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चीन में माओ के विचारों का ‘पुनर्जन्म’, 50 साल बाद Gen Z में बढ़ा किताबों का क्रेज; आखिर क्यों लौट रहे हैं युवा?

माओ जेदोंग की मौत के 50 साल बाद चीन में उनकी किताबों और विचारों को लेकर युवा पीढ़ी में फिर दिलचस्पी दिखाई दे रही है। रिपोर्टों के मुताबिक, चीन के कुछ Gen Z युवा और प्रोफेशनल्स माओ की रचनाओं को पढ़कर रोजगार की अनिश्चितता, काम के दबाव, असमानता और भविष्य को लेकर चिंता के बीच जवाब तलाश रहे हैं। हालांकि, इसे चीन में किसी बड़े राजनीतिक माओवादी आंदोलन की वापसी मानना फिलहाल जल्दबाजी होगी।

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चीन में माओ के विचारों का ‘पुनर्जन्म’, 50 साल बाद Gen Z में बढ़ा किताबों का क्रेज; आखिर क्यों लौट रहे हैं युवा?

बीजिंग: चीन में माओ जेदोंग की मौत को 50 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन उनके विचारों की चर्चा खत्म नहीं हुई। उल्टा, उनकी मृत्यु की 50वीं बरसी के मौके पर चीन की युवा पीढ़ी के एक हिस्से में माओ की किताबों और विचारों को दोबारा पढ़ने का चलन नजर आ रहा है।

रिपोर्टों के अनुसार, Gen Z के कुछ युवा और पेशेवर माओ की रचनाओं को केवल राजनीतिक विचारधारा के तौर पर नहीं, बल्कि मुश्किल समय में जीवन और काम को समझने के एक स्रोत के रूप में देख रहे हैं।

50 साल बाद फिर क्यों पढ़ रहे हैं माओ की किताबें?

माओ जेदोंग का निधन 9 सितंबर 1976 को हुआ था। उनकी मृत्यु के पांच दशक बाद चीन की अर्थव्यवस्था और समाज काफी बदल चुके हैं। लेकिन युवा पीढ़ी के सामने रोजगार की प्रतिस्पर्धा, काम का तनाव, आय और संपत्ति की असमानता तथा भविष्य को लेकर अनिश्चितता जैसे सवाल मौजूद हैं।

ऐसे माहौल में कुछ युवा माओ के लेखन में अनुशासन, दृढ़ता, सामूहिकता और कठिन परिस्थितियों से मुकाबले जैसी बातें तलाश रहे हैं। South China Morning Post के मुताबिक, माओ के कुछ युवा प्रशंसक उन्हें resilience, courage और आम लोगों के प्रति समर्पण के प्रतीक के रूप में देखते हैं।

Gen Z को माओ में क्या दिख रहा है?

आज की युवा पीढ़ी के लिए माओ का आकर्षण जरूरी नहीं कि उनके पूरे राजनीतिक मॉडल की स्वीकृति हो।

कई युवाओं के लिए यह ज्यादा व्यक्तिगत और सामाजिक असंतोष को समझने का तरीका दिखाई देता है। नौकरी हासिल करने की मुश्किल, लंबे काम के घंटे, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और सामाजिक असमानता के बीच कुछ लोग माओ के दौर की समानता और सामूहिकता से जुड़े विचारों की ओर देख रहे हैं।

इसे इसलिए भी दिलचस्प माना जा रहा है क्योंकि आधुनिक चीन की अर्थव्यवस्था काफी हद तक बाजार आधारित विकास पर खड़ी है, जबकि माओ की राजनीति और अर्थव्यवस्था समाजवादी मॉडल पर आधारित थी।

क्या चीन में माओवाद की वापसी हो रही है?

इतना कहना अभी सही नहीं होगा।

विश्लेषकों के मुताबिक, माओ की किताबों में बढ़ती दिलचस्पी को एक व्यापक संगठित राजनीतिक आंदोलन की वापसी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। यह कई युवाओं के लिए मौजूदा सामाजिक-आर्थिक परेशानियों के बीच अर्थ, स्थिरता और पहचान तलाशने का प्रयास भी हो सकता है।

यानी किसी युवा का माओ की किताब पढ़ना जरूरी नहीं कि वह चीन की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था को बदलने या पुराने माओवादी मॉडल को वापस लाने की मांग कर रहा हो।

माओ की मौत की 50वीं बरसी पर दिखा असर

9 सितंबर 2026 को माओ की मृत्यु की 50वीं बरसी थी। इस मौके पर उनके गृहनगर शाओशान में हजारों लोगों के पहुंचने की रिपोर्ट सामने आई। कुछ लोग माओ के चित्र लेकर पहुंचे और उन्हें श्रद्धांजलि दी।

बीजिंग के तियानआनमेन स्क्वायर पर आज भी माओ का विशाल चित्र मौजूद है और उनका शव Mao Zedong Memorial Hall में संरक्षित है। इससे पता चलता है कि माओ चीन की राजनीतिक और सांस्कृतिक स्मृति में अभी भी बेहद महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

लेकिन माओ की विरासत सिर्फ गौरव की कहानी नहीं

माओ की लोकप्रियता की चर्चा करते समय उनके शासन के विवादित और भयावह पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

Great Leap Forward और Cultural Revolution के दौरान चीन में बड़े पैमाने पर सामाजिक उथल-पुथल, राजनीतिक दमन, अकाल और मौतें हुईं। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने बाद में Cultural Revolution को गंभीर गलती माना और इसके लिए माओ को मुख्य जिम्मेदार बताया।

यही कारण है कि माओ की विरासत आज भी चीन में जटिल और विवादित बनी हुई है।

Xi Jinping के दौर में माओ की छवि

माओ की विरासत का आधुनिक चीन में पुनर्पाठ राष्ट्रपति Xi Jinping के दौर में भी देखने को मिलता है। Xi ने माओ की ऐतिहासिक भूमिका को खारिज नहीं किया है और Communist Party की विचारधारा में Mao Zedong Thought आज भी महत्वपूर्ण है।

हालांकि Xi का चीन माओ के दौर के चीन से आर्थिक रूप से काफी अलग है। आज चीन वैश्विक व्यापार, निजी कंपनियों, टेक्नोलॉजी और बाजार आधारित गतिविधियों की बड़ी ताकत है।

यही विरोधाभास माओ की मौजूदा लोकप्रियता को और दिलचस्प बनाता है—युवा बाजार अर्थव्यवस्था में रहते हुए एक ऐसे नेता की किताबें पढ़ रहे हैं जिसने बाजार आधारित मॉडल को स्वीकार नहीं किया था।

‘Little Red Book’ की याद फिर ताजा

माओ की सबसे प्रसिद्ध किताबों में ‘Quotations from Chairman Mao Tse-tung’, जिसे आमतौर पर ‘Little Red Book’ कहा जाता है, शामिल है।

1960 और 1970 के दशक में यह दुनिया की सबसे ज्यादा छपने वाली किताबों में शामिल थी और Cultural Revolution के दौरान चीन के युवाओं और Red Guards के बीच इसका व्यापक इस्तेमाल हुआ।

आज इसकी भूमिका बिल्कुल अलग है। कुछ युवा इसे राजनीतिक आदेश-पुस्तिका की तरह नहीं, बल्कि इतिहास और व्यक्तिगत विचारों को समझने वाली किताब के रूप में देख रहे हैं।

रोजगार और आर्थिक दबाव भी बड़ी वजह

चीन की युवा पीढ़ी के बीच माओ की लोकप्रियता को समझने के लिए आर्थिक परिस्थितियां अहम हैं।

रिपोर्टों में नौकरी की अनिश्चितता, शिक्षा और रोजगार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा तथा कार्यस्थल के दबाव को इस नए रुझान से जोड़ा गया है। कुछ युवाओं के लिए माओ का साहित्य मौजूदा आर्थिक व्यवस्था पर सवाल उठाने की भाषा भी उपलब्ध कराता है।

यानी यह सिर्फ अतीत की ओर लौटना नहीं है। कुछ मामलों में युवा माओ को वर्तमान की समस्याओं को समझने के लिए एक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।

क्या सरकार इस ट्रेंड से खुश है?

मामला इतना सीधा नहीं है।

चीनी सरकार माओ की ऐतिहासिक भूमिका को आधिकारिक रूप से स्वीकार करती है, लेकिन Cultural Revolution जैसे दौर की खुली राजनीतिक व्याख्या और स्वतंत्र बहस संवेदनशील विषय बनी हुई है। Reuters के अनुसार, Communist Party माओ की उपलब्धियों को महत्व देती है, जबकि Cultural Revolution को गंभीर गलती के रूप में देखती है।

इसलिए युवाओं में माओ के प्रति बढ़ती दिलचस्पी सरकार के लिए भी एक जटिल स्थिति पैदा कर सकती है—क्योंकि माओ की लोकप्रियता को राष्ट्रवाद के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन वही विचार मौजूदा आर्थिक असमानताओं की आलोचना का हथियार भी बन सकते हैं।

माओ का ‘पुनर्जन्म’ या नई पीढ़ी की बेचैनी?

मौजूदा घटनाक्रम को फिलहाल माओवाद की पूर्ण वापसी कहना सही नहीं होगा।

ज्यादा सटीक तस्वीर यह है कि चीन के युवाओं का एक हिस्सा तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था, रोजगार के दबाव और सामाजिक असमानता के बीच पुराने विचारों में जवाब तलाश रहा है। किसी के लिए माओ राष्ट्रीय शक्ति के प्रतीक हैं, तो किसी के लिए समानता और सामूहिकता के।

यानी 50 साल बाद माओ की किताबों की वापसी शायद माओ से ज्यादा आज के चीन की बेचैनी की कहानी है।

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