'जस्टिस वर्मा पर क्यों नहीं दर्ज की गई FIR', महेश जेठमलानी ने उठाए सवाल
जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास से कथित तौर पर बड़ी मात्रा में नकदी मिलने के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज पर FIR दर्ज न होने का सवाल उठ रहा है। वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने इस मुद्दे पर सवाल उठाते हुए पूछा कि मामले में अब तक आपराधिक कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
लेखक
Vinay Mishra
नई दिल्ली: न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े नकदी बरामदगी मामले में सवाल उठाया है कि आखिर अब तक FIR क्यों दर्ज नहीं की गई। यह सवाल उन्होंने सोमवार को आयोजित छठे राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर के दौरान न्यायिक व्यवस्था में सुधार और जनविश्वास के मुद्दे पर चर्चा करते हुए उठाया।
जेठमलानी के साथ वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने भी न्यायपालिका में शिकायतों से निपटने की व्यवस्था और संस्थागत जवाबदेही में सुधार की जरूरत पर जोर दिया। दोनों वरिष्ठ वकीलों ने कहा कि न्यायपालिका में जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए व्यवस्था में अधिक पारदर्शिता जरूरी है।
जस्टिस यशवंत वर्मा मामला क्या है?
मामला मार्च 2025 में सामने आया था, जब दिल्ली स्थित तत्कालीन जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास के आउटहाउस में आग लगने के बाद वहां नकदी से भरी एक बोरी मिलने की बात सामने आई थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के स्तर पर आंतरिक जांच की प्रक्रिया शुरू हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने बाद में जांच समिति की रिपोर्ट और संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक किया। तीन सदस्यीय जांच समिति ने जस्टिस वर्मा से जुड़े आरोपों की जांच की। संसद से जुड़े रिकॉर्ड में भी इस मामले और जस्टिस वर्मा के खिलाफ जांच की प्रक्रिया का उल्लेख मौजूद है।
'आखिर FIR क्यों नहीं हुई?'
महेश जेठमलानी ने सवाल उठाया कि जब मामले में इतनी गंभीर परिस्थितियां सामने आईं तो आपराधिक जांच की दिशा में FIR क्यों दर्ज नहीं की गई। उन्होंने खास तौर पर यह सवाल उठाया कि जस्टिस वर्मा ने जांच प्रक्रिया को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख भी किया था, फिर भी FIR दर्ज नहीं हुई।
जेठमलानी ने कहा कि अब एक बड़ा सवाल यह है कि आपराधिक जांच शुरू करने की प्रक्रिया कौन शुरू करेगा और क्या इसके लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश को राष्ट्रपति से संबंधित प्रक्रिया आगे बढ़ाने की जरूरत होगी। उनके मुताबिक, मामले में तेजी से जांच होना जरूरी है।
हरीश साल्वे ने भी उठाया सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने इस बहस को और व्यापक बनाते हुए सवाल किया कि अगर किसी मंत्री के सरकारी आवास पर इसी तरह नकदी मिलने की घटना सामने आती, तो क्या FIR दर्ज नहीं होती?
साल्वे ने न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन तथा अदालतों की भूमिका पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को कानून के दायरे में रहकर काम करना चाहिए और जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता भी महत्वपूर्ण है।
CJI सूर्यकांत ने क्या कहा?
कार्यक्रम में मौजूद भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों से निपटने वाली मौजूदा आंतरिक व्यवस्था का बचाव किया। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था पर्याप्त, जवाबदेह और तेजी से काम करने वाली है।
CJI सूर्यकांत ने यह भी कहा कि हर व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश होती है, लेकिन न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों को सार्वजनिक रूप से तय करना उचित होगा या नहीं, इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि कई शिकायतें ऐसे पक्षों की ओर से आती हैं जो किसी मुकदमे में प्रतिकूल फैसला आने के बाद असंतुष्ट होते हैं।
जांच समिति की रिपोर्ट में क्या सामने आया?
जस्टिस वर्मा मामले की तीन सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट को लेकर अगस्त 2026 में सामने आई रिपोर्टों में कहा गया कि समिति ने उनके खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों को साबित माना। रिपोर्ट में नकदी से जुड़े सवालों और उपलब्ध साक्ष्यों को लेकर गंभीर टिप्पणियां की गईं।
हालांकि, किसी जांच समिति के निष्कर्ष और आपराधिक अदालत में दोषसिद्धि एक ही चीज नहीं हैं। FIR, पुलिस जांच, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया अलग-अलग कानूनी चरण हैं। इसलिए मामले में आपराधिक दोष साबित होने का निष्कर्ष केवल FIR या आंतरिक जांच के आधार पर नहीं निकाला जा सकता।
न्यायपालिका में पारदर्शिता पर फिर बहस
जेठमलानी ने इस पूरे प्रकरण को न्यायपालिका में पारदर्शिता की बड़ी बहस से जोड़ते हुए कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादलों की प्रक्रिया में भी अधिक पारदर्शिता की जरूरत है। उन्होंने न्यायिक संस्थानों में शिकायतों के निपटारे और जवाबदेही को लेकर सुधार की मांग की।
उन्होंने यह भी कहा कि न्याय व्यवस्था में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले कथित 'फिक्सर वकीलों' की भूमिका पर भी बार को आत्ममंथन करना चाहिए। उनके मुताबिक, कानूनी व्यवस्था में सुधार केवल न्यायपालिका से नहीं बल्कि बार से भी जुड़ा हुआ है।
क्यों अहम है यह बहस?
जस्टिस वर्मा प्रकरण ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल खड़ा किया है—न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?
एक तरफ न्यायाधीशों को बाहरी दबाव से मुक्त रखना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ गंभीर आरोप सामने आने पर पारदर्शी और निष्पक्ष जांच की मांग भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। महेश जेठमलानी और हरीश साल्वे के सवाल इसी व्यापक बहस को फिर सामने लेकर आए हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जस्टिस वर्मा से जुड़े मामले में आगे आपराधिक जांच किस प्रक्रिया के तहत और किस स्तर पर शुरू होती है। इसी के साथ यह बहस भी जारी है कि न्यायपालिका के भीतर शिकायतों से निपटने की मौजूदा व्यवस्था जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए पर्याप्त है या इसमें बड़े संस्थागत बदलाव की जरूरत है।
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