1.3 अरब डॉलर की लागत, दावे हजार और नतीजा जीरो... नेपाल त्रासदी की चेतावनी क्यों नहीं दे पाया NISAR?
नेपाल-चीन सीमा पर 26 अगस्त को आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड और मलबे की बाढ़ ने सैटेलाइट आधारित आपदा चेतावनी प्रणालियों की क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसी बीच NASA-ISRO के संयुक्त NISAR मिशन को लेकर भी चर्चा शुरू हुई है। हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि NISAR ने चेतावनी देने में 'विफलता' दिखाई—क्योंकि यह मिशन मुख्य रूप से पृथ्वी की सतह में होने वाले बदलावों की निगरानी और वैज्ञानिक अध्ययन के लिए बनाया गया है, न कि हर अचानक ग्लेशियर ढहने की घटना की रियल-टाइम चेतावनी देने के लिए। विशेषज्ञों के मुताबिक नेपाल की घटना बेहद तेजी से हुई ग्लेशियर/चट्टान धंसने और मलबे के प्रवाह की जटिल श्रृंखला थी, जिसने मौजूदा अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम की सीमाएं उजागर कर दीं।
लेखक
Vinay Mishra
नई दिल्ली: नेपाल में 26 अगस्त को आई भयावह फ्लैश फ्लड ने हिमालयी आपदाओं की निगरानी और समय रहते चेतावनी देने की क्षमता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। लैंगटांग लिरुंग क्षेत्र में ग्लेशियर से जुड़ी तेज ढलान-विफलता के बाद बर्फ, चट्टान और मलबे का विशाल प्रवाह निचली घाटियों में पहुंचा और देखते ही देखते बस्तियों, सड़कों, पुलों तथा हाइड्रोपावर परियोजनाओं को अपनी चपेट में ले लिया।
इस बीच सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्टों में यह सवाल उठ रहा है कि करीब 1.3 अरब डॉलर के NASA-ISRO संयुक्त NISAR मिशन जैसी अत्याधुनिक सैटेलाइट तकनीक इस आपदा की पहले चेतावनी क्यों नहीं दे सकी।
लेकिन यहां एक अहम फर्क समझना जरूरी है—NISAR कोई रियल-टाइम 'फ्लैश फ्लड अलार्म' सिस्टम नहीं है। इसलिए इस घटना को सीधे NISAR की नाकामी कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा।
NISAR आखिर करता क्या है?
NISAR यानी NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar एक अत्याधुनिक पृथ्वी-अवलोकन मिशन है। इसमें L-बैंड और S-बैंड रडार तकनीक का इस्तेमाल होता है, जिससे पृथ्वी की सतह में होने वाले बेहद छोटे बदलावों को भी मापा जा सकता है।
इसका इस्तेमाल जमीन के खिसकने, भूकंपीय गतिविधियों, ग्लेशियरों, बर्फ, जंगलों, मिट्टी की नमी और दूसरी प्राकृतिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करने में किया जा सकता है।
इसकी खासियत यह है कि रडार सेंसर बादलों और रात के अंधेरे के बावजूद पृथ्वी की सतह की जानकारी हासिल कर सकता है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि NISAR हर संवेदनशील पहाड़ी ढलान को लगातार लाइव देख रहा है और कुछ मिनट पहले किसी संभावित ग्लेशियर टूटने का अलर्ट जारी कर सकता है।
नेपाल में हुआ क्या था?
26 अगस्त की सुबह नेपाल-चीन सीमा के पास अचानक बर्फ और चट्टानों के बड़े हिस्से के ढहने से भारी मलबा नीचे आया। वैज्ञानिकों और सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण से संकेत मिला है कि लैंगटांग लिरुंग क्षेत्र में ग्लेशियर से जुड़ी ढलान विफलता इस घटना की शुरुआत हो सकती है।
मलबे के इस विशाल प्रवाह ने नदी के रास्ते को प्रभावित किया और पानी, बर्फ, चट्टान तथा मिट्टी का बेहद शक्तिशाली मिश्रण नीचे की ओर बढ़ा।
विश्व मौसम संगठन (WMO) के प्रारंभिक आकलन के अनुसार बड़ी मात्रा में बर्फ और चट्टानी मलबा ल्हेंडे खोला में पहुंचा हो सकता है। मलबे ने नदी को कुछ समय के लिए रोककर अस्थायी बांध बनाया और उसके बाद अचानक पानी तथा मलबे की लहर नीचे की ओर गई हो सकती है।
यानी यह सिर्फ 'बारिश से आई बाढ़' नहीं थी, बल्कि ग्लेशियर, चट्टान, मलबा, नदी अवरोध और अचानक पानी के बहाव से बनी एक cascading disaster थी।
फिर NISAR पहले क्यों नहीं बता पाया?
यहीं इस पूरे विवाद की सबसे महत्वपूर्ण बात है।
किसी सैटेलाइट के पास किसी इलाके की तस्वीर होना और उसी इलाके में होने वाली घटना की मिनटों पहले भविष्यवाणी कर पाना, दो अलग-अलग चीजें हैं।
NISAR का रडार पृथ्वी की सतह में समय के साथ होने वाले बदलावों को पकड़ सकता है। लेकिन अगर कोई ग्लेशियर या चट्टानी ढलान अचानक टूटती है, तो घटना के लिए जरूरी समय-सीमा बहुत छोटी हो सकती है।
इसके अलावा किसी आपदा की भविष्यवाणी के लिए सिर्फ सैटेलाइट तस्वीर काफी नहीं होती। मौसम, बर्फ का तापमान, ढलान की स्थिरता, नदी का प्रवाह, ग्लेशियर की स्थिति, भूकंपीय संकेत और जमीन से मिलने वाले सेंसर डेटा को एक साथ जोड़ना पड़ता है।
सैटेलाइट ने घटना के बाद क्या बताया?
दिलचस्प बात यह है कि सैटेलाइट डेटा ने आपदा की प्रकृति समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) ने Sentinel-2 से पहले और बाद की तस्वीरों के जरिए प्रभावित क्षेत्र में हुए भारी बदलाव को दर्ज किया। तस्वीरों से पता चला कि ग्लेशियर से जुड़ी ढलान विफलता के बाद घाटी और नदी क्षेत्र में व्यापक मलबा फैल गया।
यानी सैटेलाइट तकनीक ने आपदा को रोकने के बजाय आपदा के बाद उसकी तस्वीर और पैमाना समझने में मदद की।
क्या NISAR भविष्य में ऐसी आपदाओं में मदद कर सकता है?
बिल्कुल।
यही इस मिशन की असली ताकत है। लगातार एकत्र किए गए रडार डेटा से वैज्ञानिक पहाड़ी ढलानों में धीरे-धीरे हो रहे बदलाव, जमीन के खिसकने और ग्लेशियरों की गतिविधियों की निगरानी कर सकते हैं।
अगर ऐसे डेटा को मौसम पूर्वानुमान, जमीन पर लगे सेंसर, नदी के जलस्तर और स्थानीय चेतावनी प्रणालियों के साथ जोड़ा जाए, तो भविष्य में जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान और निगरानी कहीं बेहतर हो सकती है।
लेकिन इसके लिए सिर्फ सैटेलाइट लॉन्च करना पर्याप्त नहीं है। सैटेलाइट डेटा को तेजी से प्रोसेस करना, विशेषज्ञों तक पहुंचाना और फिर उस जानकारी को स्थानीय प्रशासन तथा आम लोगों तक अलर्ट के रूप में पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है।
असली सवाल NISAR नहीं, 'अर्ली वॉर्निंग चेन' का है
नेपाल की त्रासदी ने एक बेहद अहम सवाल सामने रखा है—क्या हिमालय के लिए मौजूदा अर्ली वॉर्निंग सिस्टम पर्याप्त है?
WMO ने भी इस आपदा के बाद 'warning chain' में मौजूद कमियों को दूर करने पर जोर दिया है। उसके मुताबिक अलग-अलग स्रोतों से मिलने वाली जानकारी को जोड़कर समुदायों तक चेतावनी पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।
एक दिलचस्प उदाहरण खुद नेपाल से सामने आया। बिदुर के त्रिभुवन त्रिशूली सेकेंडरी स्कूल में एक स्थानीय कर्मचारी को रिश्तेदार से फोन पर बाढ़ की जानकारी मिली। स्कूल के प्रधानाचार्य ने महज 14 मिनट में 900 से अधिक छात्रों और 16 शिक्षकों को बाहर निकाल दिया। बाद में स्कूल की इमारत ही बाढ़ में बह गई।
इस घटना से साफ है कि कभी-कभी स्थानीय सूचना और तेज निर्णय किसी भी अत्याधुनिक तकनीक से ज्यादा तेजी से जिंदगी बचा सकते हैं।
1.3 अरब डॉलर की लागत का सवाल क्यों भ्रामक हो सकता है?
NISAR की लागत का आंकड़ा देखकर यह सवाल स्वाभाविक है कि इतनी महंगी तकनीक के बावजूद आपदा की भविष्यवाणी क्यों नहीं हुई।
लेकिन किसी वैज्ञानिक मिशन की सफलता को इस आधार पर मापना कि उसने हर आपदा की पहले चेतावनी दी या नहीं, सही पैमाना नहीं है।
NISAR का उद्देश्य पृथ्वी की प्रक्रियाओं को उच्च गुणवत्ता वाले रडार डेटा से समझना है। इसकी मदद से वैज्ञानिक भविष्य के जोखिमों को बेहतर ढंग से पहचानने वाले मॉडल विकसित कर सकते हैं।
दूसरे शब्दों में, NISAR को 'आसमान में बैठा फ्लड अलार्म' समझना तकनीकी रूप से गलत होगा।
हिमालय क्यों बन रहा है ज्यादा संवेदनशील?
नेपाल की घटना ने जलवायु परिवर्तन और हिमालय की बढ़ती अस्थिरता पर भी बहस तेज कर दी है।
विशेषज्ञों के मुताबिक बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों और ऊंचाई वाले इलाकों की बर्फ तथा जमीन की स्थिरता प्रभावित हो रही है। इससे ग्लेशियर टूटने, भूस्खलन और मलबे के अचानक बहाव जैसी घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि किसी एक आपदा को सीधे जलवायु परिवर्तन के कारण बताने के लिए अलग वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।
भारत के लिए भी बड़ी चेतावनी
नेपाल की यह त्रासदी भारत के हिमालयी राज्यों के लिए भी गंभीर चेतावनी है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रों में भी ग्लेशियर, भूस्खलन और अचानक बाढ़ का खतरा मौजूद है।
ऐसे में NISAR जैसे मिशनों का डेटा, स्थानीय मौसम निगरानी, नदी सेंसर, ड्रोन, ग्राउंड स्टेशन और मोबाइल आधारित अलर्ट सिस्टम को एक ही चेतावनी नेटवर्क में जोड़ना जरूरी होगा।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सैटेलाइट ने आपदा देखी या नहीं।
असली सवाल यह है कि खतरे का संकेत मिलने के बाद वह जानकारी कितनी जल्दी उस व्यक्ति तक पहुंचती है, जिसकी जिंदगी बचाई जा सकती है।
नेपाल की त्रासदी ने यही सबसे बड़ा सबक दिया है—अत्याधुनिक सैटेलाइट जरूरी हैं, लेकिन सैटेलाइट से लेकर इंसान तक पूरी warning chain मजबूत हुए बिना 'अर्ली वॉर्निंग' अधूरी है।
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