100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा भारत, घटेगी कोयले पर निर्भरता
भारत परमाणु ऊर्जा क्षमता को बड़े स्तर पर बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सरकार ने 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इसका उद्देश्य बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने के साथ-साथ कोयले पर निर्भरता कम करना और स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की हिस्सेदारी बढ़ाना है। सरकार परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी भागीदारी और नई तकनीकों को बढ़ावा देने की दिशा में भी कदम उठा रही है।
लेखक
Vinay Mishra
नई दिल्ली: भारत अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और बिजली उत्पादन में कोयले पर निर्भरता कम करने के लिए परमाणु ऊर्जा क्षमता में बड़े विस्तार की तैयारी कर रहा है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है।
परमाणु ऊर्जा को सरकार देश के दीर्घकालिक ऊर्जा मिश्रण का अहम हिस्सा मान रही है। इसका कारण यह है कि परमाणु बिजली संयंत्र लगातार बिजली उत्पादन कर सकते हैं और सौर तथा पवन ऊर्जा की तरह मौसम पर सीधे निर्भर नहीं होते।
मौजूदा क्षमता से कई गुना बढ़ोतरी का लक्ष्य
भारत की मौजूदा परमाणु ऊर्जा क्षमता करीब 8.8 गीगावाट है। ऐसे में 100 गीगावाट तक पहुंचने का लक्ष्य मौजूदा क्षमता की तुलना में कई गुना विस्तार की मांग करता है।
सरकार का जोर नए परमाणु रिएक्टर स्थापित करने के साथ-साथ मौजूदा संयंत्रों की क्षमता और दक्षता बढ़ाने पर भी है। इसके लिए देश में घरेलू तकनीक के विकास और परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निवेश को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
कोयले पर निर्भरता घटाने की कोशिश
भारत की बिजली व्यवस्था में कोयले की भूमिका अभी भी बहुत बड़ी है। देश की बढ़ती आबादी, शहरीकरण और औद्योगिक विस्तार के साथ बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है।
ऐसे में सिर्फ कोयले पर आधारित बिजली उत्पादन बढ़ाना पर्यावरणीय और जलवायु लक्ष्यों के लिहाज से चुनौतीपूर्ण है। परमाणु ऊर्जा के विस्तार से सरकार को 24 घंटे उपलब्ध कम-कार्बन बिजली का एक अतिरिक्त स्रोत मिलेगा।
हालांकि, परमाणु ऊर्जा कोयले का तत्काल विकल्प नहीं बनने वाली है। आने वाले वर्षों में भारत के ऊर्जा मिश्रण में सौर, पवन, जलविद्युत, परमाणु और अन्य स्रोतों की संयुक्त भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी।
निजी क्षेत्र की भागीदारी पर जोर
परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में विस्तार के लिए सरकार निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दे रही है। हाल के वर्षों में परमाणु क्षेत्र को अधिक निवेश के लिए खोलने और निजी कंपनियों को इसमें भूमिका देने की दिशा में नीतिगत कदम उठाए गए हैं।
सरकार का मानना है कि निजी निवेश आने से रिएक्टर निर्माण, आपूर्ति श्रृंखला, तकनीकी विकास और परियोजनाओं की गति को बढ़ावा मिल सकता है।
छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर पर भी नजर
भारत परमाणु ऊर्जा के भविष्य के लिए Small Modular Reactors (SMRs) जैसी नई तकनीकों पर भी काम कर रहा है। छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर पारंपरिक बड़े परमाणु संयंत्रों की तुलना में छोटे आकार के होते हैं और इन्हें अलग-अलग ऊर्जा जरूरतों के हिसाब से तैनात करने की संभावना देखी जा रही है।
सरकार का लक्ष्य स्वदेशी तकनीक के आधार पर ऐसे रिएक्टरों के विकास को आगे बढ़ाना भी है।
परमाणु ऊर्जा से जुड़े जोखिम भी चुनौती
परमाणु ऊर्जा के विस्तार के साथ सुरक्षा, रेडियोधर्मी कचरे के प्रबंधन, संयंत्रों की लागत और परियोजनाओं को समय पर पूरा करने जैसी चुनौतियां भी जुड़ी हैं।
परमाणु संयंत्रों के निर्माण में शुरुआती निवेश काफी अधिक होता है और परियोजनाओं को पूरा होने में लंबा समय लग सकता है। इसलिए 100 गीगावाट के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए दीर्घकालिक निवेश, मजबूत नियामक व्यवस्था और उच्च सुरक्षा मानकों की जरूरत होगी।
ऊर्जा सुरक्षा के लिए रणनीतिक महत्व
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और इसके साथ ऊर्जा की मांग भी बढ़ रही है। ऐसे में सरकार के लिए चुनौती यह है कि विकास की जरूरतों के लिए पर्याप्त बिजली उपलब्ध हो और साथ ही उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य भी हासिल किए जाएं।
100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है। अगर भारत इस लक्ष्य की दिशा में सफलतापूर्वक आगे बढ़ता है, तो आने वाले दशकों में देश के ऊर्जा मिश्रण में परमाणु बिजली की भूमिका काफी बढ़ सकती है और कोयले पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करने में मदद मिल सकती है।
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