate-resilient infrastructureमौसमी पूर्वानुमानज्यादा स्थानीय और अल्पकालिक चेतावनी की जरूरत
पश्चिम बंगाल और उत्तर बंगाल के लिए भी क्यों अहम?
पश्चिम बंगाल में गंगा के मैदानी इलाके, तटीय क्षेत्र और उत्तर बंगाल की पहाड़ियां—तीनों की बारिश और बाढ़ की संवेदनशीलता अलग है।
खासकर उत्तर बंगाल और हिमालयी तलहटी में कम समय में भारी बारिश होने पर नदियों के जलस्तर में तेजी से बदलाव, जलभराव और भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए बदलते बारिश पैटर्न का असर सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर नहीं, बल्कि जिले और स्थानीय स्तर पर भी समझना जरूरी होगा।
IMD के हालिया पूर्वानुमानों में भी पूर्वोत्तर भारत और उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल-सिक्किम में भारी से बहुत भारी बारिश की संभावना बताई गई है।
निष्कर्ष
भारत का मानसून अब सिर्फ 'कितनी बारिश हुई' का सवाल नहीं रह गया है। असली चुनौती यह है कि बारिश कितने दिनों में और कितनी तीव्रता के साथ हो रही है।
वैज्ञानिक अध्ययनों से संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले समय में बारिश अधिक असमान हो सकती है—लंबे dry spells के बाद कम समय में बेहद भारी बारिश। इससे बाढ़ और सूखे का जोखिम एक साथ बढ़ सकता है।
ऐसे में भारत को जल निकासी, बांध और जलाशय प्रबंधन, खेती, शहरी नियोजन और आपदा प्रबंधन की रणनीति को बदलते मानसून के हिसाब से तैयार करना होगा।
भविष्य का सवाल शायद यह नहीं होगा कि मानसून आएगा या नहीं, बल्कि यह होगा कि जब बारिश आएगी तो वह कितनी तेज होगी।
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